Australia vs India: टीम इंडिया का ड्रेसिंग रूम मिनी अस्पताल कैसे बन गया?

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
ब्रिस्बेन टेस्ट के पहले दिन टीम इंडिया के तेज़ गेंदबाज़ नवदीप सैनी चोट के चलते आठ ओवरों की गेंदबाज़ी भी नहीं कर पाए.
सैनी को इस मैच में खेलने की मौका ही इसलिए मिला कि टीम के नियमित गेंदबाज़ चोटिल थे.
इस दौरे पर टीम इंडिया के चोटिल होने वाले खिलाड़ियों की संख्या दर्जन भर तक पहुँच गई है.
इस समस्या के कारण टीम प्रबंधन को ब्रिस्बेन में खेले जा रहे चौथे और आख़िरी टेस्ट में मज़बूत अंतिम एकादश उतारना भी मुश्किल हो गया था.
भारत ने इसमें जिन पाँच गेंदबाजों को उतारा और उनका कुल अनुभव मात्र तीन टेस्ट था. उन पाँच गेंदबाज़ों में नवदीप सैनी भी शामिल थे, जो चोटिल हो गए.

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कुछ ज़्यादा ही क्रिकेट खेल रहे हैं भारतीय क्रिकेटर?
अब सवाल यह है कि इस दौरे पर क्रिकेटर लगातार चोटिल क्यों हो रहे हैं? इस समस्या की एक वजह अत्याधिक क्रिकेट को माना जा रहा है.
कोरोना महामारी की वजह से आईपीएल का सत्र आगे खिसकने की वजह से इस टी-20 लीग के तत्काल बाद भारतीय टीम को इस दौरे के लिए रवाना होना पड़ा.
इससे खिलाड़ियों को आईपीएल की थकान से उभरने का मौका ही नहीं मिला. इस लीग के बाद लंबी सिरीज़ खेलने की वजह से खिलाड़ियों की फ़िटनेस जवाब देती नजर आई.
ऑस्ट्रेलिया टीम के प्रमुख कोच जस्टिन लैंगर ने भी पिछले दिनों इस बात से सहमति जताई थी कि इस सिरीज़ में चोटों की समस्या की वजह आईपीएल हो सकती है.
इस बार इसके आयोजन का समय सही नहीं था, ख़ासतौर से इस बड़ी सीरिज़ से पहले.
जस्टिन लैंगर ने कहा, "इस लीग को मैं भी पसंद करता हूं. जिस तरह हम पहले अपने कौशल को माँजने के लिए काउंटी क्रिकेट में खेलने जाते थे, उसी तरह अब सफ़ेद गेंद की क्रिकेट के खेल में अपने को विकसित करने के लिए आईपीएल में खेलने को जाते हैं."

