बलबीर सिंह सीनियर का 95 साल की उम्र में निधन, भारत को दिलाए थे तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक और विश्व कप

बलबीर सिंह सीनियर

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इमेज कैप्शन, साल 1948 में हुए लंदन ओलंपिक्स के फ़ाइनल मैच में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ गोल मारने के बाद बलबीर सिंह
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जब 1948 में भारत और इंग्लैंड के बीच लंदन के वेम्बली स्टेडियम में हॉकी का फ़ाइनल शुरू हुआ तो सारे दर्शकों ने एक सुर में चिल्लाना शुरू किया, "कम ऑन ब्रिटेन, कम ऑन ब्रिटेन!"

धीरे-धीरे हो रही बारिश से मैदान गीला और रपटीला हो चला था. नतीजा ये हुआ कि किशन लाल और केडी सिंह बाबू दोनों अपने जूते उतार कर नंगे पांव खेलने लगे.

पहले हाफ़ में ही दोनों के दिए पास पर बलबीर सिंह ने टॉप ऑफ़ डी से शॉट लगा कर भारत को 2-0 से आगे कर दिया.

खेल ख़त्म होने के समय स्कोर था 4-0 और स्वर्ण पदक भारत का था. जैसे ही फ़ाइनल विसिल बजी ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्ण मेनन दौड़ते हुए मैदान में घुसे और भारतीय खिलाड़ियों से गले मिलने लगे.

बाद में उन्होंने भारतीय हॉकी टीम के लिए इंडिया हाउज़ में स्वागत समारोह किया जिसमें लंदन के जाने-माने खेल प्रेमियों को आमंत्रित किया गया.

जब ये टीम पानी के जहाज़ से वापस भारत पहुंची तो बंबई के पास उनका जहाज़ कमज़ोर ज्वार-भाटे में फंस गया. उस ओलंपिक में स्टार बने बलबीर सिंह अपने जहाज़ से अपनी मातृ-भूमि को देख पा रहे थे. उस हालत में उन्हें पूरे दो दिन रहना पड़ा. जब ज्वार ऊँचा हुआ तब जा कर उनका जहाज़ बंबई के बंदरगाह पर लग सका.

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इमेज कैप्शन, साल 1948 के ओलंपिक खेलों के दौरान बलबीर सिंह से हाथ मिलाते लंदन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन

नेहरू और राजेंद्र प्रसाद की मौजूदगी में...

लेकिन इस बीच बहुत से खेल प्रेमी नावों पर सवार हो कर हॉकी में स्वर्ण पदक लाने वालों को बधाई देने के लिए पानी के जहाज़ पर पहुंच गए.

कुछ दिनों बाद दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में ओलंपिक विजेताओं और शेष भारत की टीम के बीच एक नुमाइशी हॉकी मैच खेला गया जिसे देखने के लिए राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी स्टेडियम में मौजूद थे.

बलबीर सिंह सीनियर ने विजयी गोल मार कर ओलंपिक टीम को 1-0 से जीत दिलवाई.

हेलिंस्की में हुए 1952 के ओलंपिक खेलों में भी बलबीर सिंह को भारतीय टीम में चुना गया. वहाँ उन्हें 13 नंबर की जर्सी पहनने के लिए दी गई.

अशुभ होने के बजाए 13 नंबर बलबीर के लिए भाग्य ले कर आया. पूरे टूर्नामेंट में भारत ने कुल 13 गोल स्कोर किए. उनमें से 9 गोल बलबीर सिंह ने मारे थे.

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इमेज कैप्शन, साल 1952 में हेलिंस्की ओलंपिक में बलबीर सिंह भारतीय दल के ध्वजवाहक बने थे

बाएं जूते पर गिरी कबूतर की बीट

बलबीर सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए एक दिलचस्प कहानी सुनाई थी, "मैं हेलिंस्की ओलंपिक में भारतीय टीम का ध्वजवाहक था. परेड के दौरान हज़ारों कबूतर उड़ाए गए, जो हमारे ऊपर से उड़ कर गए. उन में एक ने मेरे ऊपर बीट कर दी जो कि मेरे बांए पैर के जूते पर गिरी. मैं हैरान परेशान मार्च करता गया."

