ओमिक्रॉन: कोरोना महामारी के दो साल बाद भी जिन तीन सवालों के जवाब मालूम नहीं

    • Author, कार्लेोस सेरानो
    • पदनाम, बीबीसी मुंडो सेवा

"हमें जितने सवालों के जवाब मिलते जाते हैं, उतने ही नए सवाल हमारे सामने आ जाते हैं."

ये कहना है पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी में माइक्रोबायोलॉजी एवं मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स विषय की प्रोफेसर डॉ सीमा लकड़ावाला का.

डॉ सीमा और उनके जैसे तमाम दूसरे वैज्ञानिक साल 2019 के दिसंबर महीने से कोरोना वायरस से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने में जुटे हैं.

ये तलाश शुरू होने के लगभग दो साल बाद वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने से लेकर इसके इलाज़ आदि का पता लगा लिया है.

लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि अभी भी कुछ ऐसे मूल सवाल हैं जिनके जवाब मिलना शेष हैं. और कोरोना से जुड़े इन रहस्यों से परदा हटा लिया जाए तो कोविड-19 का सामना करने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी.

फिलहाल, कोरोना से जुड़े तीन सवाल सबसे अहम हैं जिनके जवाब मिलना अभी बाकी हैं.

1. वायरस कहां से शुरू हुआ?

ब्रितानी स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी के मुताबिक़, "अभी भी ये पता लगाना शेष है कि इस वायरस की असल में शुरुआत कहां से हुई"

साल 2021 के फरवरी महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक टीम कोविड - 19 की उत्पत्ति के संबंध में जानकारी हासिल करने के लिए चीन पहुंची थी.

इस टीम ने बताया है कि इस बात की संभावना है कि ये वायरस चमगादड़ से आया हो. लेकिन इस मामले में अभी और शोध किए जाने की आवश्यकता है.

इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ टेड्रोस एडनॉम गेब्रियेसस ने बताया है कि चीन द्वारा आंकड़े उपलब्ध कराने एवं पारदर्शिता बरतने में कमी की वजह से जांच प्रभावित हुई है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की जांच में एक नतीजा ये निकला कि इस बात की "बहुत संभावना नहीं" है कि वायरस लैब में किसी घटना की वजह से इंसानों तक पहुंचा हो.

हालांकि, टेड्रोस ने बाद में कहा कि इस नतीजे पर पहुंचना एक "जल्दबाज़ी" थी.

साइंस पत्रिका के अक्तूबर महीने वाले अंक में प्रकाशित संपादकीय में उन्होंने टिप्पणी की कि "पर्याप्त सबूतों के बिना लैब में किसी घटना के घटित होने से इनकार नहीं किया जा सकता."

इसी महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विशेषज्ञों की एक टीम गठित की जो नए पेथोजेंस की उत्पत्ति से जुड़े वैज्ञानिक सलाहकार समूह (एसएजीओ) में शामिल हुए.

इस समूह का काम इस बात की जांच करना है कि ये वायरस वुहान के बाज़ारों में जानवरों से इंसानों में पहुंचा या लैब में हुई एक दुर्घटना की वजह से लीक हुआ.

इस समूह ने साल 2021 के नवंबर महीने में अपनी पहली बैठक की थी.

डॉ टेड्रोस ने बताया है कि एसएजीओ जैसे समूहों की पड़ताल ऐसी नीतियां बनाने में मदद करेगी जिनसे जानवरों से इंसानों में वायरस फैलने की आशंकाएं कम की जा सकें.

पिछले साल अक्टूबर महीने में अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसियों ने उस एक रिपोर्ट को उजागर किया जिसमें ये कहा गया है कि वे इस बात का कभी पता नहीं लगा पाएंगे कि वायरस आख़िर कहां से आया.

इस दस्तावेज़ में इस बात से इनकार किया गया कि इसे एक जैविक हथियार के रूप में बनाया गया था.

लेकिन इस रिपोर्ट में वायरस की शुरुआत के लिए लैब में हुए लीक या जानवरों से इंसानों में संक्रमण फैलने को संभावित कारण माना गया है.

हालांकि, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है.

चीन ने इस वायरस के लैब में लीक होने की संभावना को सिरे से नकार दिया है.

साल 2021 के नवंबर महीने में स्टेट न्यूज़ पोर्टल में प्रकाशित एक लेख में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के माइक्रोबॉयोलॉजी एवं इम्यूनोलॉजी विषय के प्रोफेसर जॉन पी मूर ने कहा है कि "हमें शायद कोविड - 19 की शुरुआत के बारे में कभी पता न चले."

मूर कहते हैं कि तमाम अजीबो-ग़रीब संभावनाएं सामने आ रही हैं जिन्हें नज़रअंदाज किया जा सकता है. लेकिन इस समय वायरस की उत्पत्ति को लेकर जारी बहस जानवरों से इंसानों में प्राकृतिक रूप से फैलने और लैब में फिल्टरेशन के दौरान फैलने पर केंद्रित है.

