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'ज़्यादा बायोफ़्यूल ग़रीबों के लिए घातक' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटिश सहायता एजेंसी ऑक्सफ़ैम ने यूरोपीय संघ को चेतावनी दी है कि बायोफ़्यूल का उपयोग बढ़ाने की योजना दुनिया के ग़रीबों के लिए घातक साबित हो सकती है. ऑक्सफ़ैम की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि बायोफ़्यूल का प्रयोग बढ़ने का असर मनुष्यों और पर्यावरण दोनों पर होगा. एजेंसी का कहना है कि इससे एशिया और अफ़्रीका में ज़मीन को लेकर मारामारी बढ़ जाएगी. बायोफ़्यूल को प्राकृतिक ईंधन कहा जाता है और आमतौर पर यह ज्वार और गन्ने के पौधों से बनाया जाता है. ग़रीबों पर असर यूरोपीय संघ कार्बनडाय ऑक्साइड के उत्सर्जन को घटाने के लिए तत्पर दिखती है. और इसके लिए यूरोपीय संघ ने कहा है कि वर्ष 2020 तक परिवहन में उपयोग में आने वाले ईंधन का दस प्रतिशत हिस्सा बायोफ़्यूल का होगा. हालांकि यूरोपीय संघ ने कहा है कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि बायोफ़्यूल के उत्पादन से पर्यावरण को कोई नुक़सान न पहुँचे. लेकिन बायोफ़्यूल को लेकर आए रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि दरअसल बायोफ़्यूल से कार्बन गैसों का उत्सर्जन बढ़ेगा क्योंकि इसके निर्माण में ज़्यादा ईंधन लगता है. दूसरी ओर ऐसी भी रिपोर्टें भी हैं कि बायोफ़्यूल बनाने में उपयोग में आने वाले पौधों के लिए जंगलों की कटाई की जा रही है. अब ऑक्सफ़ैम ने चेतावनी दी है कि बायोफ़्यूल मनुष्यों को भी सुरक्षा प्रदान नहीं करता. एजेंसी का कहना है कि कम मात्रा में बायोफ़्यूल के उत्पादन से तो ग़रीब किसानों को ईंधन मिलता और उनको कुछ आय हो सकती है. लेकिन बायोफ़्यूल के औद्योगिक उत्पादन से इंडोनेशिया, कोलंबिया, ब्राज़ील, तंज़ानिया और मलेशिया में ग़रीब लोग अपनी ज़मीन से वंचित हो गए हैं, कामगारों का शोषण हो रहा है और वहाँ खाद्यपदार्थों की क़ीमतें बढ़ीं हैं. ऑक्सफ़ैम की रिपोर्ट के लेखक डेविड स्ट्राहान ने कहा है, "इससे ग़रीबों से आजीविका छीन सकती है और अमीर देशों की ईंधन की ज़रुरतों की पूर्ति और ग़रीबों की खाद्य ज़रुरतों के बीच प्रतिस्पर्धा शुरु हो सकती है." लेकिन यूरोपीय संघ ने कहा है कि वे यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि बायोफ़्यूल की योजना से विकासशील देशों पर कोई असर न हो. |
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