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सिंचाई के लिए रसोई गैस का इस्तेमाल! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ के किसान इन दिनों रसोई गैस की किल्लत से परेशान हैं क्योंकि इस किल्लत की वजह से उनके लिए खेतों में लगी फसल की सिंचाई करना मुश्किल हो रहा है. रसोई गैस और सिंचाई का क्या रिश्ता? चौंक गए न! लेकिन ये सच है. छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्यप्रदेश के कई इलाकों में किसान आजकल रसोई गैस का इस्तेमाल खेतों में फसलों की सिंचाई के लिए ही कर रहे हैं. डीज़ल से चलने वाले जनरेटर को रसोई गैस के सिलेंडर से जोड़ कर मोटर पंप चलाने की यह तकनीक गांव-गांव में लोकप्रिय हो रही है. बिजली की समस्या और डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों से जुझ रहे किसानों के लिए रसोई गैस से सिंचाई का विकल्प वरदान साबित हुआ है. ये और बात है कि सिंचाई का यह तरीक़ा ग़ैरक़ानूनी है. सिंचाई के लिए रसोई गैस के इस्तेमाल की शुरुआत कहाँ से हुई, यह पता लगा पाना तो बेहद मुश्किल है लेकिन इसकी तकनीक इतनी सरल है कि इसके इस्तेमाल के लिए किसी मैकेनिक की भी ज़रुरत नहीं पड़ती. डीज़ल से चलने वाले जनरेटर के एयर फिल्टर में रसोई गैस की पाईप को नोज़ल से जोड़ा जाता है. जब डीज़ल पंप स्टार्ट होता है तो उसके डीज़ल आपूर्ति करने वाले पाईप को लगभग बंद कर दिया जाता है. इसके बाद रसोई गैस के रेग्यूलेटर को चालू कर दिया जाता है. इससे तेज़ी के साथ रसोई गैस की आपूर्ति एयर फ़िल्टर के लिए लगे पाईप में होती है औऱ जनरेटर गैस ख़त्म होने तक चलता रहता है. इस तरह से एक रसोई गैस सिलेंडर और 3 लीटर डीज़ल से लगभग 25 घंटे तक जनरेटर और पंप चलाया जा सकता है जबकि 25 घंटे तक खेतों की सिंचाई के लिए डीज़ल से जनरेटर चलाने पर दो हज़ार रुपए से अधिक की लागत आती है. रसोई गैस की मदद से खेतों में सिंचाई करने वाले धमतरी के एक किसान कहते हैं, “रसोई गैस ने तो हमारी सारी परेशानी दूर कर दी है. बिजली की कमी के कारण हम परेशान थे." "पहले हमारी फ़सल पानी के अभाव में आंखों के सामने सूख जाती थी और हम कुछ नहीं कर पाते थे. अब खेत में मोटर पंप चलाकर सिंचाई करने के साथ-साथ इससे घरों में बिजली आपूर्ति भी की जा रही है.” ख़तरा भी है लेकिन जानकार इस तरह से जनरेटर के लिए रसोई गैस के इस्तेमाल को ख़तरनाक बताते हैं. एक जनरेटर कंपनी में बतौर इंजीनियर काम करने वाले आर के चंद्राकर बताते हैं, "इस तरह से जनरेटर सेट में गैस सप्लाई के कारण सार्ट सर्किट का ख़तरा बढ़ सकता है और रसोई गैस का इस्तेमाल जानलेवा साबित हो सकता है.”
चंद्राकर के अनुसार जनरेटर सेट के इंजन की संरचना इस तरह की नहीं होती कि उसके लिए एलपीजी गैस का इस्तेमाल किया जा सके. एलपीजी गैस के इस्तेमाल से जनरेटर का इंजन जल्दी ख़राब हो सकता है. राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री ननकी राम कंवर रसोई गैस के इस तरह के इस्तेमाल पर अचरज व्यक्त करते हुए कहते हैं, “मैंने अब तक कारों में रसोई गैस के इस्तेमाल की बात सुनी थी लेकिन राज्य में इस तरह जनरेटर में रसोई गैस का इस्तेमाल ग़ैरक़ानूनी है. हम इसके ख़िलाफ़ गांव के किसानों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई कब शुरु होगी, यह तो कोई भी बताने की स्थिति में नहीं है लेकिन रसोई तक पहुंचने वाले अनाज और दूसरी फसलों के लिए रसोई गैस का इस्तेमाल फ़िलहाल तो बेरोकटोक चल रहा है. यह अनुमान लगाना भी मुश्किल नहीं है कि राज्य में बिजली आपूर्ति के जो हालात हैं, उसमें इस तरह के प्रयोग कम होने के बजाय और बढेंगे. | इससे जुड़ी ख़बरें सरकार पर बढ़ोत्तरी वापस लेने का दबाव06 जून, 2006 | भारत और पड़ोस रसोई गैस की कमी नहीं: अय्यर06 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस क्या आम आदमी पर नज़र है अदालतों की?25 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस महिलाओं का अनोखा प्रयोग | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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