ड्रोन जो समुद्र के अंदर ढूंढते हैं ख़ज़ाना

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- Author, क्रिस बरन्यूक
- पदनाम, टेक्नोलॉजी रिपोर्टर
जब आप समुद्र के ऊपर लहरों पर सफऱ करते हैं तो आपको अंदाज़ा भी नहीं होता होगा कि नीचे क्या है. समुद्र के अंदर पहाड़ होते हैं, रेगिस्तान होते हैं, पठारी इलाक़े होते हैं, गहरी खाइयां होती हैं और होते हैं फिसलन भरे ख़तरनाक रास्ते.
अमेरिकी कंपनी ब्लूफ़िन रोबोटिक्स के निदेशक विल ओ हालोरन कहते हैं कि हम समुद्र के ऊपर कुछ यूं चलते हैं, जैसे हवाई जहाज़ से हम पहाड़ों, दरिया और रेगिस्तान के ऊपर से गुज़र जाते हैं.
विल की कंपनी ब्लूफ़िन, समुद्र के अंदर उड़ने वाले ड्रोन बनाती है. इन्हें एयूवी, यानी ऑटोमैटिक अंडरवाटर व्हीकल कहते हैं. ये पानी वाले ड्रोन, पहले से तयशुदा रास्तों पर ख़ुद से सफ़र करते हैं. वो रिमोट कंट्रोल से चलने वाले किसी रोबोट की तरह किसी नाव या जहाज़ से नहीं चलाए जाते. ऐसे में उन्हें ख़ुद ही समुद्र के अंदर की दिक़्क़तों से बचकर चलना होता है.
यूं तो सेनाओं के पास काफ़ी पहले से ये तकनीक है. जिसकी मदद से फौजें, समुद्र की गहराई में बारूदी सुरंग और दूसरे तरह के ख़तरों का पता लगाती हैं.

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मगर, इन दिनों जब समुद्र के अंदर डूबा ख़ज़ाना तलाशने की होड़ मची है, तो ऐसे अंडरवाटर ड्रोन की मांग काफ़ी बढ़ गई है.
आज, समुद्र में डूबे ख़ज़ानों की तलाश में बड़े पैमाने पर हाई टेक्नीक की मदद ली जा रही है. मगर सवाल ये है कि आख़िर ये नई तकनीक, ख़ज़ाने खोजने वालों को किस तरह की काबिलियत से लैस करती है, ताकि वो सटीक जगह पर पहुंचकर बरसों से डूबा ख़ज़ाना तलाश लें और निकाल लाएं.
चलिए पता लगाने की कोशिश करते हैं.
सबसे पहले बात अंडरवाटर ड्रोन बनाने वाली कंपनी ब्लूफ़िन रोबोटिक्स की. इस कंपनी के कारखाने में ज़ोर-शोर से काम चल रहा है. एक मीटर से लेकर चार मीटर तक के पानी के अंदर चलने वाले ड्रोन बनाए जा रहे हैं. इनके अंदर उच्च तकनीक के उपकरण लगाए जाते हैं. ऐसे में पानी के अंदर के दबाव से बचाने के लिए इनके चारों ओर बेहद सख़्त और मज़बूत खोल बनाया जाता है. इसमें कई जगह फ़ोम के टुकड़े भी लगाए जाते हैं. ताकि ये ज़रूरत के वक़्त पानी सोखकर ड्रोन के ऊपर पानी का दबाव कम कर सकें.
अभी हाल ही में मलयेशियन एयरलाइंस की लापता फ्लाइट एमएच370 की तलाश के लिए ब्लूफ़िन के ड्रोन की मदद ली गई थी. माइक्रोसॉफ्ट के बड़े अधिकारी पॉल एलेन ने भी अभी इस ड्रोन की मदद ली थी. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान डूब गए एक जहाज़ का मलबा खोजने के लिए.

