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बायो-डीज़ल से दौड़ रही हैं गाड़ियाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ के गाँवों में 'रतनजोत' नाम के फल के बीज से अब तक दिया जलाया जाता था लेकिन अब इसका इस्तेमाल वैकल्पिक ईंधन यानी 'बायो-डीज़ल' के तौर पर होने लगा है. राजधानी रायपुर समेत राज्य के कई हिस्सों में इस तेल से डीज़ल से चलने वाली कई गाड़ियाँ सड़क पर दौड़ रही हैं. राज्य सरकार इस वर्ष अप्रैल तक प्रत्येक ज़िला मुख्यालय में रतनजोत के तेल के पंप भी स्थापित करने जा रही है. इसने ग्रामीणों में एक नई उम्मीद जगा दी है. हालाँकि रतनजोत के तेल से होने वाले नुक़सान को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं. लेकिन राज्य के मंत्री, कलेक्टर से लेकर पंचायतकर्मी तक सभी फ़िलहाल रतनजोत उगाने के फ़ायदे गिना रहे हैं. रतनजोत 'यूफोर्बियेसी' परिवार और अमेरिकी मूल के 'जैट्रोफा' यानी रतनजोत का अब तक खेतों को पशुओं से बचाने के लिए बाड़ के रुप लगाया जाता रहा है. स्थानीय लोग इसे 'बगरंडी' के नाम से भी जानते हैं और इसके तेल का उपयोग दिया जलाने के लिए और बैलगाड़ी के पहियों में चिकनाई के रुप में पता नहीं कब से करते आ रहे हैं. छत्तीसगढ़ के जंगलों और बंजर इलाको में भी यह पौधा बड़े पैमाने पर पाया जाता है.
प्रतिकूल मौसम व जलवायु में जहां दूसरी प्रजाति के पौधे पनप भी नहीं पाते, वहाँ भी रतनजोत के पौधे आसानी से फलते-फूलते हैं. लगभग 3 से 4 मीटर तक की ऊँचाई वाले इस पौधे में छोटे-छोटे फल लगते हैं, जिनके बीज से तेल निकाला जाता है. डीज़ल की जगह इसी तेल का इस्तेमाल किया जा रहा है. राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जब छत्तीसगढ़ के दौरे पर आए तो प्रतीक के बतौर राष्ट्रपति भवन में लगाने के लिए रतनजोत का पौधा ले गए और जाते-जाते राज्य सरकार को इसके व्यावसायिक उत्पादन और डीज़ल की जगह इसके इस्तेमाल की भी सलाह दी. राष्ट्रपति की सलाह काम कर गई. आज की तारीख़ में डीज़ल के इस वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर बेहद उत्साहित राज्य सरकार ने राज्य में बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण का गठन कर दिया है. लक्ष्य मुख्यमंत्री रमन सिंह ने दावा किया है कि आने वाले 10 सालों में राज्य के वाहन और विभिन्न संसाधनों में डीज़ल की जगह 50 प्रतिशत तक रतनजोत के तेल का इस्तेमाल होने लगेगा.
देश में अपनी तरह की इस पहली योजना के अनुरुप आने वाले दिनों में राज्य के विभिन्न हिस्सों में 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में रतनजोत की खेती करने का लक्ष्य रखा गया है. रतनजोत के प्रसंस्करण के लिए मशहूर लंदन की डी-वन ऑयल नामक कंपनी ने सरकार को इस क्षेत्र में मदद का प्रस्ताव दिया है. हिन्दुस्तान पेट्रोलियम, भारतीय रेलवे और इंडियन ऑयल जैसी कंपनियों ने तो राज्य सरकार से अनुबंध के लिए पहले से ही न केवल प्रस्ताव दिया है, बल्कि अमानत राशि भी जमा कराई है. रतनजोत के तेल की लोकप्रियता के पीछे एक बड़ा कारण डीज़ल की तुलना में इसकी कम क़ीमत है. बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण का दावा है कि रतनजोत से निकला तेल डीज़ल की तुलना में कम से कम 8-9 रुपए सस्ता होगा. इसके अलावा इस तेल के इस्तेमाल से प्रदूषण पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा. सवाल भी कई लेकिन रतनजोत के उत्पादन व उपयोग को लेकर उठने वाले सवाल भी कम नहीं हैं. आस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने इस पौधे को अवांछित घोषित कर रखा है. शोधकर्ता बताते हैं कि थाईलैंड और अफ़्रीकी देशों में पहले ही इस पौधे को बायो-डीज़ल के बतौर इस्तेमाल करने का काम शुरु किया गया था लेकिन विभिन्न शोधों से पता चला कि रतनजोत का तेल पर्यावरण के लिए तो घातक है ही, मानव स्वास्थ्य के लिए भी यह लगभग जानलेवा है. ऐसे निष्कर्षों के बाद इन देशों में रतनजोत के बीज से बायो-डीज़ल की योजना ने दम तोड़ दिया. राज्य के युवा औषधि वैज्ञानिक व पर्यावरणविद् पंकज अवधिया का कहना है कि बायो-डीज़ल बनाने के लिए जिन सात पौधों का इस्तेमाल दुनिया भर में हो रहा है, उसमें रतनजोत अंतिम विकल्प माना जाता है. इसके पीछे रतनजोत के विषैले होने को मुख्य कारण बताते हुए पंकज कहते हैं-“ रतनजोत बेहद नुक़सानदेह है, इसमें पाये जाने वाले करसिन की मारक क्षमता इस हद तक है कि इसका इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने में किया जाता है. इसके तेल में 12 डी आक्सी, 16 हाईड्राक्सी और फोरबेल जैसे रसायन पाए जाते हैं, जिन्हें कैंसर व दूसरे त्वचा रोगों के लिए जिम्मेवार माना जाता है. इसके अलावा रतनजोत से बनने वाला बायो-डीज़ल फेफ़ड़ों को भी नुकसान पहुँचाता है.” लेकिन छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री ननकी राम कंवर रतनजोत से होने वाले नुकसान को लेकर अपनी अनभिज्ञता दर्शाते हैं. वे कहते हैं- "हमने तो अभी रतनजोत की खेती करना शुरु किया है. इसके क्या-क्या दुष्परिणाम हैं, ये हमें अभी कैसे पता चलेगा ? अभी इसका एकमात्र उद्देश्य तो राज्य को अधिकतम बायो-डीज़ल निर्भर बनाना और लोगों को अधिकतम मुनाफा दिलाना है. जब ऐसी कोई परेशानी होगी तब उसके बारे में भी सोचेंगे. वैसे भी ये वैज्ञानिकों का सरदर्द है, मेरा नहीं." ज़ाहिर है, अभी राज्य सरकार की दिलचस्पी केवल रतनजोत के तेल और उसकी धार देखने में है. |
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