पाकिस्तान के थार रेगिस्तान में 'नख़लिस्तान' खोजने वाला शख़्स

पाकिस्तान, थार, शहाबुद्दीन समेजू
    • Author, शबीना फ़राज़
    • पदनाम, पत्रकार, पाकिस्तान से

उनकी क्या बात की जाए, उनकी ज़मीन पर तो ज़ीरा उगता है. जब भी सरहद पार भारत में रहने वाले रिश्तेदारों का ज़िक्र होता, तो अब्बा उनकी अमीरी का ज़िक्र इसी एक वाक्य से करते थे.

शहाबुद्दीन समेजू कहते हैं कि उन्होंने अपना बचपन सीमा पार भारत में बसे अपने रिश्तेदारों के बारे में इसी तरह के क़िस्से सुनते हुए गुज़ारा है.

उनका गांव डाहली तहसील के सखी सयार क्षेत्र में है. जनसंख्या के हिसाब से यह थारपारकर की दूसरी सबसे बड़ी तहसील है और भारत की सीमा से सटा हुआ है. सीमा के उस पार भारत का बाड़मेर जिला है, जो क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का पांचवां सबसे बड़ा जिला है.

समेजो समुदाय पाकिस्तान और भारत की सीमा के दोनों ओर रहता है. भारत के विभाजन में केवल भूमि का ही नहीं, बल्कि लोगों का भी बंटवारा हुआ था. परिवार बंट गए थे.

14 अगस्त, 1947 की सुबह शहाब का गांव 'सखी सयार' पाकिस्तान के हिस्से में आया और 'ख़ानियानी' भारत के हिस्से में. स्थिति ