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मोबाइल से गाँवों को जोड़ेगी बायोडीजल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कपास, नीम और जटरोफा के बीज से बनाए जाने वाले बायोडीज़ल का इस्तेमाल अब भारत भर में मोबाइल नेटवर्कों को ऊर्जा मुहैया कराने के लिए किया जाएगा. इन पौधों से प्राप्त यह बायो ईंधन देश के उन सुदूर ग्रामीण इलाकों में मोबाइल बेस स्टेशनों को चलाएगा जहाँ अभी तक बिजली नहीं पहुँची है. भारत के तीस प्रतिशत हिस्से इलाक़ों में बिजली से नहीं पहुँच पाई है जबकि मोबाइल फोन की माँग वहाँ भी तेजी से बढ़ रही है. मोबाइल कंपनियों और उद्योगों से जुड़ी एक संस्था जीएसएमए डेवलपमेंट फंड ने परीक्षण के तौर पर एक योजना पश्चिम भारत में शुरु भी की है. जीएसएमए के विकास फंड के प्रबंधक डॉन हर्टली ने कहा, “यह बिना जुड़े हुए लोगों को जोड़ने जैसा है” भारत में मोबाइल फोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरु हो गया है. वर्ष 2003 में मोबाइल फोन के जहाँ केवल एक करोड़ तीस लाख उपभोक्ता थे वहीं आज यह संख्या बढ़कर करीब 13 करोड़ हो गई है. इनमें से ज्यादातर उपभोक्ता शहरी इलाकों में हैं जहाँ मोबाइल सेवा देने वालों का व्यापक नेटवर्क मौजूद है. लेकिन प्रमुख शहरों को छोड़कर भारत के करीब तीन-चौथाई हिस्सों में बसे एक अरब से अधिक लोगों को मिलने वाला मोबाइल कवरेज बहुत बँटा हुआ है. ऐसा प्रायः इसलिए होता है कि मोबाइल स्टेशनों को चलाने के लिए जरूरी बिजली का नेटवर्क भरोसेमंद नहीं है. अभाव एरिक्सन इंडिया के प्रबंध निदेशक मैट्स ग्रैनरिड कहते हैं, “जैसे ही मोबाइल सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियाँ नए क्षेत्रों में अपना विस्तार करती हैं उन्हें सबसे बड़ी चुनौती जो पेश आती है वह है आधारभूत संरचना का अभाव.” सुदूर इलाकों के बेस स्टेशन जो हैंडसेट के माध्यम से ट्रांसमीशन और सूचनाएँ प्राप्त करते हैं वे पहले से पारंपरिक ईंधन से चलनेवाले जेनरेटर का इस्तेमाल ऊर्जा के श्रोत के रूप में करते रहे हैं. लेकिन इनका इस्तेमाल और रखरखाव बहुत खर्चीला है. एरिक्सन का आकलन है कि सुदूर इलाकों के बेस स्टेशन का आधा खर्च ईंधन पर ही होता है.
जीएसएमए और मोबाइल कंपनियों आइडिया सेल्युलर तथा एरिक्सन द्वारा परीक्षण के तौर पर चलाए जा रहे बेस स्टेशनों में बायोडीजल से चलनेवाले जेनरेटर इस्तेमाल किए जा रहे हैं जिससे इस समस्या का निदान हो सकता है. बायोईंधन के श्रोत के रूप में जटरोफा भारत में बड़े पैमाने पर उगाया जा रहा है. बायोडीजल का पर्यावरण पर प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम होता है और इसे स्थानीय स्तर पर बनाया भी जा सकता है. इस परीक्षण योजना के तहत वर्ष 2007 के मध्य तक पुणे में दस बेस स्टेशनों के चलाए जाने की उम्मीद है. जीएसएमए की ही एक दूसरी ऐसी ही परियोजना के तहत नाईजीरिया के शहर लैगोस में चलाई जा रही है जहाँ मूँगफली से बायोईंधन प्राप्त किया जाता है. | इससे जुड़ी ख़बरें दृष्टिहीनों के लिए विशेष मोबाइल फ़ोन22 नवंबर, 2003 | विज्ञान मोबाइल फ़ोन का लगातार बढ़ता बाज़ार21 जुलाई, 2005 | विज्ञान अब रीचार्जिंग की बेतार तकनीक 15 नवंबर, 2006 | विज्ञान मोबाइल कंपनियाँ अड़ीं | भारत और पड़ोस चलता फिरता टेलीफ़ोन बूथ06 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस सूचना क्रांति से बदल जाएगी ज़िदगी03 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस बायो-डीज़ल से दौड़ रही हैं गाड़ियाँ20 फ़रवरी, 2005 | भारत और पड़ोस शराब नहीं, डीज़ल-पेट्रोल बनेगा महुआ से29 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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