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2. कितने वायरस पार्टिकल से फैलता है संक्रमण

किसी व्यक्ति के इस वायरस या किसी अन्य वायरस से संक्रमित होने के लिए उस वायरस की एक निश्चित मात्रा को ग्रहण करना आवश्यक होता है.

इसे इन्फेक्शियस डोज़ या संक्रामक मात्रा कहते हैं.

सार्स - कोव - 2 के मामले में अब तक इसे लेकर जानकारी उपलब्ध नहीं है. और ये पता नहीं है कि एक व्यक्ति के इस वायरस से संक्रमित होने के लिए उसे वायरस के कितने पार्टिकल की ज़रूरत होती है.

अमेरिकी संस्था सीडीसी के मुताबिक़, "अब तक ये स्पष्ट नहीं हो सका है कि सार्स-कोव-2 का संक्रमण फैलने के लिए कितना इन्फेक्शियस डोज़ ज़रूरी होगा."

सीडीसी इस बात के भी संकेत देती है कि जानवरों पर हुए अध्ययन और एपिडेमियोलॉजिकल जांच में सामने आया है कि वायरस मिश्रित हवा में सांस लेने से संक्रमण हो सकता है.

लेकिन वायरस वाली हवा में सांस लेने एवं म्यूकस मेमब्रेन्स जैसे कि आँखों से संपर्क की संक्रमण में कितनी भूमिका है, ये अब तक स्पष्ट नहीं है.

डॉ लकड़ावाल बीबीसी मुंडो को बताती हैं, "एक प्रयोग के दौरान इंसानों को संक्रमित किए बिना इंसानों में सार्स-कोव-2 की संक्रामक मात्रा का पता नहीं लगाया जा सकता."

कुछ वायरसों जैसे कि इन्फ़्लूएंजा फैलाने वाले वायरस के मामले में एक व्यक्ति को संक्रमित होने के लिए वायरस के दस पार्टिकल की ज़रूरत होती है.

वहीं, मर्स जैसे वायरस फैलने के लिए एक व्यक्ति को हज़ारों पार्टिकल के संपर्क में आने की ज़रूरत थी.

कोरोना वायरस के मामले में अब तक ये जानकारी स्पष्ट नहीं है.

लकड़ावाला समझाते हुए कहती हैं कि इस बारे में जो कुछ पता है, वो 229ई वायरस से मिली जानकारी है. ये भी कोरोना वायरस का एक प्रकार है जिससे जुख़ाम होता है और इसकी संक्रामक मात्रा इन्फ़्लूएंजा जैसी है.

लकड़ावाला कहती हैं, "अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि यही चीज सार्स-कोव-2 के साथ होती है या नहीं.

वह कहती हैं, "ओमिक्रॉन वैरिएंट के मामले में ये स्पष्ट नहीं है कि इसकी अधिक संक्रामकता की वजह कम पार्टिकल में संक्रमण फैलाने की क्षमता है. हमें नहीं पता कि यह सौ, हज़ार या दस हज़ार पार्टिकल में संक्रमित करता है."

ये बात स्पष्ट है कि कोविड - 19 काफ़ी संक्रामक है. और शायद ऐसा इसलिए हो कि इसे संक्रमण फैलाने में कम पार्टिकल की ज़रूरत पड़ती है (इसका मतलब ये है कि इसका इनफैक्शियस डोज़ कम है) या संक्रमित लोग अपने वातावरण में ज़्यादा वायरस छोड़ता है.

फिलहाल, किसी व्यक्ति की संक्रामक क्षमता और उसे अलग - थलग करने से जुड़े प्रयास इस बात पर आधारित हैं कि एक व्यक्ति कितने समय तक वायरस हवा में छोड़ सकता है.

लकड़ावाला समझाती हैं कि इसी वजह से वायरस की संक्रामक मात्रा को समझना ज़रूरी है क्योंकि ऐसा होने पर ये पता लगाया जा सकेगा कि रेस्रां और स्कूलों जैसे स्थानों पर कितना जोख़िम है.

वह कहती हैं, "इस समय हम लोग सिर्फ सावधानी बरतते हुए संक्रमण से बचने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन संक्रामक मात्रा समझकर इसका सामना करने के लिए अपनाए जा रहे उपायों को मजबूती दी जा सकती है."

वह बताती है कि ये बात सही है कि अब तक संक्रामक डोज़ नहीं पता है लेकिन वैक्सीन लगने के बाद संक्रमण के लिए वायरस की संक्रामक मात्रा की आवश्यकता बढ़ जाती है.

वह कहती हैं, "वैक्सीन लगने के बाद संक्रमित होने के लिए आपको बहुत ज़्यादा मात्रा में वायरस मिश्रित हवा में सांस लेनी होगी."

