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ओमिक्रॉन वेरिएंट से पूरी दुनिया में चिंता लेकिन ये कितना ख़तरनाक है?
- Author, फर्नांडो गोंज़ालेज़ कैंडेलास
- पदनाम, द कन्वर्सेशन
कोरोना वायरस का नया वेरिएंट ओमिक्रॉन सामने आने के बाद से पूरी दुनिया में हलचल मची हुई है. देश कोरोना से बचाव संबंधी नियमों में सख्ती कर रहे हैं और यात्रा प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं.
ओमिक्रॉन की सबसे पहले पहचान दक्षिण अफ़्रीका में हुई थी. इस वायरस में अब तक के सबसे ज़्यादा 55 म्यूटेशन बताए जा रहे हैं और उसमें 32 म्यूटेशन इसके स्पाइक प्रोटीन में हुए हैं.
दक्षिण अफ़्रीका में इस वेरिएंट के मामले तेज़ी से बढ़े और इसी के चलते दुनियाभर के देशों की चिंताएं बढ़ी हुई हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वेरिएंट को "चिंता का विषय" बताते हुए इसका नाम ओमिक्रॉन रखा था.
ओमिक्रॉन के स्पाइक प्रोटीन में हुए 32 म्यूटेशन बहुत अहम बताए जा रहे हैं क्योंकि इनका संबंध शरीर की कोशिकाओं को संक्रमित करने और प्रतिरक्षा तंत्र से बचने में होता है.
इस तरह के म्यूटेशन कोरोना वायरस के अब तक आ चुके वेरिएंट्स में भी पाए गए हैं. इन वेरिएंट को 'वेरिएंट ऑफ़ कंर्सन' और 'वेरिएंट ऑफ़ इंटरस्ट' की श्रेणी में रखा गया था. जैसे एन501वाई म्यूटेशन जो एल्फ़ा, बीटा और गामा वेरिएंट में हुआ है. टी951, टी478के और जी142डी म्यूटेशंस जो डेल्टा वेरिएंट में हुए हैं.
इन म्यूटेशंस के शरीर में मौजूद एसीई2 सेल रिसेप्टर (एस477एन, क्यू498आर) के संपर्क में आने में भूमिका का पता चला है या ये कुछ एंटीबॉडीज़ (जी339डी, एस371एल, एस373पी, एस375एफ़) के क्षेत्रों में पाए गए हैं.
म्यूटेशंस के एकसाथ पाए जाने का असर
हालांकि, इन म्यूटेशन के एक साथ पाए जाने पर इनका क्या प्रभाव होगा ये अभी पता लगाया जाना बाकी है.
दो म्यूटेशन का एक साथ प्रभाव हमेशा जुड़कर आए ये ज़रूरी नहीं है. इनका प्रभाव ज़्यादा भी हो सकता है और घट भी सकता है यानी ये वायरस को और ख़तरनाक या कमज़ोर दोनों बना सकते हैं.
इस वेरिएंट के ज़्यादा संक्रामक होने या प्रतिरक्षा तंत्र से बच निकलने की अधिक क्षमता होने को लेकर जब तक शोध के परिणाम नहीं आ जाते और हमारे पास जीनोम (जीनों का समूह) निरीक्षण के आंकड़े नहीं होते तब तक अत्यधिक सतर्क होना या सतर्कता कम करना भी ठीक नहीं है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न इसलिए कहा है क्योंकि इसमें संक्रमण का ख़तरा ज़्यादा हो सकता है. हालांकि, अभी इस बात की पुष्टि के लिए कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है.
दक्षिण अफ़्रीका में मामले बढ़ना
दक्षिण अफ़्रीका में कोरोना के इस वेरिएंट के मामले तेज़ी से बढ़ने के चलते चिंता जताई गई है.
ये हैरानी की बात नहीं है कि दक्षिण अफ़्रीका में इस वेरिएंट का पता चला है क्योंकि ये सार्स-कोविड-2 के लिए सबसे अच्छी जीनोमिक निगरानी प्रणाली वाले देशों में से एक है और यहां वैक्सीनेशन अन्य अफ़्रीकी देशों की तरह ही तेज़ी से नहीं बढ़ पाया है.
दक्षिण अफ़्रीका में ये वेरिएंट गौतेंग प्रांत में पाया गया था. इसका पता ऐसे समय पर चला है जब इस इलाक़े में एक लाख में से 10 मामले सामने आ रहे थे.
ऐसी स्थितियों में कोई वेरिएंट तेज़ी से संक्रमण फैलाता है और मामले बढ़ जाते हैं. उसकी संक्रामकता ज़्यादा लगती है लेकिन ये भी है कि उस समय कोई और वेरिएंट मौजूदा नहीं होता जिससे उसे प्रतिस्पर्धा करनी पड़े.
लेकिन, इसके साथ ही एक सवाल ये भी है कि इतने म्यूटेशन वाला वेरिएंट कैसे पनपता है.
इसका कोई पुख्ता जवाब नहीं है. अंदाज़ा ये है कि ये वेरिएंट ऐसे मरीज़ में विकसित हुआ होगा जिसकी प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो और वो लंबे समय तक संक्रमित रहा हो. इसके बाद ये दूसरे लोगों में फैल गया जिसकी अभी जानकारी नहीं मिली है.
हम क्या कर सकते हैं?
ओमिक्रॉन से बचाव को लेकर भी हमारे पास वही तरीक़े हैं जो दूसरे वेरिएंट्स के लिए हैं यानी वैक्सीन, मास्क, दूरी बनाए रखना और बंद कमरों में वेंटिलेशन.
इससे आप वायरस के कम से कम संपर्क में आएंगे और उसका फैलाव कम हो जाएगा. वहीं, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को वैक्सीनेट करने से वायरस के लिए नए म्यूटेशन के मौक़े भी सीमित हो जाएंगे.
हालांकि, हमे लगा था कि डेल्टा वेरिएंट के बाद 'वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न' वाले नए वेरिएंट का आना मुश्किल होगा लेकिन ओमिक्रॉन ने हमें हैरान कर दिया.
भले ही ये ओमिक्रॉन 'वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न' बनने लायक गंभीर हो या नहीं लेकिन ये साफ़ है कि कोविड-19 वायरस का विकास हमें आगे भी हैरान कर सकता है. हम जितनी ज़ल्दी इन आशंकाओं को कम कर दें उतना सभी के लिए अच्छा होगा.
फर्नांडो गोंज़ालेज़ कैंडेलास जेनेटिक्स के प्रोफ़ेसर हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेलेंसिया- FISABIO "संक्रमण और सार्वजनिक स्वास्थ्य" संयुक्त शोध इकाई के प्रमुख हैं. उनका मूल लेख द कन्वर्सेशन में प्रकाशित हुआ था.
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