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दो तरह की चोटें
क्रिकेट में आमतौर पर विभिन्न सिरीज़ों में चोटिल होने वाले खिलाड़ियों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.
- पहलाी समस्या उन बल्लेबाजों की है जो बैटिंग करते समय गेंद लग जाने पर चोटिल हो जाते हैं. यह ऐसी समस्या है, जिस पर पहले से कुछ कर पाना संभव नहीं है. इस सीरीज में मोहम्मद शमी के हाथ में फ़्रैक्चर, रविंद्र जडेजा के हाथ के अंगूठे में फ़्रैक्चर, अश्विन की पसलियों में चोट और केएल राहुल की कलाई में चोट कुछ इसी तरह की रही हैं.
- दूसरी समस्या है, फ़िटनेस की वजह से होने और लगने वाली चोट. इस समस्या से सीरीज से पहले बेहतर फ़िटनेस रखकर बचा जा सकता है. पर इस बार दिक्कत यह हुई है कि दोनों समस्याएं एक साथ आ गई हैं. फिटनेस की समस्या की वजह से चोटिल होने वालों में उमेश यादव, जसप्रीत बुमराह, नवदीप सैनी और हनुमा विहारी हैं.
सभी जानते हैं कि टीम इंडिया में शामिल होने के लिए सभी खिलाड़ियों को 'यो-यो टेस्ट' से गुजरना पड़ता है.
ऐसी भी मिसालें हैं कि खिलाड़ी का टीम में चयन हो जाने पर भी उसे टीम के साथ नहीं ले जाया गया क्योंकि वह यो-यो टेस्ट को पास करने में असफल रहा था. लेकिन यह कहा जा रहा है कि इस दौरे पर कुछ खिलाड़ियों के टेस्ट पास नहीं करने पर भी भेज दिया गया.
कोरोना की वजह से खिलाड़ियों के लंबे समय तक घर में क़ैद रहने को भी फ़िटनेस की समस्या माना जा सकता है. इस दौरान खिलाड़ी प्रतियोगात्मक क्रिकेट से तो दूर रहे ही, साथ ही फ़िटनेस पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दे सके.
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शारीरिक ही नहीं, मानसिक थकान भी
दौरे से पहले आईपीएल में खेलने और वह भी 'बायो बबल' में रहकर खिलाड़ियों को शारीरिक ही नहीं मानसिक थकान का भी सामना करना पड़ा.
यह सही है कि टी-20 में गेंदबाज को सिर्फ़ चार ओवर ही गेंदबाजी करनी होती है लेकिन सर्कल के बाहर रहने वाले खिलाड़ियों को रन बचाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है और इसके लिए तेज़ी से थ्रो भी करनी पड़ती है.
इस तरह की लीग में खेलने के बाद क्रिकेटरों को रिकवरी के लिए थोड़ा समय तो चाहिए ही. पर ऑस्ट्रेलियाई दौरे से पहले खिलाड़ियों को रिकवरी के लिए समय मिल नहीं सका.
इस समस्या के बारे में पूर्व टेस्ट क्रिकेटर संजीव शर्मा कहते हैं, "अत्याधिक क्रिकेट खेलना चोटों की समस्या की प्रमुख वजह तो है ही. आईपीएल के तत्काल बाद ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जाने से क्रिकेटरों को रिकवरी का समय ही नहीं मिल सका."
"इसमें भी बुमराह जैसे तीनों प्रारूप में खेलने वाले क्रिकेटरों पर बहुत ज़्यादा बोझ पड़ गया. अगर तीनों प्रारूप में खेलने वाले क्रिकेटरों को बीच-बीच में आराम दिया जाए तो वह रिकवरी करके चोट की समस्या से बच सकते हैं."
संजीव कहते हैं, "आजकल दौरों पर कार्यक्रम को व्यस्त बनाने से भी यह समस्या बढ़ रही है. पहले टेस्ट मैचों का इस तरह से आयोजन होता था कि खिलाड़ी को एक के बाद दूसरे टेस्ट खेलने में काफी समय दिया जाता था, जिससे गेंदबाजों ख़ासतौर से पेस गेंदबाजों को रिकवरी के लिए समय मिल जाता था."
"अब आप इस ऑस्ट्रेलियाई दौरे को लें तो इसमें पहले टी-20 सिरीज़ फिर वनडे सीरीज और फिर टेस्ट सीरीज का आयोजन किया गया. इन सीरीजों में भारत के पास गेंदबाज समान थे. इसलिए उनके लिए यह बोझ झेलना मुश्किल हो गया."

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पहले क्रिकेटर ऐसे चोटिल क्यों नहीं होते थे?
1980 और 1990 के दशक में कपिल देव जैसे पेस गेंदबाज कभी चोटिल होते क्यों नहीं सुने गए?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "उस समय क्रिकेटरों को इस कदर क्रिकेट खेलने को नहीं मिलती थी. उस समय क्रिकेटरों को रणजी ट्रॉफ़ी में खेलने के अलावा साल में छह-सात टेस्ट खेलने होते थे. इसलिए उन्हें रिकवरी के लिए पर्याप्त समय मिल जाता था."
"मौजूदा समय में क्रिकेटर को 12-14 टेस्ट के अलावा साल में करीब 60 टी-20 और वनडे मैच खेलने होते हैं. इसके अलावा आईपीएल के लंबे कार्यक्रम में भी भाग लेना होता है. इससे उन्हें रिकवरी के लिए समय ही नहीं मिल पाता है और चोटों की बढ़ती समस्या की यही वजह लगती है."
उन्होंने कहा, "यह सही है कि इस दौरे पर चोटों की समस्या ज्यादा हो गई. पर मेरे हिसाब से हमारे यहाँ की सुविधाएं कई अन्य देशों के मुकाबले बहुत बेहतर हैं. हमारे पेस गेंदबाज 120 किलोमीटर की रफ़्तार से गेंदबाजी नहीं करते हैं बल्कि वो 140 से 150 किमी तक की रफ़्तार निकालते हैं. इस रफ़्तार से गेंदबाजी करने वालों के लिए चोटिल होने की समस्या भी बढ़ जाती है क्योंकि इसके लिए काफी दम लगाना पड़ता है."
अब आप कल्पना करें करीब दो दशक पहले किसी विदेशी सिरीज़ मौजूदा कोरोना जैसे माहौल में हुई होती तो सिरीज़ को ही चोटों की समस्या की वजह से रद्द करना पड़ता क्योंकि क्वारंटीन नियमों की वजह से खिलाड़ियों के विकल्प भेजना आसान नहीं था.
मौजूदा समय में टीम को अभ्यास कराने के लिए साथ में अतिरिक्त खिलाड़ी भेजे जाते हैं. इसका मक़सद उन युवा खिलाड़ियों को अनुभव कराना होता है. इस वजह से ही टीम इंडिया इस सीरीज में दर्जन भर खिलाड़ियों के चोटिल होने पर भी चौथे और आख़िरी टेस्ट में फिट एकादश को उतारने में सफल हो पाई है.
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