कोरोना का इलाज किया, जान भी गंवाई, उन डॉक्टरों को मोदी सरकार से मिला क्या?: बीबीसी पड़ताल

    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

22 वर्षीय मालती गंगवार और 56 साल की सुजाता भावे में कोई बहुत समानता नहीं है. सिवाय इसके कि दोनों ने कोविड-19 से अपने प्रियजनों को खोया है और दोनों ही मामलों में इनके प्रियजन स्वास्थ्यकर्मी थे.

दोनों के बीच एक और समानता है- दोनों ही इस बात से निराश हैं कि बुरे वक़्त में उनके साथ खड़ा रहने के सरकार के वादे के बाद भी उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया गया. महामारी की शुरुआत में स्वास्थ्यकर्मियों और उनके परिवारों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से व्यक्तिगत तौर पर सराहना की गई. उनके इशारे पर आम नागरिक थाली पीटते और दीये जलाते नज़र आए और स्वास्थ्यकर्मियों पर सेना के हेलीकॉप्टर से फूलों की पंखुड़ियों की बारिश की गई.

बीबीसी यह समझने के लिए कि उन परिवारों की आज स्थिति कैसी है, अपनी महीनों की पड़ताल के दरम्यान डॉक्टरों, मेडिकल एसोसिएशन, पूर्व नौकरशाहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्यकर्मियों के परिवारों तक पहुंची.

इस पड़ताल में सूचना का अधिकार क़ानून 2005 के तहत सरकार के पास आवेदन देना और सार्वजनिक दस्तावेज़ों पर शोध करना भी शामिल है.

मालती ने हमें क्या बताया?

हमारा पहला पड़ाव दिल्ली से 250 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के पास एक गांव है. वहां मेरी मुलाक़ात मालती से हुई.

अपने आंगन में बैठी वे अपनी मां के देहांत के बाद के दिनों को याद करती हैं.

"स्वास्थ्य विभाग समेत कई लोगों के फ़ोन आए थे. दूसरे स्वास्थ्यकर्मी मुझसे मेरी मां की नौकरी पकड़ लेने का आग्रह कर रहे थे. जीवन बीमा के पैसे के बारे में भी बात हुई और वो सभी बहुत सहयोगी लग रहे थे. उन्होंने मुझसे नौकरी के लिए एक फ़ॉर्म भरने के लिए कहा, जो मैंने किया. लेकिन मुझे नहीं पता कि उसके बाद क्या हुआ."

मालती की मां शांति देवी का निधन लगभग चार महीने पहले कोरोना वायरस के संपर्क में आने से हुआ था. वो मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता या आशा वर्कर (अधिकांश लोगों के बीच इसी नाम से पहचान) थीं.

उनके परिवार ने मुझे बताया कि वो प्रशासन से एक से अधिक बार सहायता के लिए संपर्क कर चुके हैं.

फिर भी, अब तक न तो मुआवज़ा मिला है और न ही नौकरी. 50 से कुछ अधिक उम्र की शांति देवी भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का गांव के स्तर पर प्रतिनिधित्व करती थीं.

उनके परिवार का कहना है कि वो 25 वर्षों से भी अधिक समय से ये काम कर रही थीं, जबकि इसमें मेहनताना बेहद कम मिलता था.

शांति के भाई ने मुझसे कहा, "परिवार की आर्थिक दशा कोई बहुत अच्छी नहीं है तो हमें जो कुछ भी मिलेगा उससे मदद ही मिलेगी."

सुजाता भावे के साथ क्या हुआ?

उधर मुंबई में सुजाता भावे अपनी स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही हैं.

उनके पति डॉक्टर चितरंजन भावे कान, नाक, गले (ईएनटी) के एक प्राइवेट डॉक्टर थे. 01 जून, 2020 को कोरोना वायरस से उनका निधन हो गया.

उनका परिवार बताता है, ''जब वे अपने मरीज़ों को देख रहे थे तब न तो कोई व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) थे और न ही कोविड से संबंधित कोई प्रशिक्षण ही प्रशासन की ओर से मुहैया कराया गया था.''

सुजाता बताती हैं, ''शुरू-शुरू में वो अपने मरीज़ों को ऑनलाइन देख रहे थे, लेकिन इस तरह से मरीज़ों को देखने में वे कभी संतुष्ट नहीं होते थे क्योंकि वीडियो कॉल पर कान, नाक और गले की जांच करना मुश्किल था. वो हमसे कहते रहते कि मुझे जाना चाहिए और फिर उन्होंने फ़ैसला ले लिया कि वो जाएंगे.''

अपने मरीज़ों को व्यक्तिगत रूप से देखना शुरू करने के कुछ दिन बाद ही उनमें कोरोना के लक्षण दिखने लगे. उन्हें भर्ती करना पड़ा. उसके बाद उनका परिवार फिर उनसे कभी नहीं मिल सका.

