झूठे को पकड़ने का तरीक़ा यह है..

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थॉमस ऑर्मेरॉड के सुरक्षा अधिकारियों की टीम को एक लगभग असंभव सा काम सौंपा गया.
पूरे यूरोप में हवाई अड्डों पर उन्हें यात्रियों से उनकी पृष्ठभूमि और भावी यात्राओं के बारे में पूछना था और उनमें से झूठ बोलने वाले को सही-सही पहचानना था.
ऑर्मेरॉड ने हवाई अड्डों पर पहुँच रहे यात्रियों के बीच कुछ झूठी पृष्ठभूमि वाले लोगों को मिला दिया था.
सुरक्षा टीम का काम इन लोगों को पहचानना था. हर 1000 यात्रियों में झूठ बोलने वाला केवल एक ही था. ज़ाहिर है ये काम बहुत मुश्किल था.
तो फिर उन्होंने किया क्या? एक विकल्प तो यह था कि झूठ पकड़ने के लिए शरीर की हरकतों, चेहरे के भाव और आखों पर ध्यान दिया जाए.
पूरी दुनिया में झूठे व्यक्ति को पहचानने के लिए लोग यही करते हैं, लेकिन यह सही तरीका नहीं है.
अध्ययन से पता चला है कि प्रशिक्षित पुलिस अधिकारी भी शारीरिक मुद्राओं और चेहरे के भावों से झूठ पकड़ने में सफल नहीं होते.
एक अध्ययन के अनुसार 20,000 में से सिर्फ़ 50 लोग ही 80 फ़ीसदी से ज़्यादा सटीकता के साथ सही अनुमान लगाने में कामयाब हो पाते हैं.

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लेकिन ऑर्मेरॉड की टीम ने कुछ अलग किया और ज़्यादातर मामलों में झूठे यात्री को पहचानने में सफल रहे. उनकी इस सफलता का राज़ क्या था?
उन्होंने झूठ पहचानने की परिचित तकनीकों को एक ओर रख दिया और नई तथा सीधी-सपाट तकनीकों के साथ शुरुआत की.
पिछले कई सालों से झूठ पकड़ने के लिए जो शोध हुए हैं उनके बेहद नकारात्मक नतीजे आए हैं.
पहले ज़्यादातर झूठ बोलने वाले को उनकी शारीरिक हरकतों या चेहरे के भाव- गाल लाल होने, घबराई हुई हंसी, भटकती आंखें आदि से पहचानने की कोशिश की जाती थी.
इस तरीके का सबसे अच्छा उदाहरण बिल क्लिंटन हैं. जब वे मॉनिका लेविंस्की से अपने संबंधों का खंडन कर रहे थे तो बार-बार अपनी नाक छू रहे थे. ऐसा करना उनके झूठे होने का पक्का सबूत माना गया था.
बर्मिंघम में अलाबामा विश्वविद्यालय के टिमोथी लेवाइन कहते हैं कि देखा गया है कि झूठ बोलते वक़्त कुछ भावनाएं मज़बूती से जगती हैं. जैसे घबराहट, अपराधबोध और तो और चुनौती देखने पर उत्तेजित होना.
अगर हमें लगता है कि हमारा चेहरा भावशून्य है, तब भी हम चेहरे पर मामूली उतार-चढ़ाव दिखा ही देते हैं. इसे 'सूक्ष्म-अभिव्यक्ति' कहते हैं और इससे आपकी पोल खुल सकती है.
लेकिन मनोवैज्ञानिक जैसे-जैसे इसे परखते गए पूरी तरह भरोसेमंद सूत्र मिलना मुश्किल होता चला गया. समस्या यह है कि मानव व्यवहार में भारी अंतर हैं.

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जिस व्यक्ति को आप पहचानते हों, संभव है कि उसके बारे में आप बता दें कि वो सच बोल रहा है या नहीं. लेकिन अन्य लोग अलग तरह से बर्ताव करते हैं. शारीरिक मुद्राओं से झूठ या सच पहचानना सब पर लागू नहीं होता.
ससेक्स विश्वविद्यालय में काम करने वाले ऑर्मेरॉड कहते हैं, "ऐसे कोई नियमित लक्षण नहीं हैं जो झूठ के साथ सभी में दिखते हों. मैं घबराता हूँ तो हँसता हूँ. हो सकता है कि दूसरे जब घबराते हों तो ज़्यादा गंभीर हो जाते हों. जबकि कुछ नज़रें मिलाकर सीधे बात करते हैं और कुछ नज़रें चुराने लगते हैं.''
लेवाइन उनसे सहमति जताते हैं, "झूठ और सच का अंतर जानने का कोई भरोसेमंद सूत्र नहीं हैं."
इनके बावजूद हमारी सुरक्षा इन संकेतों के सहारे छोड़ दी जाती है. मान लें कि एक लंबी उड़ान के लिए यात्रियों की छानबीन करनी है- ऑर्मेरॉड को 2012 ओलंपिक की तैयारियों के दौरान ऐसा करने को कहा गया था. तो यह कैसे करें?
आमतौर पर अधिकारी यात्री का इरादा जानने के लिए 'हां/ना' की एक प्रश्नोत्तरी का इस्तेमाल करते हैं. वह किसी किस्म के 'संदेह के लक्षण' (जैसे घबराहट भरी शारीरिक मुद्राएं) देखने के लिए प्रशिक्षित होते हैं.
वह कहते हैं, "इसमें यह गुंजाइश नहीं होती कि वो इस बात को सुन पाएं जो उनके प्रश्न के उत्तर में कही जा रही है. न चेहरे के भाव देखते समय यह संभव होता है कि जवाब को ध्यान से सुनकर इंसान की विश्वसनीयता के बारे में सोचें."