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ब्लूफ़िन के निदेशक विल ओ हालरॉन कहते हैं कि इस तरह के कामों से उन्हें शोहरत मिलती है. लोगों को पता चलता है कि ऐसी नई तकनीक बाज़ार में आ गई है. वो इसकी मदद से अपना मिशन पूरा करने के बारे में सोचते हैं.
ब्लूफ़िन के अंडरवाटर ड्रोन की सबसे बड़ी ख़ूबी ये है कि एक बार समुद्र के अंदर जाने पर ये ख़ुद से अपना रास्ता तलाशते चलते हैं. कई बार इनके भटक जाने, जीपीएस से संपर्क कट जाने का ख़तरा रहता है.
इसके लिए इन्हें पहले से नाप-जोखकर, रास्ते के जोखिम का अंदाज़ा लगाकर तैयार किया जाता है. ताकि, जब ये पानी के भीतर जाएं, तो अपना काम पूरा करके ही आएं. इनमें कैमरे लगे होते हैं, जिनकी मदद से ये ड्रोन एक बड़े इलाक़े की तस्वीरें ले पाते हैं. साथ ही ये सोनार सिग्नल की मदद से पूरे इलाक़े का ख़ाका तैयार करने में मदद करते हैं.
पहले इन कामों के लिए रिमोट कंट्रोल से चलने वाले अंडरवाटर रोबोट की मदद ली जाती थी. मगर दिक़्क़त ये थी कि इन्हें समुद्र की लहरों के ऊपर किसी नाव या जहाज़ से जोड़े रखना होता था. इससे इनकी पहुंच सीमित रह जाती थी. ये बड़े इलाक़े की तस्वीरें नहीं ले पाते थे. ड्रोन से ये काम आसान हुआ है.

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इस काम में अब सैटेलाइट्स की मदद भी ली जा रही है. उत्तरी आयरलैंड की अल्सटर यूनिवर्सिटी के डॉक्टर रोरी क्विन बताते हैं कि अंतरिक्ष में तैरते सैटेलाइट अपने हाई रिजॉल्यूशन कैमरों की मदद से समुद्र के भीतर की तस्वीरें ले सकते हैं.
इससे गहराई में छुपे जहाज़ों के मलबे का पता भी लगाया जा रहा है. मगर, दिक़्क़त ये है कि ये सैटेलाइट किनारों के क़रीब, कम गहराई वाले इलाक़ों में ही कारगर हैं. डेढ़ सौ मीटर से ज़्यादा गहराई वाली जगह में ये तकनीक काम नहीं आती.
अगर आप समुद्र की तलहटी की साफ़-सुथरी तस्वीरें लेना चाहते हैं. साथ ही बड़े इलाक़े का मुआयना भी करना चाहते हैं. तो इसके लिए आपको, समुद्र के भीतर काम आने वाली सोनार तकनीक का और एडवांस्ड वर्ज़न लेना होगा. इसे 'सिंथेटिक एपरचर सोनार' या 'एसएएस' कहते हैं.
आम सोनार तकनीक में जहां समुद्र के भीतर के टारगेट पर आवाज़ के सिग्नल छोड़े जाते हैं. वहीं, एसएएस, में एक साथ कई रेडियो सिग्नल टारगेट पर झोंक दिए जाते हैं. इससे पूरे इलाक़े की बेहतर तस्वीर सामने आती है. यहां तक कि उंगली के बराबर छोटे किसी टुकड़े की तस्वीर भी इससे ली जा सकती है.
इसे एक ट्रैक्टर टायर के मुक़ाबले एक सोने के बिस्कुट की तस्वीर लेने से तुलना कर सकते हैं. कनाडा की कंपनी क्राकेन सोनार, आजकल ये 'एसएएस' तकनीक मुहैया करा रही है, समुद्र के अंदर की तलाश करने वालों को. क्राकेन सोनार की तकनीक से समुद्र के भीतर के एक बड़े हिस्से की थ्री-डी इमेज भी बनाई जा सकती है.

