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औद्योगिक प्रदूषण से त्रस्त छत्तीसगढ़ के शहर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ राज्य बन गया. वहाँ ज़बरदस्त औद्योगिक विकास हो रहा है. वह देश के चुनिंदा राज्यों में से है जहाँ बिजली ज़रुरत से अधिक बनती है. लेकिन फिर भी लोग ख़ुश नहीं हैं. नाराज़ हैं. उनकी नाराज़गी की मुख्य वजह देखें तो विकास, औद्योगिकीकरण और बिजली का उत्पादन ही बना हुआ है. दरअसल पिछले एक दशक में राज्य में जिस बेतरतीबी से औद्योगिक विकास हुआ है उसने समस्याएँ ही खड़ी की हैं. एक ओर जब दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता जताई जा रही है. तब लगता है कि एक सुदूर राज्य में यह कोई मुद्दा ही नहीं है. वरदान ही बना अभिशाप कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ को प्रकृति का वरदान मिला हुआ है. राज्य बनने के बाद की स्थित देखें तो 44 फ़ीसदी ज़मीन पर जंगल हैं, कच्चे लोहे, कोयले और चूना पत्थर का अथाह भंडार है और कई सदानीरा नदियाँ हैं. पिछले दस सालों में इन प्राकृतिक भंडारों का दोहन काफ़ी तेज़ी से होने लगा है. कोयले और कच्चे लोहे के चलते राज्य में एक के बाद एक बिजली घर और इस्पात संयंत्र स्थापित होते जा रहे हैं. राज्य सरकार चाहती है कि वहाँ पचास हज़ार मेगावाट बिजली का उत्पादन होने लगे. इस्पात संयंत्र में राज्य वैसे भी देश का अग्रणी राज्य है. चूना पत्थर के कारण राज्य में सीमेंट संयंत्रों की भी कतार लगी हुई है. इन तीनों ही तरह के उद्योगों की दिक्कत यह है कि सभी भारी प्रदूषण फैलाने वाली हैं और उनके रोकने के उपाय बहुत कम हैं. काला ही काला छत्तीसगढ़ में साठ के दशक में भिलाई इस्पात संयंत्र ही एक मात्र बड़ी औद्योगिक इकाई था. लेकिन आज भिलाई इस्पात संयंत्र जैसे कई भीमकाय उद्योग खड़े हैं. स्पाँज आयरन संयंत्रों की संख्या सौ से अधिक जा पहुँची है. फिर फ़ेरो अलॉयज़ संयंत्र और री-रोलिंग मिल अलग.
इन सभी संयंत्रों में कच्चे लोहे के अलावा कोयले का उपयोग होता है. इन संयंत्रों से निकलने वाले धुँए ने छत्तीसगढ़ के कई शहरों को इतना प्रदूषित कर दिया है मानों ये शहर कालिख़ के नीचे डूबे जा रहे हैं. रायगढ़ शहर की एक गृहणी निर्मला देवी कहती हैं, "अब तो घरों में काम करने वाली नहीं मिलतीं. वे कहती हैं कि उनका काम इतना बढ़ गया है कि उनके लिए काम करना कठिन हो रहा है." निर्मला देवी इसे समझाती हैं, "पहले एक बार पोछा लगाने से काम चल जाता था लेकिन अब चार बार भी पोछा लगे तो भी काला-काला दिखता है." वे बताती हैं कि बाहर सूखने को डाले गए कपड़े काले हो जाते हैं और पूरी छत काली-काली दिखती हैं. राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्र सिलतरा के पास के गाँव बहेसर के किसान रामकुमार परगनिहा कहते हैं, "जब से उद्योग लगे हैं सब कुछ काला हो रहा है. खेत काले हैं, उसमें धान उगाएँ तो वह भी काला ही दिखता है." जबकि गाँव सोंड्रा के एक छोटे किसान महेश कुमार निषाद कहते हैं, "काले धुँए के कारण खेतों में कुछ पैदा होना ही बंद हो रहा है. मैंने अपने एक सवा एकड़ के खेत में पिछले दो साल से फसल ही नहीं ली है." ग्रामवासी बताते हैं कि तालाब की सतह पर सुबह एक काली सतह जमी हुई दिखती है. घर की टंकी पर भी ऐसी ही परत जम जाती है. इस पानी में नहाना धोना भी कठिन होने लगा है. रामकुमार परगनिहा कहते हैं कि गाय का गोबर काला हो गया है और लोगों को साँस की बीमारियाँ हो रही हैं. लोगों का कहना है कि ये उद्योग धुँए में कोयले और लोहे के कण रोकने के लिए लगाए जाने वाली मशीन इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर (ईएसपी) का उपयोग नहीं करते. योजना की गड़बड़ी इन शिकायतों के बारे में उद्योगों का रुख़ जानने की कोशिश की तो आश्चर्य हुआ कि सिलतरा स्पाँज आयरन एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल नचरानी ने स्वीकार कर लिया कि इन उद्योगों से थोड़ा प्रदूषण तो होगा ही. वे कहते हैं, "एक इस्पात संयंत्र में कम से कम सात-आठ हज़ार टन कोयला जलता है अब इतना कोयला जलेगा तो थोड़ा तो काला धुँआ उठेगा ही." ईएसपी का उपयोग न किए जाने की शिकायतों के बारे में वे कहते हैं कि बिजली चले जाने और मशीनी ख़राबी आने पर ही ईएसपी को बंद किया जाता है. लेकिन लोग बताते हैं कि लगभग सभी उद्योगों में शाम सात बजे के बाद सुबह छह-सात बजे तक ईएसपी चलता ही नहीं.
