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रविवार, 26 फ़रवरी, 2006 को 10:43 GMT तक के समाचार
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कछुए अंडे देने के लिए पहुँचे मगर...
कछुआ
बहुत से अंडे बच्चे निकलने से पहले ही टूट-फूट जाते हैं
भारत में समुद्र में ख़तरे का सामना कर रहे हज़ारों कछुए अंडे देने के लिए पूर्वी समुद्र तट पर आ गए हैं लेकिन पर्यावरणवादियों का कहना है कि उन्हें कछुओं का भविष्य अंधकार भरा नज़र आता है.

अच्छी ख़बर ये है कि हर साल दो से तीन लाख के बीच कछुए उड़ीसा राज्य में समुद्र तट पर अंडे देने के लिए आते हैं और यह दुनिया भर में इस प्रजाति की काफ़ी बड़ी संख्याओं में से है.

और बुरी ख़बर ये है कि पिछले क़रीब 13 साल में लगभग एक लाख 29 हज़ार कछुओं की मौत हो गई है.

कछुए आमतौर ऐसे मछुआरों के जाल में फँस जाते हैं और दम घुटकर उनकी मौत हो जाती है जो मछली पकड़ने के लिए अपनी नावों में कछुओं को बचा देने वाले उपकरण इस्तेमाल नहीं करते जबकि ये उपकरण इस्तेमाल करना अनिवार्य है.

उड़ीसा में तीन ऐसे इलाक़े हैं जहाँ कछुए अंडे देने के लिए अपने घोंसले बनाते हैं वे हैं - रुशीकुल्या नदी का मुहाना, देवी नदी का मुहाना और गहीरमाथा में नासी द्वीप का क्षेत्र.

ख़तरे में

ये कछुए आमतौर पर 120 से 150 तक अंडे देते हैं और उन पर 45 से 50 दिनों तक सोने के बाद बच्चे निकलते हैं.

कछुआ

लेकिन इन अंडों को कुत्तों, गीदड़ों, जंगली सुअरों, लकड़बग्घों, कौओं, बाजों और समुद्री पक्षियों से भारी ख़तरा है. इतना ही नहीं बहुत से अंडे समुद्र के पानी में बह भी जाते हैं.

सर्वेक्षणों में बताया गया है कि बहुत कम संख्या में ही अंडों में से बच्चे निकल पाते हैं.

कछुओं की संरक्षण के लिए एक परियोजना के संयोजक बिस्वजीत मोहंती का कहना है कि कोई भी प्रजाति इतनी बड़ी संख्या में मृत्युदर का सामना नहीं कर सकती.

मोहंती का कहना है कि अधिकारियों की तरफ़ से क़ानून सख़्ती से लागू करने में कोताही की वजह से कछुओं की प्रजाति पर ख़तरा मंडरा रहा है. अब तो कछुओं के घोंसले भी गंभीर ख़तरे में हैं.

स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर नाराज़गी है कि कछुओं के अंडों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है.

एक स्थानी निवासी सरोज साहू का कहना है कि कछुओं के अंडों के संरक्षण के लिए जो उपकरण चाहिए, वो उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं.

हालाँकि भारतीय तेल निगम ने कछुओं के संरक्षण के लिए उड़ीसा वन विभाग को एक करोड़ रुपए की राशि दी है लेकिन फिर भी ज़रूरी उपकरण नहीं खरीदे गए हैं.

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