दुनिया के हर कोने में छिपी है ख़ुफ़िया ज़ुबान

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हम ने कभी न कभी ख़ुफ़िया ज़ुबान में बात की होगी. कुछ शब्द कोड वर्ड के तौर पर इस्तेमाल किए होंगे.

दोस्तों की महफ़िलों में कुछ साथियों से बात छुपाने के लिए, दफ़्तर में अपने सीनियर्स के सामने ही कभी उनका मज़ाक़ बनाने के लिए...

या बचपन में मां-बाप से आंख चुराकर भाई-बहनों के साथ कोई सीक्रेट प्लान बनाने के लिए.

लेकिन, हमारी आपकी ये ख़ुफ़िया ज़ुबान, लुग़त-ए-ग़रीब है. इसके पास गिने-चुने शब्द हैं. छोटे-छोटे सीक्रेट हैं.

मगर आपको अंदाज़ा न होगा कि ख़ुफ़िया ज़ुबानों की एक बहुत बड़ी दुनिया है. हिंदी-उर्दू या अंग्रेज़ी में ही नहीं, कमोबेश दुनिया की हर ज़ुबान में आपको ये चोर-भाषा मिल जाएगी.

तो चलिए आपको ले चलते हैं ख़ुफ़िया ज़ुबानों की काली-अंधेरी दुनिया की सैर पर.

ख़ुफ़िया ज़ुबान या चोर-भाषा की ये दुनिया रंग-रंगीली है. दिलचस्प क़िस्सों से भरी पड़ी है. अंग्रेज़ी में तो इसके लिए कई नाम हैं. मसलन, एंटी-लैंग्वेज या क्रिमिनल कैंट.

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इसी तरह रूसी हो या हिंदी, या फिर, पोलिश ज़ुबान. हर भाषा में एंटी-लैंग्वेज या ख़ुफ़िया ज़ुबान बोलने वालों की अच्छी ख़ासी तादाद है.

चोर बोली का इतिहास कोई आज का नहीं. इसकी तारीख़ शायद उतनी ही पुरानी है, जब से इंसानों ने बोलना सीखा होगा.

मगर, सोसाइटी में ख़ुफ़िया ज़ुबानों का, कोड वर्ड का चलन जुर्म की दुनिया में काम करने वालों ने, चोर-उचक्कों ने बढ़ाया.

उन्होंने ऐसा हुक्मरानों की निगाहों से बचने के लिए, अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए, सबके सामने अपने साथी से गुप्त बातें करने के लिए किया.

अपराधियों ने ख़ुफ़िया ज़ुबान के चलन को ख़ूब बढ़ाया.

इंग्लैंड में सदियों से इस चोर-भाषा को क़ैदी, ग़ुलाम, भिखारी, वेश्याएं और चोर-उचक्के-बदमाश बोलते रहे हैं, ताकि पुलिस-प्रशासन की नज़रों से बच सकें.

बरसों से इस ख़ुफ़िया बोली को अलग-अलग नाम दिए जाते रहे हैं. जैसे थीव्स कैंट, पोलारी या फिर गॉबल्डीगूक.

आज भी अपराधी, धड़ल्ले से, आपके सामने ख़ुफ़िया ज़ुबान में बात कर लेंगे और आपको ख़बर तक न होगी.

हो सकता है कि दो बदमाश आपके सामने ही आपको लूटने के प्लान पर बात करें, और आप उनके ऊटपटांग शब्दों को सुनकर सिर्फ़ मुस्कुराकर रह जाएं. क्योंकि वो आपकी समझ से परे होंगे.

कई बार तो आपके गाली-गलौज के शब्द, भद्दे मज़ाक वाले लफ़्ज या लोकगीतों के शब्द उठाकर भी बदमाश अपनी चोर-भाषा गढ़ लेते हैं. आपको लगेगा कि वो किसी को गाली दे रहे हैं, या मज़ाक़ उड़ा रहे हैं.

