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मंगलवार, 13 मई, 2008 को 11:08 GMT तक के समाचार
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प्रदूषण से ख़ून जम जाने का ख़तरा
प्रदूषण
वायुमंडल में हर 10 माइक्रोग्राम प्रदूषण बढ़ने से खून जमने का ख़तरा 70 प्रतिशत बढ़ जाता है
एक अमरीकी अध्ययन में पाया गया है कि प्रदूषित हवा और ट्रैफ़िक के धुएँ से जिस्म के अंदर ख़ून के जम जाने का ख़तरा बढ़ जाता है.

'हार्वर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ' में किए गए इस अध्ययन के अनुसार जैविक ईंधन के जलने से जो धुआँ निकलता है उसमें बेहद छोटे आकार के ऐसे रासायनिक कण होते हैं. इनसे हृदय रोग का ख़तरा बढ़ जाता है.

इन कणों की वजह से खून इतना गाढ़ा हो जाता है कि हृदय गति तक रुक सकती है.

इस शोध के दौरान ये भी पता चला कि धुएँ और प्रदूषण से निकलने वाले ये ज़हरीले रासायनिक कण पैरों की धमनियों में बहने वाले खून को भी गाढ़ा कर देते हैं जिससे ‘डीप वेन थ्रॉमबॉसिस’ यानी ‘डीवीटी’ या ‘धमनियों में अवरोध’ का ख़तरा बढ़ जाता है.

वैज्ञानिकों ने इस शोध के लिए तक़रीबन 2000 लोगों को चुना था. वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रदूषण से खून चिपचिपा और गाढ़ा हो जाता है.

गाढ़ापन

शोध में ये बात भी सामने आई कि चुने गए 2000 लोगों में से यूरोप के शहर इटली के रहने वाले 900 लोगों में धमनियों में अवरोध यानी डीवीटी की बीमारी पैदा हो गई.

 वायु प्रदूषण से धमनियों के अंदर खून के थक्के जम जाने की आशंका बढ़ जाती है

इन लोगों के खून में 'ब्लड क्लॉट' या खून के थक्के देखे गए. खून के ये थक्के पैरों की धमनियों से होते हुए फेफड़ों में पहुँच कर एक बड़ा ख़तरा पैदा कर सकते हैं.

वैसे 'डीवीटी' यानी धमनियों में खून के जम जाने का ख़तरा उन लोगों को ज़्यादा होता है जो ज़्यादा देर तक एक ही जगह बैठकर काम करते हैं.

जैसे, हवाई या रेल यात्रा के दौरान ज़्यादा देर तक एक ही जगह पर बैठे रहना या फिर दफ़्तरों में एक ही जगह पर बैठकर काम करना.

इसी लिए सलाह दी जाती है कि दफ़्तरों में आप एक ही जगह पर बैठकर काम न करें बल्कि बीच-बीच में अपनी कुर्सी पर ही कुछ हल्की-फुल्की कसरत कर लें या फिर चलते फिरते काम करें.

क्या हैं आंकड़े ?

वैज्ञानिकों ने इस शोध के दौरान उन इलाक़ों के प्रदूषण के नमूने भी लिए जिन जगहों पर ये लोग रहते हैं.

प्रदूषण
दुनिया के कई शहरों के अलावा भारत में सभी महानगर प्रदूषण से परेशान हैं

किसी शख्स के खून में इन ज़हरीले रासायनिक कणों की मात्रा के हर 10 माइक्रोग्राम बढ़ने पर डीवीटी का ख़तरा 70 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

प्रदूषण विभाग के अनुसार भी वातावरण में इन छोटे रासायनिक कणों की मात्रा 50 माइक्रोग्राम से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.

इस शोध को अंजाम देने वाले डॉक्टर एंद्रिया बासारेली कहती हैं, "हमारे शोध के मुताबिक़ प्रदूषण बढ़ने से किसी भी शख्स में डीवीटी का ख़तरा बढ़ जाता है."

डीवीटी चैरिटी लाइफ़ब्लड के निदेशक डॉक्टर बेवेरली हंट कहते हैं, "पिछले कुछ दिनों से चल रहे हमारे शोध से ये बात सामने आई है कि वायु प्रदूषण से दिल की बीमारियों और हृदय गति रुक जाने का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है."

"इस शोध से पहली बार पता चला है कि वायु प्रदूषण से धमनियों के अंदर खून के थक्के जम जाने की आशंका बढ़ जाती है."

वैज्ञानिक मानते हैं कि थोड़ी ही कोशिशों से वायु प्रदूषण को आसानी से काबू में किया जा सकता है.

वैसे, अमरीका में हुई इस खोज के बाद ये कहा जा सकता है कि भारत में महानगरों के अलावा कानपुर, पुणे और दूसरे शहरों में दिल के मरीज़ों की संख्या क्यों तेज़ी से बढ़ रही है.

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