क्या है एवरेस्ट के ग्रीन बूट्स का रहस्य

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ये कहानी है एक लाश की, जो पिछले बीस सालों से दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ पर पड़ी है. ये कहानी है, पहाड़ों पर चढ़ाई की कोशिशों की नाकामी के ख़तरों की. ये कहानी है, इंसानी किरदार के तमाम पहलुओं की. बहादुरी की, चुनौतियों की, लालच की, ख़ुदग़र्ज़ी और बेदिली की.

माउंट एवरेस्ट चोटी से कोई दो तीन सौ मीटर नीचे पिछले बीस सालों से पड़ी हुई वो लाश, कुछ यूं पड़ी है, जैसे कोई सो रहा हो. एवरेस्ट पर उत्तर की तरफ़ से चढ़ने वाले रास्ते का वो अहम पड़ाव है. वहां, एक चट्टान तले, अपने जैकेट से अपना मुंह ढंके, वो लाश यूं पड़ी है, जैसे कोई थककर सो गया हो. उसकी सबसे बड़ी पहचान है, उसके पैरों के हरे-हरे जूते.

आज दुनिया उस लाश को किसी नाम से नहीं, उसके जूतों के रंग की वजह से ग्रीन बूट्स के नाम से जानती है.

एवरेस्ट पर बीस साल से यूं ही पड़ी वो लाश है सेवांग पलजोर की. जिसे उसके बाद, एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले मार्कर के तौर पर जानते हैं, जहां से चोटी बेहद क़रीब दिखाई देती है. जो शिखर से पहुंचने से पहले का आख़िरी पड़ाव है.

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यूं तो एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान पिछली एक सदी में दो सौ से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. उनमें से ज़्यादातर की लाशें, पहाड़ ने अपने आंचल में समेट कर रखा है. मगर, सबसे ज़्यादा चर्चा, इन ग्रीन बूट्स की होती है.

आठ बार एवरेस्ट को जीतने वाले पर्वतारोही नोएल हाना कहते हैं कि इस पहाड़ की चढ़ाई करने वाला कमोबेश हर शख़्स ग्रीन बूट्स को जानता है. कइयों ने उसे देखा है और उत्तरी छोर से चढ़ाई करने वाले कई लोगों ने उसके पास बैठ के आराम किया है.

ग्रीन बूट्स के नाम से चर्चित सेवांग पलजोर, इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के एक जवान थे, जो 1996 में अपने दो साथियों, सेवांग मानला और दोर्जे मोरुप के साथ एवरेस्ट की चढ़ाई करते हुए जान गंवा बैठे थे. उनकी मौत पर्वतारोहियों के बीच एक बड़े विवाद की वजह बन गई थी.

लद्दाख

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क्योंकि आरोप ये लगे थे कि पलजोर और उनके दो साथी 10 मई 1996 को एवरेस्ट पर आए बर्फ़ीले तूफ़ान की वजह से नहीं मारे गए थे. असल में वो, माउंट एवरेस्ट को जीतने की चाहत रखने वालों के लालच की वजह से मारे गए.

जिन्होंने, पलजोर और उनके साथियों को मुसीबत में देखा, मगर मदद नहीं की और अनदेखी करते हुए अपनी जीत और शोहरत के चक्कर में आगे बढ़ गए.

पलजोर की कहानी को अमरीकी पर्वतारोही और लेखक जॉन क्राकर ने अपनी किताब ‘इनटू थिन एयर’ के ज़रिए मशहूर कर दिया. बाद में बड़े बजट की फ़िल्म 'एवरेस्ट' ने इस क़िस्से को शोहरत की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

चलिए आपको सुनाते हैं सिर्फ़ 28 साल की उम्र में दुनिया से गुज़र गए पलजोर या कहें ग्रीन बूट्स की कहानी.

पलजोर

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सेवांग पलजोर की पूरी कहानी बीबीसी के लिए जानने निकलीं, पत्रकार रशेल नूवर...उन्होंने पूरा सच जानने के लिए भारत और नेपाल ही नहीं, जापान और अमरीका तक का सफ़र किया...ताकि दुनिया को सेवांग पलजोर की सच्ची कहानी बता सकें.