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मौजूदा व्यवस्था में भी पूर्वाग्रह की आशंका है. उदाहरण के लिए अधिकारी संदिग्ध लक्षण कुछ ख़ास जाति समूहों में दिखने के लिए ज़्यादा सतर्क रहते हैं. वह कहते हैं, "दरअसल वर्तमान तरीका झूठ को पकड़े जाने से बचाता है."
साफ़ है कि एक नए तरीके की ज़रूरत है. ऑर्मेरॉड का जवाब एकदम सीधा है. रहस्यमयी व्यवहार के बजाय उन शब्दों पर ध्यान दें, जो लोग दरअसल कह रहे हैं. हल्के से उन सही प्रेशर पॉएंट्स की पड़ताल की जाए जिनसे झूठ बोलने वाला कमज़ोर पड़े.
ऑर्मेरॉड और वॉल्वरहैंपटन विश्वविद्यालय में उनके साथी कोरल डान्डो ने संवाद के सिद्धांतों की एक श्रृंखला की पहचान की है जिनसे झूठ पकड़ने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.
ये हैं ओपन क्वेश्चन यानी वो सवाल पूछे जाएं जिनका जवाब हां या ना में नहीं बल्कि विस्तार से देना पड़े. इससे झूठ बोलने वाले को अपनी कहानी विस्तृत तौर पर बताने को मजबूर होना पड़ता है और वह अपने ही जाल में फंस जाता है.
अचरज के तत्व को भी शामिल करें. जांचकर्ताओं को झूठ बोलने वाले संदिग्ध से इतनी घटनाओं और तथ्यों की बात करनी चाहिए कि इन सभी को याद रखने के लिए उसके दिमाग़ पर खासा बोझ पड़े.
ऐसे अप्रत्याशित सवाल पूछने चाहिए जो थोड़े भ्रम में डालने वाले हों, या फिर घटनाओं के बारे में उल्टे क्रम में पूछा जाए. ये ऐसे तरीके हैं जो उसके लिए अपने मुखौटे को बनाए रखने में मुश्किल पैदा करेगा.

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छोटे, प्रमाण योग्य ब्यौरों को देखें. अगर एक यात्री कहता है कि वह ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में है तो उससे ऑफ़िस तक पहुंचने की उसकी यात्रा के बारे में बताने को कहें. अगर आपको उसमें कोई विरोधाभास दिखता है तो टोकें नहीं- झूठ बोलने वाले के आत्मविश्वास को बढ़ने दें जिससे वह और झूठ बोलता जाएगा.
आत्मविश्वास में बदलाव को देखें. ध्यान से देखें कि जब चुनौती दी जाती है तो कैसे एक संदिग्ध झूठे का रंग ढंग बदलता है: एक झूठा व्यक्ति बड़बोला भी हो सकता है जब वह यह महसूस करता है कि वार्तालाप का नियंत्रण उसके हाथ में है, लेकिन उसकी सहजता का दायरा सीमित होता है. जब उसे लगता है कि वह नियंत्रण खो रहा है तो वह एकदम चुप भी हो सकता है.
उद्देश्य यह है कि कड़ी पूछताछ के बजाय सामान्य बातचीत हो. इस हल्के दबाव में झूठ बोलने वाला अपनी ही बातों को काटकर या गोलमोल बातें करके या डांवाडोल होकर खुद ही अपना पर्दाफ़ाश कर देता है.
ऑर्मेरॉड कहते हैं, "खास बात ये है कि झूठ पकड़ने की कोई जादुई गोली नहीं है; हम लोग सबसे अच्छे तरीक़ों को सामने रख रहे हैं."
वह खुलकर स्वीकार करते हैं कि उनकी रणनीति आम समझ जैसी लग सकती है.