मगर वो आपके साथ बैठकर असल में किसी अपराध की साज़िश रच डालते हैं.

इंग्लैंड में पहले पहल अपराधियों की इस ख़ुफ़िया बोली के बारे में जानकारी इकट्ठा की थी, एक मजिस्ट्रेट साहब ने. उनका नाम था थॉमस हरमन.

हरमन साहब का चोर-उचक्कों और भिखारियों के कोड वर्ड की डिक्शनरी बनाने का क़िस्सा भी बड़ा दिलचस्प है.

उनके मुताबिक वो अपने घर के सामने खड़े हो जाते थे और भिखारियों में पैसे और खाना बांटते थे. वो ऐसे लोगों को धमकाते भी थे कि अपनी ख़ुफ़िया बोली के शब्द बताएं, वरना उन्हें जेल भेज देंगे.

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मरता क्या न करता. भिखारियों ने बारी-बारी से हरमन साहब को अपने कोड वर्ड बता दिए. ये दिलचस्प क़िस्सा बयां किया है ख़ुफ़िया बोलियों पर काम करने वाले ब्रिटिश एक्सपर्ट जोनाथन ग्रीन ने, जिन्होंने ऐसी भद्दी ज़ुबानों के इतिहास पर क़िताब भी लिखी है, '500 ईयर्स ऑफ वल्गर टंग' के नाम से.

ग्रीन कहते हैं कि गाली-गलौज, अभद्र भाषा या जाहिलों वाली ज़ुबान, अक्सर हमारी नीच सोच का प्रतीक होती है.

मगर, हर दौर में इंसान ऐसी बोली बोलता आया है. क्योंकि ये इंसान के बुनियादी गुणों मसलन, ख़ौफ़, ग़ुस्से, शरीर के अंगों और जिस्मानी रिश्तों के बारे में हमारी सोच को बयां करती है.

चोर-उचक्कों की ये ख़ुफ़िया बोली बेहद पेचीदा होती है, जो हमारी आम बोलचाल में नहीं देखने को मिलती.

16वीं सदी के ब्रिटिश मजिस्ट्रेट थॉमस हरमन ने अपनी क़िताब में ऐसी कई मिसालें दी हैं. इसमें अपराधी बेहद मुश्किल वाक्य बोलते हैं. उनके शब्द अलग होते हैं और मतलब तो बिल्कुल ही अलग.

अब जिसको ये कोड वर्ड मालूम नहीं होगा, वो कभी इन बदमाशों के इरादे भांप ही नहीं सकेगा.

थॉमस हरमन की क़िताब छपने के सदियों बाद उसकी मदद से एंटी-लैंग्वेज या ख़ुफ़िया ज़ुबान की पहली परिभाषा तय हुई.

ब्रिटिश मूल के ऑस्ट्रेलियाई भाषाविद् माइकल हालीडे कहते हैं कि एंटी-लैंग्वेज वो बोली है जो समाज की मुख्यधारा से कटे छंटे लोग बोलते हैं.

हालीडे ने जब ब्रिटिश अपराधियों की ख़ुफ़िया बोली की तुलना पोलैंड के क़ैदियों के कोड वर्ड या फिर कोलकाता की गंवारू, अभद्र बोली से की, तो उन्हें सब में बड़ी समानता दिखी.

ये समाज के उस तबक़े के लोग थे जो अलग-थलग थे लेकिन अपराध की दुनिया से जुड़े थे.

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हर देश में ऐसी चोर ज़ुबानें बोलने वाले, अपने इलाक़े की भाषा के ही लफ़्ज़ कोड वर्ड के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

जैसे इंग्लैंड में चोर उचक्के, लंदन को रोम, बटुए को पर्स के बजाय बाउंज, पैसे को लोअर और शराब की दुकान को बूज़िंग केन कहते हैं.