व्यथित परिवार ने जब मुआवज़ा मांगा तो इनकार कर दिया गया.

मुझसे एक कॉल के दौरान वो कहती हैं, "इसे अस्वीकार किया गया क्योंकि मेरे पति सरकारी वॉर्ड में काम नहीं कर रहे थे और वास्तव में एक निजी क्लीनिक में मरीज़ों की सेवा कर रहे थे.

अब कोई किसी मरीज़ से कैसे उम्मीद करेगा कि वो अपने इलाज के लिए कहां जाए? कई मौके पर मरीज़ जब डॉक्टर के पास पहुंचता है तो वो ये जानता है कि वो कोरोना वायरस से संक्रमित है. निश्चित रूप से ऐसा नहीं है कि सरकारी डॉक्टरों ने ही वायरस का सामना किया प्राइवेट डॉक्टरों ने नहीं. यह अनुचित था... यह भेदभाव है. हम अपमानित महसूस कर रहे हैं."

मालती और सुजाता की तरह और भी कई परिवार हैं जिनसे बीबीसी ने बात की.

हालांकि, केवल कुछ लोग ही बात करने के लिए तैयार हुए. दूसरों को यह डर था कि बोलने पर सरकार से मुआवज़ा मिलने की उनकी संभावना कम हो जाएगी.

ये परिवार संघर्ष क्यों कर रहे हैं?

सरकार से मुआवज़ा पाने के पीछे 26 मार्च 2020 को घोषित की गई एक बीमा योजना है. पीएम मोदी की सरकार ने कहा था कि बीमा कंपनी कोरोना वायरस से जान गंवानेवाले स्वास्थ्यकर्मियों के परिवार को 50 लाख रुपये के मुआवज़े का भुगतान करेगी.

सार्वजनकि योजना का एलान करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वास्थ्यकर्मियों को 'सफ़ेद वर्दी में भगवान' बताया था.

इस साल जुलाई में जब सरकार से सांसदों ने कोविड से लड़ाई में मारे गए स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या पर डेटा देने की मांग की तो उनके जवाब ने कई लोगों को चौंका दिया कि "उन्होंने ऐसा कोई डेटा रखा ही नहीं था."

हालांकि सरकार ने कहा कि उपरोक्त बताए गए बीमा योजना का लाभ दिया जा रहा है. बताया गया कि उक्त बीमा योजना के तहत 30 मार्च, 2020 से 16 जुलाई 2021 के बीच सरकार ने 921 स्वास्थ्यकर्मियों (जिनकी मौत हो चुकी थी) के परिजनों के दावों का निपटारा किया था.

सरकार को इस बीमा योजना के तहत 1,342 दावे प्राप्त हुए थे. बाकी 421 या तो अभी प्रक्रिया में थे या अस्वीकार कर दिए गए थे.

यह स्वीकार करते हुए कि लोगों को मुआवज़ा मिलने में देरी हो रही है, सरकार ने मई 2021 में मुआवज़े की प्रक्रिया में और सुधार किया.

आरटीआई क़ानून 2005 के तहत बीबीसी ने कई अनुरोध दायर किए और प्राप्त डेटा से पता चलता है कि सरकार ने 29 मार्च 2020 और 8 जुलाई 2021 के बीच पॉलिसी प्रीमियम के रूप में 663 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया है. ग़ौर करने वाली बात है कि सरकार ने इस राशि में से क़रीब 70 फ़ीसद का भुगतान 3 मई 2021 के बाद किया था.

सरकार ने क्या जवाब नहीं दिया था- कुल मौत के आंकड़ों के बग़ैर कैसे यह पता चलेगा कि क्या सरकार सभी योग्य परिवारों तक पहुंच रही है और उन्हें मुआवज़ा दे रही है?

आरटीआई क़ानून 2005 के तहत जानकारी मांगने के बावजूद, सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उसने यह बीमा योजना कैसे बनाई और क्या इसके लिए निविदा जारी की गई थी या बोली लगाई गई थी ताकि व्यापक कवरेज वाली योजना का आकलन करके उसका चयन किया जा सके.

अब, दूसरा पक्ष

चूंकि स्वास्थ्यकर्मियों का आंकड़ा सरकार ने नहीं रखा तो बीबीसी पेशेवर मेडिकल निकायों के पास यह देखने पहुंची कि उनके पास क्या मौजूद है.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने मुझे बताया कि कोविड के दौरान अपनी ड्यूटी करते हुए क़रीब 1,600 डॉक्टरों की मौत हुई है.

ट्रेन्ड नर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने कोविड-19 के कारण 128 मौतों की सूचना दी है.

