|
'प्रदूषण से चावल की पैदावार प्रभावित' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक शोध के मुताबिक भारत में चावल की कम होती पैदावार का कारण प्रदूषण के बादल हो सकते हैं. एक अमरीकी दल ने पता लगाया है कि ज़्यादातर दक्षिणी एशिया में भूरे रंग के बादल हैं जो धूप और बारिश को कम करते हैं जिससे चावल की फ़सल पर बुरा असर पड़ता है. शोध दल ने ये भी पता लगाया है कि ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ी हुई मात्रा के कारण भी पैदावार प्रभावित होती है. कुछ शोधकर्ताओं ने अभी एक दिन पहले ही कहा है कि बदले हुए गर्म मौसम को देखते हुए नई फ़सलों की ज़रूरत है जो नए मौसम के मुताबिक ख़ुद को ढाल सकें. तापमान पर असर वर्ष 1980 के बाद से ही भारत में चावल की पैदावार में कमी देखी जा रही है और आशंका जताई जा रही है कि चावल की भारी कमी हो सकती है. इसके कारण खोजने के लिए शोधकर्ताओं ने भूरे बादलों के असर के बारे में शोध किया जो एशियाई इलाक़े पर छाए रहते हैं. विश्व भर में दक्षिण एशिया ऐसा इलाक़ा है जहाँ सबसे ज़्यादा भूरे बादल छाए रहते हैं. प्रदूषित बादल आमतौर पर ईंधनों और दूसरे जैविक पदार्थों को जलाने से बनते हैं. ये बादल सूर्य की गर्मी को धरती तक पहुँचने से रोकते हैं जिससे धरती पर मौसम ठंडा हो जाता है. हाल के शोध से पता चला है कि इससे बारिश पर भी असर पड़ता है. 'नई प्रजातियों की ज़रूरत'
शोधकर्ताओं ने भारत में चावल की पैदावार के पुराने आँकड़ों का अध्ययन किया और उस पर प्रदूषित बादलों के असर के बारे में पता लगाया. कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के मैक्सीमिलियन ऑफ़हैमर ने बताया, "हमने पाया कि अगर 1985 से लेकर 1998 के बीच भूरे बादल नहीं होते तो चावलों की पैदावार 11फ़ीसदी ज़्यादा होती." उन्होंने कहा कि इन बादलों के चलते रात में तापमान कम हो जाता है जो फ़सल के लिए अच्छा है पर साथ ही प्रदूषित बादलों के चलते बारिश भी कम हो जाती है यानी इन बादलों से होने वाले नुकसान ज़्यादा हैं. मैक्सीमिलियन ऑफ़हैमर ने बीबीसी को बताया कि कई शोधकर्ताओं के मुताबिक इन बादलों को कम करने से तापमान बढ़ेगा और चावल की पैदावार और कम हो सकती है. इसका कारण ये बताया गया है कि पूर्व के शोध के मुताबिक ग्रीनहाउस गैसों से जो तापमान बढ़ता है, भूरे बादल उस असर को कम कर सकते हैं. लेकिन मैक्सीमिलियन ऑफ़हैमर ने बताया कि सिर्फ़ भूरे बादलों को कम करना या साथ में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में कटौती से चावलों की पैदावार बढ़ सकती है. उन्होंने कहा कि अभी सिर्फ़ उन इलाकों का अध्ययन किया गया है जहाँ फ़सल के लिए बारिश के पानी का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन जिन इलाक़ों में दूसरे सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल होता है वहाँ भूरे बादलों का असर कम होगा. विकासशील देशों में खेती का अध्ययन करने वाली संस्था सीजीआईएआर ने सोमवार को कहा था कि चावल समेत अन्य फ़सलों की कई प्रजातियाँ तैयार करने की ज़रूरत है. मैक्सीमिलियन ऑफ़हैमर ने कहा कि शोध से पता चलता है कि अगर प्रदूषण के बादलों को कम किया जाए तो पैदावार बढ़ सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें अब होगी वाटरप्रूफ़ धान की खेती18 अगस्त, 2006 | विज्ञान आने वाली पीढ़ियों के लिए ख़ास व्यवस्था20 जून, 2006 | विज्ञान अब विटामिन ए वाला 'सुनहरा चावल'28 मार्च, 2005 | विज्ञान दुनिया का 'सबसे पुराना' चावल22 अक्तूबर, 2003 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||