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गुरुवार, 21 जून, 2007 को 09:12 GMT तक के समाचार
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पेट्रोल नहीं सेब संतरे से चलेंगी गाड़ियाँ
सेब
आलोचकों का कहना है कि इससे खाद्य पदार्थ के दाम बढ़ेंगे
अमरीकी वैज्ञानिकों का कहना है कि सेब और संतरे जैसे फलों में पाए जाने वाले शर्करा को नए तरह के कार्बन ईंधन में बदलकर कारों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

ये विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है जिसके मुताबिक़ फ़्रुक्टोज़ में इथेनॉल से अधिक ऊर्जा होती है.

शोध में लगे विस्कॉन्सिन-मेडिसन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि 'डाई मिथाइलफ़्यूरॉन' नाम के फ्रुक्टोज़ में इथेनॉल से 40 फ़ीसदी अधिक ऊर्जा होती है और ये जल्दी भाप बनकर उड़ता भी नहीं है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि फ़्रुक्टोज़ फलों और पौधों से प्राप्त किया जा सकता है या ग्लूकोज़ से भी बनाया जा सकता है.

वहीं दूसरी ओर जैव ईंधन से संबंधित ब्रिटेन की एक रिपोर्ट का कहना है कि किसी भी तरह के कूड़े के इस्तेमाल से जैव डीज़ल बनाया जा सकता है.

रिपोर्ट के अनुसार प्लास्टिक बैगों के इस्तेमाल से भी जैव डीज़ल बन सकता है.

यूरोपीय संघ और अमरीका में राजनीतिज्ञ आयातित ईंधन तेल से निर्भरता घटाने और कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने के लिए जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर देते रहे हैं.

आलोचना

आलोचकों का कहना है कि इस तरह ईंधन बनाने से खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ेंगे. उनके अनुसार पाम ऑयल और मक्का से बने जैव ईंधन की बढ़ती खपत देखकर किसान अपने खेतों में इनका उत्पादन करने लगेंगे.

जैव ईंधन
आने वाले समय जैव ईंधन का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है

बायो डीज़ल और मक्का से इथेनॉल बनाया जाता है लेकिन अभी इस नए ईंधन के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जाँच-पड़ताल करना बाक़ी है.

ब्रिटेन में शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके पास ऐसी तकनीक मौजूद है जिससे लकड़ी, घास-फूस और प्लास्टिक बैगों से भी ईंधन बनाया जा सकता है.

इस प्रक्रिया को 'बायोमास से द्रव्य' बनाना कहते हैं और विशेषज्ञों का मानना है कि अगले छह सालों में ब्रिटेन की डीज़ल ज़रूरतों का 30 फ़सदी हिस्सा इस स्रोत से मिल सकेगा.

ब्रिटेन के 'नेशनल नॉन-फूड क्राप्स सेंटर' यानी ग़ैर खाद्य फसल केंद्र के जर्मी टॉमकिंसन का कहना है कि अगली पीढ़ी के जैव ईंधन से कार का ईंधन तैयार करने के अलावा कई दूसरी तरह की ज़रूरतें भी पूरी की जा सकेंगी.

उन्होंने कहा, "जितना हम सोच रहे हैं उससे कहीं अधिक गहरा प्रभाव समाज पर पड़ेगा. इसमें बहुत संभावनाएँ हैं."

वैसे मौजूदा जैव ईंधन शोध कारखानों की जगह नई उत्पादन तकनीक विकसित करना क़रीब दस गुना अधिक महंगा है.

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