अभी रोटावैक टीके पर जश्न मनाना जल्दबाज़ी

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- Author, डॉ. चन्द्र मोहन गुलाटी
- पदनाम, मासिक ड्रग जर्नल (मीम्स) के संपादक
रोटावैक टीके की सफलता के बारे में अभी कोई दावा करना जल्दबाजी होगी. अभी भारत में इसका क्लीनिकल परीक्षण पूरा नहीं हुआ है.
फरवरी, 2011 में शुरू हुए क्लीनिकल परीक्षण दिसंबर, 2013 तक पूरे होंगे. इसके बाद ही इसके बारे में अंतिम रूप से कुछ कहा जा सकेगा.
विश्व में करीब सवा चार लाख बच्चों की और भारत में करीब एक लाख बच्चों की डायरिया के कारण मृत्यु होती है. इसके लिए कई वायरस जिम्मेदार होते हैं. रोटावायरस इन कई वायरसों में एक है.
यह कहना गलत होगा कि रोटावायरस की रोकथाम करने वाले रोटावैक टीके की खोज से डायरिया से होने वाली सभी मौतें रुक जाएंगी.
यह कहना भी गलत है कि हम दूसरे देशों के लिए भी यह सस्ता टीका उपलब्ध करा सकेंगे. नस्लीय विभिन्नताओं के कारण किसी भी टीके का प्रयोग करने से पहले उस टीके का उस देश में क्लीनिकल परीक्षण करना जरूरी होता है. जबकि अभी इस टीके का भारत में ही परीक्षण पूरा नहीं हुआ है.
स्ट्रेन
इतना ही नहीं रोटावायरस के कई प्रकार होते हैं, जिन्हे चिकित्सा शास्त्र की भाषा में स्ट्रेन कहते हैं.
भारत में जिस रोटावायरस का टीका खोजा गया है उसका नाम 116ई है. इस टीके का प्रयोग केवल इसके समान स्ट्रेन की रोकथाम के लिए किया जा सकता है.
रोटावैक टीका पहले से उपलब्ध टीकों रोटारिक्स और रोटाटेक से गुणवत्ता में बेहतर नहीं है. इसकी विशेषता इसका सस्ता होना है. इसकी अनुमानित कीमत करीब 55 रुपए होगी.
मरीज को इन टीकों की दो खुराक देनी पड़ती है. वहीं रोटावैक की मरीज को तीन खुराक देनी होगी. दो खुराकों के लिए रोटारिक्स की कीमत 2,398 रुपए और रोटाटेक की कीमत 1200 रुपए पड़ती है. वहीं रोटावैक की तीन खुराकों की कुल कीमत करीब डेढ़ सौ रुपए ही आएगी.
यदि रोटावैट का परीक्षण सफल रहा तो भारत एवं अन्य कई देशों में डायरिया की रोकथाम के लिए इसका काफी महत्व होगा.
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