मधुमक्खियों पर यूँ रखी जाएगी नजर

- Author, डेनिस विंटमैन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मैंगज़ीन
सैकड़ों प्रकार की मधुमक्खियों के बारे में हम जानते हैं जो न केवल ग्रामीण जीवन में विशेष स्थान रखती हैं बल्कि हमारे दैनिक आहार का एक तिहाई हिस्सा इन्हीं के परागणों पर निर्भर है.
पिछले पच्चीस साल में <link type="page"><caption> इंग्लैंड</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/07/130730_lung_cancer_uk_rns.shtml" platform="highweb"/></link> में मधुमक्खियों की संख्या आधे से भी कम हो गई है. मधुमक्खियों की जनसंख्या के मामले में यही हाल दूसरे देशों का भी है और इस बात को लेकर वैज्ञानिक बहुत चिंतित हैं.
एक <link type="page"><caption> मधुमक्खी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130429_honey_bees_eu_ml.shtml" platform="highweb"/></link> एक दिन में हज़ारों फूलों पर जाती है और कई किलोमीटर का सफर तय करती है. ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए मधुमक्खियों की कम होती संख्या का अध्ययन करने में सबसे बड़ी बाधा थी स्वभाव से चपल मधुमक्खियों पर लगातार नजर रखना.
लेकिन अब 'नेचुरल रिसोर्स इंस्टीट्यूट' के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का हल ढूँढ़ लिया है. वैज्ञानिक मधुमक्खियों पर नजर रखने के लिए हार्मोनिक रडार तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं.
इस रडार के ट्रांसमीटर से निकली तरंगों को मधुमक्खी के शरीर के पिछले भाग पर चिपका एंटीना ग्रहण करता है. एंटीना में लगा डायोड इस सिग्नल को एक ऐसे वेवलेंथ (तरंगदैर्ध्य) में बदल देता है जिस पर आसानी से नजर रखी जा सकती है.
एक एंटीना का बदला गया सिग्नल बिल्कुल अनूठा होता है. <link type="page"><caption> पर्यावरण</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/08/130802_climate_change_violence_rns.shtml" platform="highweb"/></link> में मौजूद अन्य किसी स्रोत से इस तरह की तरंगें नहीं निकलतीं. इसलिए वैज्ञानिक आसानी से जान जाते हैं कि जिस स्रोत से यह तरंग निकल रही है वो कोई मधुमक्खी है.
प्लास्टिक डिस्क

इस तकनीक का संचालन सरकार से मदद प्राप्त हर्टफोर्डशायर स्थित एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर रॉथैमस्टेड रिसर्च के वैज्ञानिक करेंगे. मधुमक्खियों के अध्ययन की विभिन्न परियोजनाओं में इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है.
प्रत्येक एंटीना को मधुमक्थी के शरीर पर हाथ से चिपकाया जाएगा. परीक्षण के लिए चुनी गई मक्खियों के शरीर पर प्लास्टिक की एक छोटी सी डिस्क चिपकाई गई हैं.
हर डिस्क पर पहचान संख्या अंकित रहेगी. इसके बाद इस डिस्क पर एक एंटीना चिपका जाता है. यह डिस्क और एंटीना मधुमक्खी के शरीर पर इस तरह चिपकाया जाता है कि यह अपने आप नहीं छूट सकता.
मधुमक्खियों को पकड़ने के लिए उनके छत्ते से एक लम्बी ट्यूब जोड़ी जाएगी. इस ट्यूब में मधुमक्खी के प्रवेश करते ही उसके सिरे पर लगे दरवाजे बंद हो जाते हैं. मधुमक्खी के शरीर से एंटीना निकालने के लिए भी इसी तकनीक का प्रयोग किया जाता है.
मधुमक्खी के शरीर पर लगे एंटीना से आने वाने सिग्नल से रडार स्क्रीन पर एक ब्लिप होती है. इस ब्लिप से पता चल जाता है कि मधुमक्खी कितनी दूर है और यह किस दिशा में जा रही है. इन ब्लिप की मदद एक कम्प्यूटर प्रोग्राम मधुमक्खी की उड़ान का रास्ता तैयार करता है.
इस एंटीने की लम्बाई मधुमक्खी की लम्बाई के बराबर ही होती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि एंटीने की लम्बाई कोई समस्या नहीं है क्योंकि मधुमक्खियों लाखों साल से भारी वजन उठाने की अभ्यस्त हैं.
उठाती हैं दोगुना वजन
मधमक्खियां अपने शरीर से दोगुने वजन के पराग को ले जा सकती हैं.

रॉथैमस्टेड रिसर्च संस्थान के डॉ. जैसन चैपमैन कहते हैं, “इस एंटीने का वजन मधुमक्खी के शरीर के वजन से दस गुना कम होता है. उनके लिए इस एंटीने को ढोना बहुत आसान है. उन्हें वजन लेकर उड़ने की आदत होती है इसलिए इससे उनके उड़ान के रास्ते पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा. ”
पहले-पहल इस तकनीक का विकास अफ्रीकी मक्खियों के अध्ययन के लिए किया गया था. इन अफ्रीकी मक्खियों के काटने से नींद की बीमारी हो जाती थी.
इस तकनीक मे एक ही कमी है. इसमें एक समय में एक ही मक्खी पर नजर रखी जा सकती है. अलग-अलग मक्खियों को उड़ान रास्ते के बीच भ्रम हो सकता है. इसी कारण इस शोध में बहुत समय लग जाता है.
डॉ. चैपमैन कहते हैं, “हमने भविष्य में हार्मोनिक रडार के नए विकसित संस्करण के प्रगोग की दीर्घकालीन योजना बनाई है. उसके बाद हम कई मधुमक्खियों पर एक साथ नजर रख सकेंगे.”
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