सेवांग पलजोर, जम्मू-कश्मीर के लद्दाख़ इलाक़े के एक छोटे से गांव सकती के रहने वाले थे. सकती यानी सोने का सिंहासन. समुद्र तट से क़रीब 3800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पलजोर के गांव में कुल तीन सौ लोग रहते हैं.

सेवांग पलजोर पांच भाई बहनों में सबसे बड़े थे. ग़रीब परिवार की बड़ी औलाद होने का उन पर इतना दबाव था कि वो हाई स्कूल के आगे पढ़ नहीं पाए. और लद्दाख़ में स्थित इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के कैम्प में जा पहुंचे नौकरी तलाशने.

ख़ुशक़िस्मती से पलजोर को पहली ही कोशिश में कामयाबी मिल गई.

आईटीबीपी में नौकरी के दौरान पलजोर ने कई पहाड़ों पर चढ़ने में जीत हासिल की. इससे उनका हौसला और बढ़ा और आख़िर में वो 1996 में एवरेस्ट को उत्तरी ओर से जीतने के मिशन में जाने के लिए चुने गए.

लद्दाख

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पलजोर ने अपनी मां से ये बात छुपा ली. मगर, मिशन पर जाने से पहले जब छोटे भाई थिनले नामग्याल, उनसे मिलने दिल्ली पहुंचे तो वो बेहद ख़ुश थे और आत्मविश्वास से लबरेज़, कि हर मिशन की तरह इसमें भी कामयाबी मिलेगी.

मगर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट, हर पर्वतारोही के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है. ऑक्सीजन की कमी से कई बार दिमाग़ और फेफड़े की नसें फटने लगती हैं.

एवरेस्ट पर मारे गए दो सौ से ज़्यादा लोगों की मौत की वजहों पर हुए एक रिसर्च में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं. इस काम में पर्वतारोहियों की मदद करने वाले ज़्यादातर शेरपाओं की जान एवरेस्ट के निचले हिस्से में ही गई. जबकि आधी से अधिक मौतें आठ हज़ार मीटर की ऊंचाई पर जाकर हुईं. ये सबके सब, एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर वहां से लौट रहे थे, तब उनकी जान चली गई.

जानकार इन मौतों की कई वजहें बताते हैं. जैसे ऊंचाई पर सांस की कमी. लेकिन सबसे बड़ी वजह है ग़लत फ़ैसले. अक्सर शिखर पर पहुंचने के जोश में लोग ख़तरों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जोखिम उठाते हैं और जान से हाथ धो बैठते हैं.

मगर, पलजोर और उनके साथियों के लिए एवरेस्ट की राह एकदम हमवार थी. उनके पास सारे संसाधन थे, ताक़त थी और तजुर्बा भी था.

1996 में एवरेस्ट की चढ़ाई करने वाली आईटीबीपी की टीम के लीडर थे कमांडेंट मोहिंदर सिंह.

मोहिंदर सिंह अपनी पत्नी के साथ

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इमेज कैप्शन, मोहिंदर सिंह अपने परिवार के साथ सैन फ्रांसिस्को में रहते हैं.

मोहिंदर सिंह ने ही पलजोर की ताक़त और उत्साह को देखते हुए, एवरेस्ट फ़तह के लिए जाने वाली पहली टीम का लीडर चुना था. पलजोर के साथी थे सेवांग मनला और दोर्जे मोरुप. आईटीबीपी टीम के डिप्टी लीडर हरभजन सिंह पलजोर को याद करके कहते हैं कि वो बहुत उत्साही थे, ज़िंदगी में बहुत कुछ हासिल करना चाहते थे, हमेशा नई चुनौतियों के लिए तैयार रहते थे.

लेकिन, ये आत्मविश्वास ही पलजोर और उनकी टीम की नाकामी और मौत की सबसे बड़ी वजह थी. हरभजन कहते हैं कि शुरुआत ही ख़राब हुई. जब वो तय वक़्त पर चढ़ाई के लिए नहीं निकल सके. इसके बाद तो ग़लतियों पर ग़लतियां होती गईं.