कई बार ख़ुफ़िया ज़ुबानों में एक ही चीज़ के लिए कई-कई शब्द होते हैं. हालीडे बताते हैं कि 16वीं सदी में इंग्लैंड के चोर, अपने जैसे लोगों के लिए एक-दो नहीं 20 तरह कोड वर्ड इस्तेमाल करते थे.

इसी तरह, कोलकाता में चोर-उचक्कों की ज़ुबान में पुलिस कहने के लिए 41 कोड वर्ड हैं तो बम के लिए बीस ख़ुफ़िया लफ़्ज़.

हर, इलाक़े में चोर-भाषा बोलने वालों का नए शब्द गढ़ने का तरीक़ा भी अलग होता है. जैसे अंग्रेज़ चोर अक्सर शब्दों को उलट-पलट के बोलते हैं जैसे फेस को इकैफ.

माइकल हालीडे मानते हैं कि इन चोर शब्दों के इस्तेमाल से अंडरवर्ल्ड की दुनिया में लोगों की हैसियत भी तय होती थी. जो अच्छे से ख़ुफ़िया ज़ुबान बोल सकता था, उसका दर्ज़ा ज़्यादा था.

जो अपराधी, अपने लोगों की ज़ुबान ठीक से नहीं बोल पाते, उन्हें नीची नज़र से देखा जाता था.

समाज से कटे, अलग-थलग पड़े तबक़ों की इन ख़ुफ़िया ज़ुबानों की डिक्शनरी काफ़ी बड़ी है.

फिर चाहे माफ़िया की चोर-भाषा मॉबस्पीक हो या न्यूज़ीलैंड के क़ैदियों के बीच बोली जाने वाली ख़ुफ़िया ज़ुबान बूबस्लैंग. जब ऐसी बोलियों के शब्दों को जमा किया गया तो बूबस्लैंग के शब्दकोष में तीन हज़ार कोड-वर्ड जमा हो गए.

दो सौ पन्नों की इस चोर भाषा वाली डिक्शनरी में प्यार में पड़ने को 'अंडर द थम्ब' कहा जाता है तो मूर्ख को 'डबल योकर' और ज़ोरदार मुक्के को 'गुडनाइट किस'.

जेल के बाहर भी ख़ुफ़िया ज़ुबान की दुनिया भी बड़ी दिलचस्प है. अस्सी के दशक के न्यूयॉर्क के ठगों को ही ले लीजिए.

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ये कभी अपने शिकार को एपल तो कभी अंडा या कभी मुखबिर कहते थे. शिकार का नाम ये बड़े सम्मान से लेते थे.

ख़ुफ़िया बोली का सबसे अच्छा नमूना अफ्रीकी देश मोजाम्बीक के शहर टिम्बकटू के पास मिलता है. यहां से क़रीब 250 किलोमीटर की दूरी पर एक चट्टान के नीचे छुपा हुआ एक गांव है.

गांव का नाम है बंगांडे, जिसका वहां की ज़ुबान में मतलब होता है, लुका-छिपा. माना जाता है कि ये गांव ग़ुलामी की ज़ंजीरों से छूटे लोगों ने बसाया था.

इन लोगों ने दासों का कारोबार करने वालों से बचने के लिए ख़ुफ़िया बोली गढ़ ली, जो आज तक चलन में है. ताकि वो ग़ुलाम बनाने वाले कारोबारियों से बच सकें.

इस गांव के लोग अपनी सीक्रेट बोली बमुश्किल ही किसी को बताते हैं.

अलग-अलग देशों में अलग-अलग दौर में ऐसी बहुत सी ख़ुफ़ियां बोलियां चलन में आईं, जो बदलते वक़्त के साथ चलन से बाहर भी हो गईं, मगर ये हमारी सोसाइटी पर गहरी छाप छोड़ गईं.

ब्रिटन के समलैंगिकों की ख़ुफ़िया बोली पोलारी को ही ले लीजिए. पिछली सदी के उस दौर में जब समलैंगिक होना अपराध था, तो गे कम्युनिटी ने चोर-उचक्कों की ज़ुबान, जिप्सियों की बोली और इटैलियन शब्दों को मिलाकर ये ख़ुफ़िया बोली गढ़ी थी.