"मुझे डर था कि कहीं उन कबूतरों नें मेरे भारत के ब्लेजर को तो गंदा नहीं कर दिया है. समारोह के बाद मैं कागज़ ढ़ूढ़ने लगा जिससे मैं अपने जूते पर गिरी कबूतर की बीट पोंछ सकूँ. तभी आयोजन समिति के एक सदस्ट ने मेरी पीठ पर हाथ मार कर कहा..."

"बधाई हो बेटे! फ़िनलैंड में बाएं जूते पर कबूतर की बीट गिरने को सबसे शुभ माना जाता है. ये ओलंपिक तुम्हारे लिए बहुत भाग्यशाली होने जा रहा है. उन साहब की भविष्यवाणी बिल्कुल सही निकली और भारत ने हॉलैंड को फ़ाइनल में 6-1 हरा कर एक बार फिर स्वर्ण पदक जीता. बलबीर सिंह ने छह में से पाँच गोल किए."

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इमेज कैप्शन, हेलिंस्की में हुए 1952 के ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद भारत में अभूतपूर्व स्वागत

उंगली में फ़्रैक्चर

साल 1956 के मेलबर्न ओलंपिक हॉकी टीम के कप्तान बलबीर सिंह थे.

पहले मैच में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को 14-0 से हराया लेकिन भारत को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब कप्तान बलबीर सिंह के दाँए हाथ की उंगली टूट गई.

बीबीसी से बात करते हुए बलबीर ने कहा था, "मैं अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ पाँच गोल मार चुका था, तभी मुझे बहुत बुरी चोट लग गई."

"ऐसा लगा किसी ने मेरी उंगली के नाख़ून पर हथौड़ा चला दिया हो. शाम को जब एक्स-रे हुआ तो पता चला कि मेरी उंगली में फ़्रैक्चर है."

"नाख़ून नीला पड़ गया था और उंगली बुरी तरह से सूज गई थी."

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इमेज कैप्शन, मशहूर कॉमेंटेटर जसदेव सिंह के साथ बलबीर सिंह (बाएं)

चोट की ख़बर रखी गई गुप्त

बलबीर सिंह ने आगे बताया, "हमारे मैनेजर ग्रुप कैप्टेन ओपी मेहरा, चेफ़ डे मिशन एयर मार्शल अर्जन सिंह और भारतीय हॉकी फ़ेडेरेशन के उपाध्यक्ष अश्विनी कुमार के बीच एक मंत्रणा हुई और ये तय किया गया कि मैं बाक़ी के लीग मैचों में नहीं खेलूँगा..."

"सिर्फ़ सेमी फ़ाइनल और फ़ाइनल में मुझे उतारा जाएगा. मेरी चोट की ख़बर को गुप्त रखा जाएगा."

"वजह ये थी कि दूसरी टीमें मेरे पीछे कम से कम दो खिलाड़ियों को लगाती थीं जिससे दूसरे खिलाड़ियों पर दबाव कम हो जाता था."

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हरबैल सिंह की डांट

बलबीर सिंह ने अपनी आत्मकथा 'द गोल्डन हैट्रिक' में लिखा, "हरबैल सिंह को मैं अपने ख़ालसा कालेज के दिनों से ही अपना गुरु मानता था."

"ओलंपिक गाँव में हम दोनों कमरा शेयर कर रहे थे. उन्होंने मेरी तकलीफ़ को हर संभव तरीक़े से दूर करने की कोशिश की."

"कभी बहला कर, कभी मना कर और कभी डाँट कर भी. लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं हुआ. मुझे लगा कि मैं ऐसा कप्तान हूँ जिसने डूबते हुए जहाज़ को छोड़ दिया है."

"मुझे बार-बार एक सपना आता था. मैं एक गोलकीपर के सामने खड़ा हूँ. वो मुझ पर हंस रहा है और बार-बार मुझसे कह रहा है... अगर हिम्मत है तो गोल मारो."

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इमेज कैप्शन, सेंटर फ़ॉरवर्ड की पोज़िशन पर खेलते थे बलबीर सिंह

पाकिस्तान के साथ फ़ाइनल

बहरहाल भारतीय टीम जर्मनी को हरा कर फ़ाइनल में पहुंची. फ़ाइनल में भारत का मुक़ाबला पाकिस्तान से था.

