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शराब नहीं, डीज़ल-पेट्रोल बनेगा महुआ से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महुआ की मादक गंध और महुआ से शराब बनाने की बात अब पुरानी हो चली है. छत्तीसगढ़ सरकार अब महुआ से पेट्रोल और डीज़ल बनाने की तैयारी कर रही है. दुपहिया और चारपहिया वाहनों के किसी भी कल-पुर्जे में बिना कोई परिवर्तन किए डीज़ल के साथ 20 प्रतिशत तक महुआ के तेल का इस्तेमाल पहले भी ग्रामीण इलाक़ों में होता रहा है. अल्कोहल के कारण शौकिया तौर पर शराब डाल कर वाहन चलाने के किस्से भी दुनिया भर में आम हैं. लेकिन अब केवल महुआ से बायोडीज़ल और पेट्रोल को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार काफी गंभीर है. छत्तीसगढ़ में पिछले एक साल से रतनजोत यानी जैट्रोफ़ा से डीज़ल बनाने की योजना पर जोरशोर से काम चल रहा है. सरकार का दावा है कि पिछले एक साल में ही राज्य में रतनजोत के 6 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं. इस साल लगभग 16 करोड़ रतनजोत लगानी की योजना है. आलम यह है कि देश के दूसरे राज्य भी छत्तीसगढ़ की देखा-देखी रतनजोत से बॉयोडीज़ल बनाने के लिए राज्य सरकार की मदद ले रहे हैं. लोकप्रिय महुआ रतनजोत के प्रयोग से उत्साहित छत्तीसगढ़ की सरकार महुआ से डीज़ल और एथेनॉल बनाने को लेकर उत्साहित है.
राज्य में बड़े पैमाने पर महुआ का उत्पादन होता है और राज्य में वनोपज से होने वाली 1700 करोड़ रुपए की आय में इसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है. हर साल राज्य में लगभग 25 लाख क्विंटल महुआ का उत्पादन होता है. लेकिन इसका उपयोग अब तक केवल शराब बनाने के लिए ही होता रहा है. बस्तर से लेकर सरगुजा तक के हाट-बाज़ार में बिकने वाली महुए की शराब छत्तीसगढ़ में ख़ूब लोकप्रिय है. लेकिन अब बॉयोडीज़ल बनाने की घोषणा ने राज्य भर में एक नयी बहस छेड़ दी है. फ़ायदा वैज्ञानिको की राय में डीज़ल में महुआ के तेल के इस तरह की मिलावट से इंजन की दबाव क्षमता 16 : 1 से बढ़कर 20: 1 तक हो जाती है जिसे वैज्ञानिक अच्छा संकेत मानते हैं. हालांकि डीज़ल इंजन वाले वाहन केवल महुआ के तेल से भी चलाए जा सकते हैं लेकिन इसके तेल की अत्याधिक चिपचिपाहट इंजन को कमज़ोर कर देती है. दूसरी ओर डीज़ल इंजन या आईसी इंजन वाले वाहनों में इंधन के लिए केवल एथेनॉल और महुआ के तेल के मिश्रण का इस्तेमाल आश्चर्यजनक रुप से डीज़ल से ज़्यादा फ़ायदेमंद पाया गया है. पेट्रोल की जगह सीधे तौर पर एथेनॉल के प्रयोग का भी चलन है. ब्राज़ील, कोलंबिया और अमरीका में पहले से ही एथेनॉल के लिए गन्ना और मक्के की फसल का इस्तेमाल होता रहा है. दुनिया भर में हुए प्रयोगों के बाद छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा प्राधिकरण ने भी महुआ के बीज से निकले तेल और महुआ के फूल को लेकर कई प्रयोग किए. इन प्रयोगों से ख़ासे उत्साहित प्राधिकरण के कार्यपालक निदेशक शैलेन्द्र कुमार शुक्ला कहते हैं, “हमने पाया कि राज्य में अगर महुआ का इस्तेमाल बॉयोडीज़ल के रुप में हो, तो आने वाले कुछ ही सालों में हम बॉयोडीज़ल के मामले में आत्मनिर्भर हो सकते हैं.” जीवन स्तर राज्य के वन मंत्री ननकी राम कंवर तो अपने सरकारी घर की चाहरदीवारी में महुआ से शराब बना रहे हैं और अपनी पहचान के लोगों के सामने पेट्रोल की जगह मोटरसाइकल में महुआ डाल कर उसे चला रहे हैं. कंवर का कहना है कि महुआ की शराब के साथ एक चौथाई पेट्रोल मिलाकर चलाने से मोटरसाइकल पहले से ज़्यादा अच्छी चल रही है. वन मंत्री को उम्मीद है कि महुआ से एथेनॉल और डीज़ल बनाने की योजना राज्य के आदिवासियों के जीवन स्तर को भी ऊंचा उठाएगी. वन विभाग की योजना है कि बिड़ी पत्ता की तरह ही महुआ का भी मूल्य निर्धारण हो और उसकी नीलामी हो. उपयोगिता का सवाल लेकिन छत्तीसगढ़ बायोफ़्यूल विकास प्राधिकरण के सदस्य और राज्य के सुप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. संकेत ठाकुर महुआ से बॉयोडीज़ल बनाने की योजना को सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू से भी जोड़ कर देखने पर ज़ोर देते हैं. उनका कहना है कि महुआ का इस्तेमाल खाद्य तेल के रुप में भी होता है. ऐसे में इस बात को भी देखने की ज़रुरत है कि कितनी मात्रा में महुआ इंधन के लिए मिल पाएगा.
डॉ. संकेत कहते हैं- “महुआ का तेल अभी भी बाज़ार में 30 से 40 रुपए लीटर मिलता है. जब इंधन के बतौर इसका इस्तेमाल शुरु होगा तो ज़ाहिर तौर पर इसकी क़ीमत अधिक हो जाएगी. ऐसे में महुआ के तेल का बॉयोडीज़ल के बतौर इस्तेमाल महंगा विकल्प हो सकता है.” दूसरी ओर राज्य में रतनजोत से डीज़ल बनाने की योजना के खिलाफ “नो जैट्रोफ़ा” अभियान चलाने वाले कृषि वैज्ञानिक पंकज अवधिया मानते हैं कि रतनजोत की तुलना में महुआ से बायोडीज़ल बनाना बेहतर होगा. लेकिन पंकज की राय है कि राज्य को बॉयोडीज़ल की प्रयोगशाला बनाने के बजाय सरकार रतनजोत, महुआ, करंज या नीम आदि पौधों की उपलब्धता और नफ़ा-नुकसान को भी देख कर अपनी प्राथमिकता तय करे. पंकज इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि बॉयोडीज़ल के मामले में ऑटो-मोबाइल उद्योग की कभी भी राय लेने की ज़रुरत नहीं समझी गई. ऐसे में राज्य में चल रहे तरह-तरह के प्रयोगों की सफलता असंदिग्ध नहीं है. | इससे जुड़ी ख़बरें बायो-डीज़ल से दौड़ रही हैं गाड़ियाँ20 फ़रवरी, 2005 | भारत और पड़ोस धुएँ ने ही बढ़ाया पृथ्वी का तापमान18 फ़रवरी, 2005 | विज्ञान 'ईंधन की कमी से जन्म दर घटेगी'13 फ़रवरी, 2004 | विज्ञान साफ ईंधन की तलाश29 जनवरी, 2003 | विज्ञान जीएम फ़सलों से वन्य जीवन को ख़तरे16 अक्तूबर, 2003 | विज्ञान इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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