जुलाई में सरकार ने संसद में बताया कि कोविड के दौरान कर्तव्यों का पालन करते हुए 100 से अधिक आशा वर्कर की मौत हो गई थी- ये आंकड़े भारत में दूसरी लहर से पहले के थे.

इन सीमित कोशिशों से जो आंकड़े सामने आ रहे हैं वो कोविड के कारण देश में 1,800 से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों के मौत की जानकारी दे रहे हैं. ये मौतें सार्वजनिक और प्राइवेट दोनों क्षेत्रों में हुई हैं. हालांकि इस सूची में सामुदायिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों, वॉर्ड ब्वॉय, दिहाड़ी पर काम करने वाले और आउटसोर्स किए गए वो लोग मौजूद नहीं हैं जो कोविड के दौरान ड्यूटी करते हुए इस दुनिया से चले गए.

'सार्वजनिक बनाम निजी' गड़बड़ को समझें

जब सरकारी मुआवाज़ा 900 परिवारों तक पहुंच गया है तो भी कोविड से मरने वाले स्वास्थ्यकर्मियों का आंकड़ा, कम से कम भी लिया जाए तो यह 1800 से भी अधिक है.

आखिर कोरोना से मरने वाले स्वास्थ्यकर्मियों और जिन लोगों को मुआवज़ा पहुंचा है उनकी संख्या के बीच ये गड़बड़ क्यों है?

ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार की बीमा पॉलिसी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और प्राइवेट सेवा के सिर्फ़ उन लोगों को मुआवज़ा देती है जिनकी सरकार ने मांग की थी.

दूसरे शब्दों में, कोविड-19 के कारण एक प्राइवेट डॉक्टर की मौत चाहे कोविड के मरीज़ या उस जैसे लक्षण वाले लोगों का इलाज करने के बाद होती है तो भी सरकार उसे कोविड से मरने वाले उन स्वास्थ्यकर्मियों में शामिल नहीं करती जिन्हें मुआवज़ा दिया जाना चाहिए.

आगरा में अपनी क्लीनिक में में बैठी डॉक्टर मधु राजपाल मुझे बताती हैं कि सरकार को उनके साथ इस तरह से नहीं व्यवहार करना चाहिए.

उनके पति डॉक्टर वीके राजपाल एक प्राइवेट डॉक्टर थे, उनकी कोविड के दूसरे दौर में मौत हो गई थी.

अपने सर्जिकल मास्क को ठीक करते हुए वो मुझसे कहती हैं, "मेरे पति 67 साल के थे. लेकिन वे यहां हमारे क्लीनिक में मरीज़ों को देखते थे और फिर मरीज़ों को कोविड अस्पताल में भर्ती कराया जाता था. हम अपने मरीज़ों को नज़रअंदाज नहीं कर सकते थे. मुझे लगता है कि हमें मुआवज़ा दिया जाना चाहिए, हम इसके हक़दार हैं. हमने कमाई करने वाले अपने मुख्य सदस्य को खो दिया है और इससे कई समस्याएं आई हैं."

वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह भेदभाव करना, यह कहना कि हम एक सरकारी डॉक्टर को ही मुआवज़ा देंगे और प्राइवेट डॉक्टर को नहीं देंगे, मुझे लगता है कि यह सही नहीं है. सरकार को सभी का समान रूप से ध्यान रखना चाहिए."

वो मुझसे कहती हैं कि मुआवज़े के सभी ज़रूरी दस्तावेज़ों को उन्होंने जमा करा दिया है, लेकिन अधिकारियों से अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.

डॉक्टर राजपाल और डॉक्टर भावे उन प्राइवेट चिकित्सकों में से थे जिन्होंने अपने माता-पिता की देखरेख को चुना तो कई अन्य लोगों को ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

मुंबई से मुझसे बात करते हुए एसोसिएशन ऑफ़ मेडिकल कंसल्टेंट्स की अध्यक्ष बनने जा रहीं डॉक्टर नीलिमा वैद्य भामरे कहती हैं, ''नगर निगम के प्राइवेट डॉक्टरों को एक सर्कुलर जारी किया गया था जिसमें ये कहा गया था कि अगर क्लीनिक नहीं खोला गया तो हम आपके लाइसेंस रद्द कर देंगे. तो यह धमकी है न, है कि नहीं? हम अपना रोजग़ार गंवा देंगे. ऐसा कई जगहों पर हुआ क्योंकि सरकार को यह एहसास हुआ कि उनके पास बुनियादी ढांचा नहीं है तो प्राइवेट क्षेत्र को आगे आना ही पड़ेगा. ''

वो आगे कहती हैं, ''इन सबके बावजूद आप न तो हमारा सम्मान करने और न ही हमें सुविधाएं देने को तैयार हैं. क्या यह अन्याय नहीं है? हमें कोर्ट जाना होगा क्योंकि सरकार हमारी बात सुनने को तैयार नहीं है.''