ये उनका पाकिस्तान से पहला मुक़ाबला था लेकिन इसका इंतज़ार दोनों देशों के खिलाड़ी 1948 से ही कर रहे थे. भारत की टीम बहुत ज़्यादा दबाव में थी.

भारत पर दबाव ज़्यादा था, क्योंकि अगर पाकिस्तान को रजत पदक भी मिलता तो उनके लिए ये संतोष की बात होती.

लेकिन भारत के लिए स्वर्ण से नीचे का कोई पदक निराशापूर्ण बात होती. मैच से एक दिन पहले बलबीर सिंह बहुत ही तनाव में थे.

ऑडियो कैप्शन, ‘बाबू’ थे अपने ज़माने के दुनिया के सर्वश्रेष्ठ राइट इन

फ़ाइनल से पहले नींद ग़ायब

उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, "हमारे कोच हरबैल सिंह ने सुनिश्चित किया कि हर खिलाड़ी समय से सोने चला जाए."

"उन्होंने मेरे कमरे की लाइट ऑफ़ करते हुए कहा, ईश्वर ने चाहा तो हम जीतेंगे. मैं उस रात सो नहीं सका. थोड़ी देर बाद मैं टहलने बाहर निकल आया."

"बहुत रात हो चुकी थी. तभी किसी ने पीछे से मेरा नाम ले कर पुकारा. पीछे मुड़ कर देखा तो परेशान मुद्रा में अश्विनी कुमार खड़े थे."

"उन्होंने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा और मुझे मेरे कमरे में ले आए. वो मुझसे बात करते रहे. फिर उन्होंने मुझे एक गोली दी."

"उन्होंने मुझे लेटने के लिए कहा और मेरे सिरहाने बैठे रहे. मुझे पता नहीं कि कब मुझे नींद आ गई और कब अश्विनी मुझे छोड़ कर चले गए."

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इमेज कैप्शन, बलबीर सिंह ने पंजाब पुलिस में भी नौकरी की थी

मैच से पहले अंसारी की छींक

मैच की सुबह सभी भारतीय खिलाड़ी बस में सवार हुए.

ड्राइवर ने अपना इग्निशन ऑन किया ही था कि एमटी अंसारी को जो भोपाल हॉकी एसोसिएशन के सचिव थे, छींक आ गई.

बलबीर सिंह अपनी आत्मकथा 'द गोल्डन हैट्रिक' में लिखते हैं, "कुमार ने अंसारी को डाँटा और ड्राइवर से इग्निशन ऑफ़ करने के लिए कहा."

"वो मुझे मेरे कमरे में वापस ले गए. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम मुझे अंधविश्वासी कह सकते हो, लेकिन तुम्हें अपना ट्रैक सूट और जूते उतारने होंगे."

"तुम पलंग पर पांच मिनट के लिए लेट जाओ. मैंने वैसा ही किया जैसा अश्विनी कुमार ने कहा था. थोड़ी देर बाद हम उसी बस से मैदान के लिए रवाना हुए."

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इमेज कैप्शन, मेलबर्न, 1956 ओलंपिक में भाग लेने वाली हॉकी टीम

दाहिनी उंगली में प्लास्टर

ये बहुत कड़ा मुक़ाबला था. भारत के हमलों में तारतम्य नहीं था. बलबीर की दाहिनी उंगली में पलास्टर बंधा हुआ था और वो तीन पेनकिलर इंजेक्शन ले कर मैदान में उतरे थे.

अगले दिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपा, "बलबीर पूरी तरह से फ़िट नहीं थे. उनको पाकिस्तान का सेंटर हाफ़ ज़्यादा खुल कर खेलने नहीं दे रहा था.

लेकिन भारत का डिंफेस अपनी ख्याति के अनुरूप खेल रहा था.

पाकिस्तान उसे भेदने का भरसक प्रयास कर रहा था लेकिन जेंटिल, पेरुमल और क्लॉडियस लोहे की दीवार की तरह खड़े थे.