ताकि समाज में अपने जैसे लोगों से बात कर सकें.

इंग्लैंड के समलैंगिकों की इस ख़ुफ़िया बोली पोलारी का इतना गहरा असर हुआ कि कई फ़िल्मों और टीवी सीरियल्स में भी इसका जमकर इस्तेमाल हुआ.

यहां तक कि बीबीसी रेडियो पर भी इस ख़ुफ़िया बोली वाले प्रोग्राम प्रसारित हुए थे. जिसमें कभी संगीत तो कभी दूसरे इशारों के हवाले से समलैंगिक रिश्तों पर बात होती थी.

पोलारी की ये कामयाबी इस बात की मिसाल है कि कैसे ख़ुफ़िया ज़ुबान की मदद से समाज के दबे-कुचले तबके ने अपनी आवाज़ उठाई.

मगर, आज की तारीख़ में जब ब्रिटेन में समलैंगिकता अपराध नहीं है, तो पोलारी नाम की ये ख़ुफ़िया बोली, चलन से बाहर हो गई है.

मगर इसके कई कोड वर्ड हैं जो आज ब्रिटिश सोसाइटी में खुलकर इस्तेमाल हो रहे हैं.

मशहूर अंग्रेज़ गायक-संगीतकार डेविड बोवी के ताज़ा एल्बम का एक पूरा गीत ही पोलारी और नैडसैट नाम की काल्पनिक ख़ुफ़िया ज़ुबान के शब्दों से लिखा गया था.

ये ख़ुफ़िया ज़ुबानें, ये चोर-बोलियां अक्सर अपराध की दुनिया में ही पैदा होती हैं, पलती-बढ़ती हैं.

मसलन, आज की तारीख़ में अपराध का दायरा बढ़ा है तो नए नए शब्द भी इस ज़ुबान से जुड़ रहे हैं, आज असलाह के लिए न जाने कितने कोड-वर्ड हैं, इसी तरह ड्रग, पैसे, पुलिस के लिए भी नए नए ख़ुफ़िया शब्द गढ़े जा रहे हैं.

इन शब्दों को हिप हॉप म्यूज़िक में भी खुलकर लिखा जा रहा है.

फिर, पुराने शब्दों को नई चीज़ों के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसे एक ख़ास तरह की ड्रग को ब्रॉकली नाम दे दिया गया है.

आज ऑनलाइन बोलचाल की ज़ुबान एकदम नए तरीक़े से गढ़ी जा रही है. सिर्फ़ वेश्यावृत्ति के लिए ही 'प्रैक्टिसिंग अ हॉबी', 'ट्रॉलिंग' और 'मॉंन्गरिंग' जैसे कई कोड-वर्ड चलन में आ गए हैं.

सरकारें जैसे जैसे ऑनलाइन सेंसरशिप बढ़ा रही हैं, वैसे वैसे होशियार लोग ख़ुफ़िया ज़ुबानें गढ़कर इससे पार पाने के नुस्खे भी निकाल ले रहे हैं.

आख़िर इन चोर भाषाओं का, ख़ुफ़िया बोलियों का, क्रिमिनल कैंट्स का चलन इसी तरह तो शुरू हुआ था. हुक्मरानों, प्रशासन की आंख में धूल झोंकने के लिए, ज़ोर-ज़ुल्म से बचने के लिए.

हमारे साहित्य में, कविताओं में, क़िस्से-कहानियों और उपन्यासों में भले ही ख़ुफ़िया ज़ुबान के शब्द न हों.

मगर, इनके बग़ैर हमारी बोली, हमारी संस्कृति अधूरी है. ये चोर-भाषाएं, अंडरवर्ल्ड में ख़ूब फल-फूल रही हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख <link type="page"><caption> यहां पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160211-the-secret-anti-languages-youre-not-supposed-to-know" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="bbc.co.uk/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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