असल दिक़्क़त शुरू हुई 10 मई 1996 को जब, तेज़ हवा के चलते पलजोर और उनके साथी अपने कैम्प से, क़रीब पांच घंटे की देरी से निकल सके. वो तेज़ी से शिखर की तरफ़ बढ़ रहे थे, तभी हवा का रुख़ पलट गया, रफ़्तार तेज़ हो गई.

हरभजन सिंह ने उन्हें, बेस कैम्प लौटने का निर्देश दिया. लेकिन शायद पलजोर की टीम ने उनके संदेश को सुना नहीं या अनसुनी कर दी. हरभजन सिंह तो वापस कैम्प आ गए थे.

हरभजन सिंह

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इमेज कैप्शन, अभियान के डिप्टी कमांडर हरभजन सिंह इसमें अकेले बचे हुए पर्वतारोही थे.

उस दिन को याद करते हुए हरभजन सिंह कहते हैं कि उस दिन जान गंवाने वालों में चौथा नाम उनका भी होता अगर वो, लौट न आए होते, इसके लिए वो भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं.

हरभजन सिंह अपने कैम्प लौट आए थे, तभी क़रीब तीन बजे उन्हें वॉकी टाकी पर पलजोर के साथी सेवांग मनला की आवाज़ सुनाई पड़ी. "सर हम चोटी के बेहद क़रीब हैं." हरभजन ने उन्हें चेताया कि मौसम ख़राब हो गया है, वो कैम्प लौट आएं.

मगर, हरभजन बताते हैं कि मनला ने उनकी एक न सुनी और कहा कि वो सिर्फ़ एक घंटे में चोटी पर पहुंच जाएंगे. हरभजन ने फिर से चेताया कि सूरज ढलने वाला है. इसलिए बेहतर होगा कि ख़तरा मोल न लें लौट आएं.

लेकिन मनला ने तब तक वाकी टाकी पलजोर को पकड़ा दिया, जिसने कहा कि सर, प्लीज़ हमें ऊपर जाने की इजाज़त दें. जब तक हरभजन कुछ कह पाते, वाकी टाकी का संपर्क कट गया.

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क़रीब साढ़े पांच बजे मनला ने फिर से वॉकी टाकी पर हरभजन को बताया कि पलजोर और मोरुप, एवरेस्ट फ़तह कर चुके हैं. कामयाबी की ख़बर मिलते ही कैम्प और घर में जश्न शुरू हो गया था. सेवांग पलजोर और उनकी टीम ने देश का नाम रौशन किया था. उत्तरी ओर से एवरेस्ट जीतने वाले पहले भारतीय थे वो तीनों.

मगर, बाद में उनके एवरेस्ट विजय के दावों पर भी सवाल उठे. अमरीकी पत्रकार जान क्रॉकर ने इस बारे में पड़ताल के बाद कहा कि वो तीनों शायद चोटी से पांच सौ फुट पहले ही रुक गए थे, ख़राब मौसम के चलते.

या शायद उन्हें भ्रम हो गया कि वो एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच चुके हैं. हालांकि हरभजन और पलजोर के परिवार वाले ये मानते हैं कि उस टीम ने एवरेस्ट के शिखर तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की थी.

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लेकिन मनला के ख़ुशख़बरी देने के थोड़ी ही देर बाद मौसम बेहद ख़राब हो गया. हरभजन सिंह परेशान थे. लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि रात तक पलजोर और उनके साथी, कैम्प में सुरक्षित लौट आएंगे.

मगर, अफ़सोस, ऐसा नहीं हुआ. जब रात आठ बजे तक भी तीनों नहीं लौटे, तो परेशान होकर हरभजन सिंह ने वहां से गुज़र रही जापानी पर्वतारोहियों से गुज़ारिश की कि ऊपर गए उनके साथियों की मदद करें. जापानी पर्वतारोहियों हिरोशी हनाडा और ईसुके शिगेकावा उसी रात चोटी की चढ़ाई पर जाने वाले थे.

अगले दिन सुबह नौ बजे जापानी टीम के लीडर ने हरभजन को बताया कि उन्हें दोर्जे मोरुप दिखे हैं, जो भयंकर ठंड से सुन्न हो चुके थे, उन्होंने उनकी मदद की है और वे लोग आगे बढ़ रहे हैं.