दूसरे हाफ़ में बलबीर ने पाकिस्तानी रक्षण को भेद दिया. उन्होंने गुरदेव को गेंद पास की लेकिन वो गेंद को क्रॉस बार के ऊपर मार गए."

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इमेज कैप्शन, बलबीर ने लंदन, हेलिंस्की और मेलबर्न ओलंपिक खेलों मं तीन स्वर्ण पदक जीते थे

पेनल्टी कॉर्नर मिला

दूसरा हाफ़ शुरू होते ही भारत को पेनल्टी कॉर्नर मिला और रणधीर सिंह जेंटिल का दनदनाता हुआ शॉट पाकिस्तानी गोल को भेद गया.

अंतिम समय में पाकिस्तान ने गोल उतारने के लिए अपनी सारी ताक़त झोंक दी.

उनको एक पेनल्टी बुली भी मिली लेकिन भारत के सेंटर हाफ़ अमीर कुमार ने पाकिस्तान के हमीद को गोल नहीं करने दिया. बलबीर सिंह के लिए ये एक बड़ा क्षण था.

उन्होंने तीसरी बार भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था.

स्वर्ण पदक लेने के बाद बलबीर ने एमटी अंसारी को गले लगाया और धीमे से उनके कान में कहा, "अंसारी साहब आपकी छींक हमारे लिए अच्छा भाग्य ले कर आई है."

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इमेज कैप्शन, मेलबर्न ओलंपिक, 1956 में स्वर्ण पदक लेते हुए बलबीर सिंह

1975 में कुआलालम्पुर में भारतीय टीम के मैनेजर

1975 में कुआलालम्पुर में हुए विश्व कप में बलबीर सिंह को भारतीय टीम का कोच बनाया गया.

इस टीम को चंडीगढ़ में ट्रेनिंग दी गई.

भारतीय टीम मलेशिया को हरा कर फ़ाइनल में पहुंची, जहाँ उसका मुकाबला चिरपरिचित प्रतिद्वंदी पाकिस्तान से था.

असलम शेर खाँ ने इच्छा प्रकट की कि वो नमाज़ पढ़ने के लिए मस्ज़िद जाना चाहते हैं.

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इमेज कैप्शन, कुआलालम्पुर हॉकी वर्ल्ड कप, 1975 जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के साथ बलबीर सिंह

शाही मस्जिद में नमाज़

कोच बोधी, मैनेजर बलबीर सिंह और डॉक्टर राजेंद्र कालरा उन्हें लेकर कुआलालम्पुर की शाही मस्जिद पहुंचे. उसी बस में पाकिस्तानी टीम के खिलाड़ी भी थे.

'सडेन डेथ' रशीद ने असलम से मज़ाक किया कि तुमने मलेशिया के ख़िलाफ़ बराबरी का गोल मारा और अब बलबीर को नमाज़ पढ़वाने ले जा रहे हो. आगे क्या इरादे हैं?

वहाँ के मौलाना ने उनका स्वागत किया. जब उन्होंने बताया कि वो सब वहाँ नमाज़ पढ़ने आए हैं तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ.

बलबीर को नमाज़ पढ़ने का तरीका पता नहीं था. इसलिए उन्होंने नमाज़ ख़त्म होने तक अपना माथा ज़मीन से ऊपर नही उठाया.

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इमेज कैप्शन, साल 1975 का हॉकी विश्व कप जीतने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ

विश्व कप में जीत

लौटते समय रशीद ने शहनाज़ शेख़ से व्यंग्य किया, "कल भारत जीत रहा है तुम्हारे ख़िलाफ़."

शहनाज़ ने कहा, "इसलिए कि तुम टीम में नहीं खेल रहे हो?"

रशीद ने तुरंत जवाब दिया, "इसलिए कि अल्लाह पहले की गई दुआ को ही क़बूल करता है. असलम और बलबीर ने जीत के लिए पहले दुआ माँगी है."

रशीद बिल्कुल सही थे. भारत ने फ़ाइनल में पाकिस्तान को 2-1 से हरा कर विश्व कप हॉकी जीता. इसके बात भारत ने कभी भी विश्व कप में जीत नहीं हासिल की.

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इमेज कैप्शन, विश्व कप जीतने के बाद बलबीर सिंह और अजीतपाल सिंह का स्वागत करते पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह

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