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क्राकेन सोनार के प्रमुख कार्ल केनी कहते हैं कि समुद्र के भीतर काम आने वाली ऐसे उपकरणों और तकनीक की क़ीमतें हाल में काफ़ी कम हुई हैं. लिहाज़ा ख़ज़ाने की तलाश करने वाले इनके बारे में काफ़ी खोज पड़ताल कर रहे हैं.
इन नई तकनीकों से उनका काम जो आसान हो जाएगा. ख़ुद केनी की कंपनी, समुद्र की भीतर चीज़ें तलाशने वाली एक अमेरिकी कंपनी से बात कर रही है. ताकि दोनों मिलकर, उन्नीसवीं सदी में डूबे एक जहाज़ का मलबा तलाश सकें. कहा जा रहा है कि इस जहाज़ के मलबे में करोड़ों का सोना-चांदी हो सकता है.
बड़े से जहाज़ के मलबे में सोने-चांदी का ख़ज़ाना कहां है, इसका पता लगाने में केनी की कंपनी के पास मौजूद तकनीक काम आ सकती है.
आप समुद्र के भीतर जहाज़ के मलबे का पता लगा लें. फिर, उसके अंदर किसी ख़ास जगह में दबे ख़ज़ाने का भी पता लगा लें. फिर भी एक दिक़्क़त रह जाती है. ख़ज़ाने में सोना है, चांदी या या तांबे के सिक्के हैं, ये पता लगाने की.
इस काम में इस्तेमाल होने वाले मेटल डिटेक्टर, अक्सर ये तो बता देते हैं कि फ़लां जगह कोई मेटल है, मगर वो असल में है क्या, ये नहीं बता पाते. नतीजा ये होता है कि लाखों डॉलर ख़र्च करके ट्रेज़र हंटर जब मलबे की तिजोरी तक पहुंचते हैं तो उनके हाथ लगती है मायूसी.

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अब इस मुश्किल का तोड़ भी निकाल लेने का दावा किया जा रहा है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी, नासा के पूर्व वैज्ञानिक डॉक्टर आर्थर लोन लेन की अगुवाई में. उन्होंने 'डीयूवी-डार्ट' नाम से मशीन बनाई है.
डॉक्टर लोन और उनकी टीम दावा कर रही है कि 'डीयूवी-डार्ट' पानी के भीतर मलबे के ढेर में से सूंघकर बता देगी कि वहां क्या छुपा है. इसके लिए वो पानी में पड़ी धातुओं से निकलने वाले आयन या धातु के गलने से निकलने वाले टुकड़ों को सूंघकर बताएगी कि चांदी है, तांबा है या टिन.
सोने का पता लगाना फिर भी मुश्किल है. क्योंकि पानी में हो या कहीं और, सोने की सेहत पर फ़र्क़ नहीं पड़ता. हां चांदी का मिज़ाज ज़रूर बिगड़ने लगता है. अक्सर, होता ये है कि चांदी, सोने के आस-पास ही मिल जाती है ऐसे जहाज़ों के मलबों में दबे ख़ज़ानों में. तो उम्मीद यही है कि 'डीयूवी-डार्ट' से ये मुश्किल दूर होगी.
अब इन सब तकनीकों के बारे में जानकर, देख-सुनकर यही लगता है कि इस साल, समुद्र के भीतर बरसों से पड़े ख़ज़ानों की तलाश और तेज़ होने वाली है. नई तकनीक से लैस ट्रेज़र हंटर्स को कामयाबी की ज़्यादा उम्मीद जो दिखने लगी है.

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जिसके पास ज़्यादा बेहतर तकनीक होगी, उसकी सफलता की उम्मीद ज़्यादा होगी. हालांकि तकनीक के अलावा, इस रोमांचक खेल के बाक़ी पैमाने वही हैं. गहराई और अंधेरे को जीत लेने का हौसला, रिस्क लेने की क्षमता, नई चुनौतियां उठाने की कूवत और ख़तरों से खेलने का माद्दा होना ज़रूरी है.
अगर आपके पास है ये सब, तो फिर देर किस बात की है. समुद्र के भीतर अभी कामयाबी और अमीर बनने के बहुत से ख़ज़ाने छुपे हुए हैं, आपके इंतज़ार में.