संसद की चेतावनी

नवंबर 2020 में भारतीय संसद ने देश में कोविड महामारी और उसके प्रबंधन को लेकर अपनी रिपोर्ट पेश की थी. इसमें भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के मुद्दे पर द्वितीयक एवं तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं में बड़े स्तर पर रिक्तियों को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी जिसकी वजह से निजी क्षेत्र और कॉन्ट्रैक्ट वर्कर पर निर्भरता बढ़ी है.

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, 'सभी स्वास्थ्यकर्मियों को बीमा कवरेज के साथ पर्याप्त मेहनताना और वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाने की ज़रूरत है. महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में जिन डॉक्टरों ने अपने प्राण गंवाए हैं उनकी शहीद के रूप में पहचान की जानी चाहिए और उनके परिवार को पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाना चाहिए.'

हालांकि इसके बावजूद सरकार की पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं आया.

मैं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डॉक्टर जयेश लेले के पास यह समझने के लिए पहुंचा कि भारतीय चिकित्सा बिरादरी इस स्थिति को कैसे देखती है.

उन्होंने मुझे बताया, "सरकार ने ठीक काम नहीं किया है. निश्चित रूप से उनके (सरकारी) जमा किए गए डेटा में कुछ कमी है. ग्रामीण क्षेत्रों समेत हमारी 1,700 शाखाओं को कहीं अधिक डेटा मिले हैं जिनकी जांच परख करने के बाद हमने मुआवज़े के लिए सरकार के पास भेज दिया है."

"अब भी कोविड के कारण मरने वाले 1,600 डॉक्टरों में से जितना हम जानते हैं क़रीब 200 को ही यह मिल गया है. बाकी या तो ख़ारिज कर दिए गए हैं और प्रक्रिया या तो बहुत धीमी है या बहुत अधिक लालफ़ीताशाही है. अगर कोई दावा ख़ारिज कर रहे हैं तो यह सुनिश्चित करने के लिए कि वो लोग इसके लायक हैं या नहीं और उन्हें यह रक़म मिलनी चाहिए या नहीं, सरकार को फिर से सर्वे करना चाहिए. और, आप महामारी के शुरुआती दिनों में मिल रहे समर्थन और संदेशों की तुलना आज इन मृत स्वास्थ्यकर्मियों के परिवार के साथ जो हो रहा है उससे कैसे करते हैं?

"मुझे बहुत दुख हो रहा है. हम वैक्सीन पर खर्च कर रहे हैं, पूरी दुनिया की तुलना में हमारी मृत्यु दर कम है और यह हमारे स्वास्थ्यकर्मी हैं जो दिन-रात एक कर लाखों लोगों का इलाज कर रहे हैं, लेकिन उनके ही परिवार वालों को इस तरह से उपेक्षित महसूस कराया जा रहा है. प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों को बहुत सम्मान दिया, लेकिन इन सबका असर क्या हुआ?"

सरकार अब क्या कर सकती है?

के सुजाता राव ने बतौर पूर्व स्वास्थ्य सचिव भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली को देखा है. वो कहती हैं कि ये बीमा पॉलिसी 'बहुत सीमित' लगती है.

इसे और विस्तार देते हुए इसमें एंबुलेंस कर्मचारियों, कॉन्ट्रेक्ट वर्कर के साथ साथ श्मशान घाट पर काम करने वालों को भी शामिल किया जाना चाहिए. इस बीमा को पाने की योग्यता के मानदंड कहीं अधिक उदार होने चाहिए.

जिन लोगों को इसमें निश्चित रूप से उच्च प्राथमिकता में रखना चाहिए था और जिनपर ज़्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था, वो हमारे स्वास्थ्यकर्मी हैं. सरकार को और बड़े दिल वाला होना चाहिए, चाहे वो निजी क्षेत्र के हों या सार्वजनिक क्षेत्र के, मैं वाक़ई इसको लेकर कोई अंतर नहीं करूंगी."

बीबीसी स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के पास यह पूछने पहुंची कि क्या मंत्रालय मृत स्वास्थ्यकर्मियों की गिनती को दुरुस्त करने पर विचार कर रहा है और क्या उन्हें (मृतकों के परिजनों को) एक बेहतर और अधिक प्रभावी कवर देने के लिए मौजूदा नीति में कोई संशोधन किया जाएगा.

लेकिन अभी तब हमें हमारे इन प्रश्नों का जवाब मंत्रालय से नहीं मिला है. उनका जवाब मिलते ही हम उसकी जानकारी यहां देंगे.

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