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तेज़ी से लुप्त हो रही हैं मूँगा चट्टानें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी वैज्ञानिकों का कहना है कि हिंद और प्रशांत महासागर से मूँगा चट्टानें लुप्त हो रही हैं. इनके लुप्त होने की रफ़्तार पहले किए गए आकलन से कहीं अधिक है. मूँगा चट्टानों के लुप्त होने को स्थानीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक जैव विविधता के लिए गंभीर ख़तरा माना जा रहा है. शोध में जुटी वैज्ञानिकों की टीम ने छह हज़ार मूँगा चट्टानों के आँकड़ों का अध्ययन किया. वैज्ञानिकों का कहना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मूँगा चट्टानों के लुप्त होने की रफ़्तार प्रति वर्ष लगभग दो फ़ीसदी है. उल्लेखनीय है कि हिंद और प्रशांत महासागर में दुनिया की 75 फ़ीसदी मूँगा चट्टानें पाई जाती हैं. वजह शोध दल का मानना है कि मूँगा चट्टानों के नष्ट होने की वजह जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के तापमान में हुई वृद्धि है. इसके अलावा मूँगा चट्टानों के पास विशालकाय परभक्षियों का पहुँचना और मछुआरों द्वारा डाइनामाइट जैसे विस्फोटकों का इस्तेमाल इनके नष्ट होने की अन्य वजहें हैं. शोध दल का आकलन है कि पिछले दो दशक में संभवत दुनिया की आधी मूँगा चट्टानें लुप्त हो गई हैं. दरअसल, मूँगा चट्टानें बहुत नाज़ुक होती हैं और तेज़ हवाएँ और ताक़तवर लहरें भी इन्हें नुक़सान पहुँचा सकती हैं. मूँगा चट्टानों को मछलियों और अन्य समुद्री जीवों के लिए स्वर्ग माना जाता है. इसके अलावा ये चट्टानें तेज़ तूफ़ान से समुद्री तट की रक्षा भी करती हैं. |
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