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#Changethegame | साक्षी मलिक को हराकर ओलंपिक 2020 में पहुंचने की तैयारी कर रहीं सोनम की कहानी
- Author, सत सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
18 साल की सोनम मलिक ने हाल ही में साक्षी मलिक को हराकर बड़ा उलटफेर किया था.
रियो ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली साक्षी मलिक को हराने के बाद सोनम अब ओलंपिक क्वॉलिफ़ायर्स में दांव आज़माएंगी.
सोनम के पिता पहलवान राजेंदर मलिक सोनीपत के मदीना गाँव के रहने वाले हैं. गांव में लोग उन्हें राज पहलवान के नाम से जानते हैं.
कुछ साल पहले तक वो अपनी बेटी सोनम के लिए ऐसा खेल तलाश रहे थे जिसमें बेटी को आगे बढ़ा सकें.
उनके दिमाग में एक बात तय थी कि खेल कोई भी हो पर कुश्ती नहीं होना चाहिए. जबकि वो ख़ुद कुश्ती के खिलाड़ी रह चुके हैं और नामचीन पहलवान मास्टर चन्दगी राम के दिल्ली वाले अखाड़े में ट्रेनिंग कर चुके हैं.
राजेंदर बताते हैं, "मुझे मलाल था कि मैं कभी देश के लिए नहीं खेल पाया क्योंकि मैं नेशनल गेम्स से पहले चोटिल हो गया था और मेरी सारी मेहनत ख़राब हो गई थी. मेरे ऐसे कई दोस्त, जो बहुत ही उम्दा खिलाड़ी रहे थे, चोटिल होने की वजह से वे अपना सुनहरा करियर गँवा चुके थे. मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा होते हुए नहीं देखना चाहता था."
सोनम की कुश्ती का सफ़र
सोनम के फ़ौजी अंकल और उसके पापा के बचपन के दोस्त अजमेर मलिक ने 2011 में अपने खेत में एक अखाड़ा खोलकर कोचिंग देना शुरू किया.
राजेंदर ने दोस्त से मिलने के बहाने और सोनम को सुबह घुमाने के बहाने अजमेर मलिक के अखाड़े में आना-जाना शुरू किया.
धीरे-धीरे अजमेर मलिक की कड़ी मेहनत, लगन और ट्रेनिंग स्टाइल ने राजेंदर पहलवान को फिर से कुश्ती के साथ जोड़ा.
वो कुश्ती में ही अपनी बेटी का भविष्य देखने के बारे में सोचने लगे.
अजमेर मलिक के इस अखाड़े में सिर्फ लड़के ट्रेनिंग करते थे. लिहाज़ा सोनम को शुरू से ही लड़कों के साथ हार्ड ट्रेनिंग करने को मिली.
सोनम बताती हैं, "कोच अजमेर ने मेरी ट्रेनिंग एकदम फ़ौजी तरीके से करवाई है. मुझे भी लड़कों की तरह ही प्रशिक्षण दिया गया है. कोच साहब का कहना है मैट पर पहुँचने के बाद कोई भी लापरवाही नहीं सहन की जाएगी."
रंग लाने लगी मेहनत
सोनम ने बताया कि बचपन में स्कूल में एक बार वो खेलों में अव्वल आई थीं. उन्हें पापा के साथ आईपीएस सुमन मंजरी ने सम्मानित किया था.
वह कहती हैं, "मैंने उसी दिन ठान लिया था कि मुझे आईपीएस सुमन मंजरी जैसा रुतबा अपने लिए बनाना है और फिर स्कूल लेवल, डिस्ट्रिक्ट लेवल और नेशनल लेवल के खेलों में अपने सामने वाले पहलवान को चित करने में टाइम नहीं लगाया."
यहां से जो सिलसिला शुरू हुआ उसके बाद सोनम पांच बार भारत केसरी बनीं.
सेना से बतौर सूबेदार रिटायर हुए अजमेर केसरी बताते हैं कि सोनम अपने से उम्र और अनुभव में कहीं ज़्यादा नामचीन पहलवानों को हरा चुकी हैं.
बड़े और ताकतवर पहलवानों के दबाव में आए बिना उनका सामना करना सोनम की ख़ासियत मानी जाती है.
सोनम कहती हैं कि वो हर मुक़ाबले में अपना सौ फ़ीसदी देने की कोशिश करती हैं.
जब आया मुश्किल दौर
2013 में एक राज्य स्तर के मुक़ाबले के दौरान सोनम के दाएं हाथ ने काम करना बंद कर दिया.
उनके पिता और कोच को पहले लगा कि ये एक हल्की-फुल्की चोट है.
सोनम के मुताबिक़, "हमने कुछ देसी इलाज किया. लेकिन हाथ धीरे-धीरे साथ छोड़ता जा रहा था और एक दिन हाथ ने काम ही करना बंद कर दिया."
जब रोहतक में एक स्पेशलिस्ट को हाथ दिखाया तो उसने सोनम को कुश्ती को भूल जाने को कहा.
ये वो वक्त था जब पिता राजेंदर को भी लगने लगा कि उन्होंने अपनी बेटी को कुश्ती खिलवाकर ग़लती की है.
आस-पड़ोस के लोग ताने कसने लगे कि अब सोनम को कौन अपनाएगा.
राजेंदर बताते हैं, "लेकिन क़रीब दस महीने चले इलाज के दौरान हमने ग्राउंड को नहीं छोड़ा. सोनम हाथ के बजाए पैरों की प्रैक्टिस करती रही क्योंकि कुश्ती में पैरों का रोल भी बहुत बड़ा होता है. वो किसी भी कीमत पर ग्राउंड नहीं छोड़ना चाहती थी. दस महीने चले इलाज में डॉक्टर ने सोनम को दोबारा फिट कर दिया जिसके बाद फिर सोनम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा."
सोनम आज भी कोच अजमेर मलिक की ये बात याद करती हैं कि "चोट पहलवानी का शृंगार है और उससे घबराना नहीं चाहिए."
क्या है सोनम का सपना?
साक्षी मलिक को हराने वाले मुक़ाबले को याद करते हुए वह कहती हैं, "62 किलोग्राम की वज़न श्रेणी में जाते वक्त लोगों ने सलाह दी कि इस कैटिगरी में आगे बढ़ना मुश्किल है क्योंकि ओलंपिक मेडलिस्ट साक्षी मलिक भी इसी वर्ग में खेलती हैं. लेकिन मेरी भी ज़िद थी कि मुझे इसी कैटिगरी में मुक़ाबला करना है क्योंकि सामने साक्षी मलिक हैं. अगर साक्षी को हरा दिया तो ओलिंपिक मेडल भी पक्का समझो और वही हुआ"
फिलहाल सोनम ओलिंपिक ट्रायल के लिए तैयारी कर रही हैं.
वो कहती हैं, "मैंने साक्षी को हराया है तो ओलिंपिक 2020 में कम से कम गोल्ड मेडल तो लेकर ही आऊंगी."
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