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दो घंटे बाद जापानी टीम और उनके साथ गए शेरपा ने सेवांग मनला और पलजोर को भी रास्ते में पड़ा देखा. मगर वो उनकी मदद के लिए नहीं रुके और चोटी की अपनी चढ़ाई जारी रखी.

हरभजन सिंह कहते हैं कि जापानी पर्वतारोहियों ने ज़रा भी इंसानियत नहीं दिखाई, कि उनके मरते हुए जवानों को कम से कम दो बूंद पानी तो पिला देते.

हालांकि बाद में जापानी टीम ने बेदिली के इस आरोप को ख़ारिज किया. जापान में एक प्रेस कांफ्रेंस में जापानियों ने कहा कि उन्हें किसी ने नहीं बताया कि भारतीय टीम के सदस्य किसी मुसीबत में हैं. हालांकि उन्होंने ये ज़रूर माना कि रास्ते में उन्हें चढ़ाई करने वाले दूसरे लोग ज़रूर दिखे, मगर कोई मुसीबत में या मदद की दरकार वाला शख़्स नहीं दिखा.

जापानियों ने अपने बयान में ये भी कहा कि आठ हज़ार मीटर की ऊंचाई पर हर शख़्स की अपनी ख़ुद की ज़िम्मेदारी होती है.

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लेकिन, पहाड़ पर चढ़ाई का कोड ऑफ़ एथिक्स कहता है कि शिखर पर पहुंचने से ज़्यादा ज़रूरी है मुसीबत में पड़े लोगों की मदद करना. पुराने पर्वतारोही भी जापानी टीम के दावों को ख़ारिज करते हैं. और कहते हैं कि मुसीबत में पड़े लोगों की मदद करना किसी भी मिशन का पहला फ़र्ज़ होना चाहिए.

हालांकि, जब आप आठ हज़ार मीटर की ऊंचाई पर खड़े हों. आपके चारों और सिर्फ़ पहाड़ हों, बर्फ़ हो और सांस लेने तक में दिक़्क़त हो रही हो, तो क्या करना सही होगा, य़े तय करना बहुत मुश्किल होता है.

इन बातों से इतना तो साफ़ है कि मई 1996 में एवरेस्ट की उस ऊंचाई पर क्या हुआ, ये सही सही बता पाना मुश्किल है. आज ये पक्के तौर पर कहना ज़रा मुश्किल है कि ज़िंदगी के आख़िरी पलों में पलजोर, मनला और मोरुप के साथ क्या हुआ था.

लेकिन, 1996 के उस हादसे का प्रतीक वो ग्रीन बूट्स बन गए हैं. जिन्हें कई बिज़नेस स्कूलों ने अपने सिलेबस में भी शामिल किया है.

जानकार कहते हैं कि ऐसे हादसों से क्या सबक़ मिला, ये सही सही कहना मुश्किल है.

सेवांग की मां ताशी

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मगर, सेवांग पलजोर की मां, ताशी एंगमो को आईटीबीपी से कई शिकायतें हैं. पहले तो उन्होंने, परिवार को सही सही जानकारी नहीं दी, सिर्फ़ ये कहा कि वो एवरेस्ट पर लापता हो गए हैं.

वो कई दिनों तक आईटीबीपी के लद्दाख के दफ़्तर के चक्कर लगाती रहीं कि उनके बेटे को बचाने के लिए कोई मिशन भेजा जाए. वो आज भी ये मानती हैं कि अगर कोशिश की गई होती तो उनके बेटे को बचाया जा सकता था.

पलजोर के परिवार को बीमे की रक़म के तौर पर महज़ ढाई लाख रुपए मिले और हर महीने चौबीस सौ रुपए पेंशन मिलती है.

पलजोर मेडल

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आज बीस बरस बाद भी पलजोर और उनके साथियों की लाशें, माउंट एवरेस्ट पर पड़ी हैं. एक बीमार मानसिकता के पड़ाव के तौर पर...

पलजोर जैसे लोग, जो एवरेस्ट पर मौत के मुंह में समा गए...वो मरते नहीं...पहाड़ उन्हें ज़िंदा रखता है...ग्रीन बूट्स के तौर पर.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख <link type="page"><caption> यहां पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20151008-the-tragic-story-of-mt-everests-most-famous-dead-body" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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