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मूंगा चट्टानें दुर्लभ हुईं
ब्रिटेन में हुए एक नए अनुसंधान में पाया गया है कि 20 वर्षों के भीतर दुनिया के कुछ हिस्सों से मूंगे की चट्टानों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. विज्ञान पत्रिका 'नेचर' में छपी अनुसंधान रिपोर्ट में कहा गया है कि समुद्र जल के बढ़ते तापमान का मूंगे पर बुरा असर पड़ रहा है. हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के इलाक़ों में मूंगे की चट्टानों के इससे प्रभावित होने की आशंका है. वैज्ञानिकों के अनुसार 1998 में अल-नीनो प्रभाव के कारण हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में समुद्री जल के तापमान में कई डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी देखी गई. इस कारण 90 प्रतिशत से ज़्यादा मूंगे की चट्टानें नष्ट हो गईं. हालांकि कई जगहों पर मूंगे की चट्टानें फिर बनती पाई गईं लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भविष्य में भी बार-बार 'ग्लोबल वार्मिंग' की प्रक्रिया देखने को मिल सकती है.
और ऐसा सचमुच में हुआ तो मूंगे के अस्तित्व पर ही संकट बन आएगा. वारविक विश्वविद्यालय के चार्ल्स शेपर्ड ने उस वक़्त की गणना की है जब मूंगे का पूरी तरह सफ़ाया हो सकता है. उन्होंने कहा, "हिंद महासागर में भूमध्य रेखा और उससे 15 डिग्री दक्षिण तक के इलाक़े में मूंगे का पूर्ण विनाश 2020 या 2025 तक हो सकता है. और यह एक बुरी ख़बर है." चिंता की बात शेपर्ड ने कहा कि इस इलाक़े में हिंद महासागर के कुछ निर्धन देशों का होना भी चिंता की बात है. उन्होंने कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया की स्थिति भी कोई ख़ास अच्छी नहीं है, जहाँ मूंगे की चट्टानों पर जलवायु परिवर्तन के अलावा प्रदूषण और अनियंत्रित रूप से मछली मारे जाने का भी असर पड़ रहा है. उन्होंने कहा, "यदि हर पाँच साल में समुद्र गर्म होता है तो ये ख़तरे की बात होगी क्योंकि मूंगे को पूरी तरह विकसित होने में पाँच साल लगते हैं." मूंगे न सिर्फ दुनिया की एक करोड़ लोगों के लिए प्रोटीन के प्रधान स्रोत हैं, बल्कि ये कई द्वीपों को समुद्री लहरों से भी बचाते हैं. इसके अलावा पर्यटन में भी इनकी अहम भूमिका होती है. |
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