फिलहाल कई ऐसे अध्ययन किए जा रहे हैं जहां एक नियंत्रित वातावरण में वॉलिंटियर को वायरस के अलग - अलग डोज़ दिए जा रहे हैं. इन प्रयोगों से वायरस की संक्रामक मात्रा को लेकर जानकारी मिलने की संभावना है.

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3. संक्रमण रोकने के लिए कितनी एंटी-बॉडीज़ की ज़रूरत

फिलहाल ये पता नहीं है कि किसी व्यक्ति को कोविड - 19 से सुरक्षित मानने के लिए उसके शरीर में कितनी एंटी-बॉडी होनी चाहिए.

इसे 'कोरिलेट ऑफ़ प्रोटेक्शन' उपाय के रूप में जाना जाता है. क्योंकि ये वह संकेतक हैं जिससे ये पता चलता है कि मानव शरीर किसी बीमारी या संक्रमण से सुरक्षित है अथवा नहीं.

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी व्यक्ति को कोरोना से सुरक्षित करार देने के लिए उसके शरीर में उपलब्ध एंटी-बॉडी की संख्या कोरोना के ख़िलाफ़ संघर्ष में एक अहम जानकारी है.

न्यू यॉर्क स्थित माउंट सिनाई हॉस्पिटल के इकाहन स्कूल ऑफ़ मेडिसिन में माइक्रोबायोलॉजी विषय के प्रोफेसर फ्लोरियन क्रेमर ने साइंस मैगज़ीन के जुलाई, 2021 अंक में बताया था कि "सार्स-कोव-2 के ख़िलाफ़ वैक्सीन के लिए एक प्रोटेक्टिव कोरिलेट की अति शीघ्र आवश्यकता है."

क्रेमर ने अपने लेख में समझाया था कि एंटी-बॉडी की संख्या को कोरिलेट ऑफ़ प्रोटेक्शन के रूप में स्थापित करना क्यों अहम है. क्योंकि इससे ये पता चलता है कि कोरोना से बचने के लिए शरीर में कितनी एंटी-बॉडी होनी चाहिए.

यही एक वजह है जिसके चलते नयी वैक्सीनों को अनुमति मिलने की रफ़्तार बढ़ सकती है.

क्योंकि यह फैसला लंबे और व्यापक फेज़ 3 ट्रायल के बिना वैक्सीन द्वारा दी जा रही रोग प्रतिरोधक क्षमता के आधार पर लिया जा सकता है.

क्रेमर समझाते हुए कहते हैं कि कोरिलेट ऑफ़ प्रोटेक्शन जानने से कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को वैक्सीन देना आसान होगा.

उदाहरण के लिए, अगर ये पता चल जाए कि अगर किसी के शरीर में सुरक्षा के लिए आवश्यक एंटी-बॉडीज़ पैदा नहीं हुई हैं तो उसे बूस्टर डोज़ दिया जा सकता है.

इसके साथ ही वह कहते हैं कि प्रोटेक्शन कोरिलेट स्वास्थ्य एजेंसियों के लिए एक संकेतक होगा जिसके आधार पर वह यह पता लगा पाएंगे कि उनकी कितने फीसद आबादी कोरोना से सुरक्षित है.

हालांकि, क्रेमर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि एक ऐसे कोरिलेट का पता लगाना लगभग असंभव होगा जो सभी वैक्सीन, वैरिएंट और सभी देशों की जनसंख्या पर लागू हो सके.

लेकिन अगर ऐसा नहीं भी होता है तब भी यह कोविड के ख़िलाफ़ संघर्ष में काफ़ी कारगर भूमिका निभाएगा.

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लकड़ावाला कहती हैं, ओमिक्रॉन के मामले में वैक्सीन ऐसी एंटी-बॉडी कम मात्रा में बनाती हैं जिनसे वायरस निष्क्रिय हो सके. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम सुरक्षित नहीं हैं. डेटा बताता है कि वैक्सीन की वजह से व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार होने से बच जाता है.

विशेषज्ञ ये भी बताते हैं कि नए वेरिएंट्स के आने से संक्रामक मात्रा और प्रोटेक्शन कोरिलेट डेटा में परिवर्तन आ सकता है.

लकड़ावाला कहती हैं, "वायरस संक्रमण के हर मौके पर बदल सकता है. और हर बार वह इन चीजों पर असर डाल सकता है. ऐसे में आपको संक्रमण से बचना होगा."

और जब शोधार्थी इन तीन और ऐसे ही अन्य सवालों के जवाब तलाश रहे हैं तब आम लोगों को कॉमन सेंस का इस्तेमाल करते हुए मास्क पहनना चाहिए, वैक्सीन लगवानी चाहिए और दूरी बनाकर रखनी चाहिए."

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