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लेकिन परिणाम खुद अपनी कहानी कहते हैं. उनकी टीम ने कुछ फ़र्ज़ी यात्री तैयार किए और उनके वास्तविक लगने वाले टिकट और यात्री दस्तावेज़ बनाए. उन्हें अपनी कहानी तैयार करने के लिए एक हफ़्ते का समय दिया गया और फिर उन्हें यूरोप भर के हवाई अड्डों में असली यात्रियों के साथ क़तार में खड़ा होने को कहा गया.
ऑर्मेरॉड और डांडो की इंटरव्यू तकनीक का प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारियों के उन फ़र्ज़ी यात्रियों को पकड़ने की गुंजाइश अप्रशिक्षित अधिकारियों के मुक़ाबले में 20 गुना अधिक दिखी.
उन्हें 70 फ़ीसदी सफलता मिली.
लेवाइन इस अध्ययन में शामिल नहीं थे. वह कहते हैं, "यह सचमुच असरदार है."
लेवाइन का ख़ुद का प्रयोग भी इतना ही प्रभावशाली साबित हुआ है. ऑर्मेरॉड की तरह वह भी मानते हैं कि शारीरिक मुद्राओं में बताए गए लक्षणों की पहचान की कोशिश के बजाय झूठ बोलने वाले की कहानी में कमियां ढूंढने के लिए चतुराई से तैयार इंटरव्यू अधिक बेहतर होते हैं.
उन्होंने हाल ही में एक सामान्य सा दिखने वाला खेल तैयार किया. इसमें अंडरग्रेजुएट लोग जोड़े में खेलते हैं. हर सही जवाब पर विद्यार्थियों को पांच डॉलर का नक़द इनाम मिलता है.

विद्यार्थियों को पता नहीं था कि उनके साथी अभिनेता थे. जब गेम मास्टर थोड़ी देर के लिए कमरे से बाहर गया तो अभिनेता ने सलाह दी कि वह चुपके से जवाबों पर नज़र डाल लें. कुछ विद्यार्थी बात मान गए जबकि अन्य ने ऐसा नहीं किया.
इसके बाद सभी विद्यार्थियों से असली पुलिस अधिकारियों ने पूछा कि उन्होंने धोखा किया था या नहीं. शारीरिक मुद्राओं या अन्य लक्षणों पर ध्यान दिए बिना- उनकी कहानी की पड़ताल के लिए चतुराई से सवाल पूछकर उन्होंने 90 फ़ीसदी सटीकता के साथ धोखा देने वालों को पकड़ लिया.
एक विशेषज्ञ अधिकारी तो सभी 33 इंटरव्यू में, 100 फ़ीसदी सही रहे.
बाद में हुए एक अध्ययन से पता चला कि सिर्फ़ सीधे, खुलकर सवाल पूछने से नौसिखियों को भी क़रीब 80 फ़ीसदी सफलता मिली.
वह बातचीत की शुरुआत विद्यार्थियों से यह पूछकर करते हैं कि वह कितने ईमानदार हैं.

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लेवाइन कहते हैं, "लोग चाहते हैं कि उन्हें ईमानदार माना जाए और इससे उनका रवैया अधिक सहयोग भरा हो जाता है."
"और जो ईमानदार नहीं थे उन्हें (इसके बाद) सहयोग का दिखावा करने में दिक़्क़त हुई."
अपनी सफलता के बावजूद ऑर्मेरॉड और लेवाइन दोनों चाहते हैं कि उनके निष्कर्षों को दोहराया और विस्तार दिया जाए ताकि वह विभिन्न परिस्थितियों में खरे उतरें.
हालांकि यह तकनीक शुरू में क़ानून-व्यवस्था में मददगार होगी लेकिन यही सिद्धांत आप अपनी ज़िंदगी में झूठे लोगों को पकड़ने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

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ऑर्मेरॉड कहते हैं, "बच्चों के साथ मैं हमेशा इस तकनीक का इस्तेमाल करता हूँ."
असल बात यह है कि दिमाग़ खुला रखें और किसी नतीजे पर पहुंचने की जल्दी न करें: कोई घबराया हुआ लग रहा है या कोई महत्वपूर्ण ब्यौरा याद करने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो इसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वह दोषी है. इसके बजाय आपको ज़्यादा असंगतियों की ओर देखना चाहिए.
झूठ पकड़ने का कोई विश्वसनीय तरीका नहीं होता. लेकिन थोड़े सी चतुराई, बुद्धिमानी से आप उम्मीद कर सकते हैं कि सच बाहर आएगा.
(<bold>अंग्रेज़ी में मूल लेख</bold><link type="page"><caption> यहाँ पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20150906-the-best-and-worst-ways-to-spot-a-liar" platform="highweb"/></link>, <bold>जो</bold> <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link><bold>पर उपलब्ध है</bold>)
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