कारण साफ़ है कि जितनी बिजली इस्पात संयंत्र चलाने के लिए चाहिए, उतनी ही बिजली ईएसपी को चलाने के लिए चाहिए. ऐसे में लाभ पर तो असर पड़ने लगता है. देवजी पटेल राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं और औद्योगिक प्रदूषण के ख़िलाफ़ अपनी ही सरकार से खुली लड़ाई लड़ रहे हैं. वे प्रदूषण की इन शिकायतों की पुष्टि करते हैं और बताते हैं कि ऐसा दरअसल योजना की गड़बड़ी से हुआ है. वे बताते हैं कि सरकारों और प्रदूषण विभाग ने बिना औद्योगिक क्षेत्र (ग्रोथ सेंटर) बनाए उद्योग लगाने की अनुमति दी और इससे हुआ यह कि कृषि भूमि लेकर यहाँ वहाँ उद्योग लग गए. इससे खेती तो बर्बाद हुई ही, आसपास के खेती बर्बाद हो गई और शहर धुएँ से पट रहे हैं. उद्योगपतियों के प्रवक्ता के रुप में अनिल नचरानी कहते हैं, "स्पाँज आयरन संयंत्र एक दूसरे से दस-बारह किलोमीटर की दूरी पर होना चाहिए लेकिन रायपुर और रायगढ़ में तो ये एक दूसरे से सटे हुए हैं." धुँआ और राख भी उधर बिजली घरों की दिक्कतें दूसरी हैं. वहाँ से कोयले का धुँआ तो है साथ ही कोयले से निकले वाली राख की दिक्कत भी कम नहीं है. कोरबा शहर में इस समय चार हज़ार मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है और अगले कुछ महीनों में यह उत्पादन बढ़कर दस हज़ार मेगावाट हो जाएगा. इसके लिए हर दिन हज़ारों टन कोयला रोज़ जलता है.
इन बिजली घरों से कोयले के काले धुएँ के अलावा सफ़ेद राख भी निकलती है. इस राख को इकट्ठा करने के लिए बड़े बाँध बनाए गए हैं. इन्हें 'राखड़-बाँध' कहा जाता है. कोरबा के एनटीपीसी संयंत्र के लिए एक हज़ार एकड़ का एक 'राखड़-बाँध' बनाया गया था और कहा गया था कि यह पच्चीस साल में भरेगा लेकिन यह आधे समय में ही भर गया. इस 'राखड़-बाँध' की राख का कोई उपयोग आमतौर पर नहीं होता और साफ़ दिखता है कि एक हज़ार एकड़ में बंजर ज़मीन का टुकड़ा तैयार हो गया है. बात यहीं खत्म नहीं होती. जैसा कि सामाजिक कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं, "इस राख में हेवी मेटल्स हैं और ये धीरे-धीरे ज़मीन के नीचे पानी में जा रहे हैं." "इस प्रदूषण से विकलाँग बच्चा पैदा होने से लेकर गर्भपात तक कई बीमारियाँ हो रही हैं." जब तेज़ हवा चलती है तो पूरा कोरबा शहर इस राख से ढँक जाता है. शहर के लोग कहते हैं, "" 'दबाव बरकरार' इन उद्योगों के प्रदूषण पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी प्रदूषण नियंत्रण विभाग की है. इस विभाग के अधिकारी दावा करते हैं कि उद्योगों पर दबाव बना हुआ है और उद्योगों ने पहले जो भी किया हो, अब वे नियम-क़ायदों का पालन कर रहे हैं. रायगढ़ के क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी एसके शर्मा आँकड़ों के कागज़ात देकर बताते हैं कि हवा में ज़हरीली गैसें सीमा में हैं. ठोस कणों के बारे में, जिसमें कोयला, लोहा और धूल शामिल हैं, वे कहते हैं, "इसके लिए उद्योग से ज़्यादा शहर की दूसरी गतिविधियाँ दोषी हैं. जिसमें ट्रैफ़िक भी है." वे कहते हैं कि पूरे देश में उद्योगों के ख़िलाफ़ जितने मुक़दमे नहीं हुए, उससे ज़्यादा अकेले छत्तीसगढ़ में दायर किए गए हैं. इस तर्क में यह आशंका छिपी हुई है कि हो सकता है कि देश भर के उद्योग उतना प्रदूषण न फैला रहे हों जितना छत्तीसगढ़ के उद्योग फैला रहे हों. | इससे जुड़ी ख़बरें गैस सोखने की क्षमता ख़तरे में17 मई, 2007 | विज्ञान जलवायु परिवर्तन पर पहल की ज़रूरत04 मई, 2007 | विज्ञान धनी और ग़रीब देशों में फिर खींचतान02 मई, 2007 | विज्ञान वनों से बढ़ता पृथ्वी का तापमान!10 अप्रैल, 2007 | विज्ञान मानवीय गतिविधियों से ही चढ़ा पारा01 फ़रवरी, 2007 | विज्ञान अंटार्कटिका में मोटी होती बर्फ़ की परत22 मई, 2005 | विज्ञान धुएँ ने ही बढ़ाया पृथ्वी का तापमान18 फ़रवरी, 2005 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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