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मछलियाँ अजनबी थीं वैज्ञानिकों के लिए | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इंडोनेशिया के एक द्वीप पर वैज्ञानिकों के हाथ जीव, जंतुओं, मछलियों और पेड़-पौधों और चिड़ियों का एक अदभुत ख़ज़ाना हाथ लगा है, इस खोज ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. कंजर्वेशन इंटरनेशनल के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किसी समुद्री इलाक़े में पाई गई अब तक की सबसे विविधतापूर्ण जैव प्रणाली है. वैज्ञानिकों का कहना है कि राजा अम्पट नाम के इस द्वीप पर जीव-जंतुओं की 50 से अधिक नई प्रजातियों का पता चला है. इनमें समुद्र तल में रहने वाली 'वाकिंग शार्क' और फ्लैशर जैसी मछलियाँ हैं जो काफ़ी रंग-बिरंगी होती हैं और मादा मछली को रिझाने के लिए चिड़ियों के तरह अपने रंग का प्रदर्शन करती हैं. कंजर्वेशन इंटरनेशनल इंडोनेशिया की सरकार के साथ मिलकर जैव प्रणाली को बचाने की दिशा में काम कर रही है.
इस परियोजना के वैज्ञानिक मार्क एर्डमैन कहते हैं, "पाँच वर्ष पहले हमने यहाँ काम शुरू किया था जब हमें पता चला कि हम तो इस धरती पर जैव विविधता के सबसे बड़े केंद्र के बीचोबीच हैं." वैज्ञानिकों को यहाँ कोरल यानी प्रवाल की 20, मछलियों की 24 और झींगे की आठ ऐसी प्रजातियाँ मिली हैं जिनसे विज्ञान अब तक अनजान रहा है. इन्हीं मछलियों में वाकिंग शार्क भी है जो हमेशा समुद्र तल पर चलती रहती है और कोई ख़तरा आने पर ही तैरकर भागती है. धूसर रंग की मामूली दिखने वाली एक मछली भी पाई गई है जो मादा मछली को रिझाने के लिए फ़ौरन नीले, पीले और बैंगनी रंगों से भर जाती है. डॉक्टर एर्डमैन कहते हैं, "हमें जो दिखाई दिया उसे देखकर तो हम दंग रह गए." त्रिकोण यह जगह ऐसी जगह पर है कि इसे कोरल ट्राएंगल कहा जाता है क्योंकि यह इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस तीनों देशों के प्रवाल वाले इलाक़े हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इलाक़ा इसलिए ख़ास है क्योंकि यहाँ गहरे समुद्र और छिछले बेसिन दोनों हैं जिनमें तरह-तरह के जीव पलते हैं. यहाँ अक्सर भूकंप आते रहते हैं जिससे ज़मीन और समुद्र की अंदरूनी संरचना में बदलाव आते रहते हैं. कंज़र्वेशन इंटरनेशनल का कहना है कि इस जैव विविधतापूर्ण जगह के अछूते रहने की एक वजह इंसानी आबादी से इसकी दूरी भी है. अब कंजर्वेशन इंटरनेशनल और इंडोनेशियाई सरकार इस टापू की जैव विविधता के संरक्षण के लिए एक योजना बनाने में जुट गए हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें त्वचा का रंग अलग अलग क्यों?17 दिसंबर, 2005 | विज्ञान कछुए अंडे देने के लिए पहुँचे मगर...26 फ़रवरी, 2006 | विज्ञान पेंटागन शार्कों को जासूस बनाएगा03 मार्च, 2006 | विज्ञान एक दूसरे को नाम से बुलाती हैं डॉल्फ़िन09 मई, 2006 | विज्ञान 'लुप्प्त हो सकती हैं कई प्रजातियाँ' 19 मई, 2006 | विज्ञान व्हेल के शिकार पर विवाद18 जून, 2006 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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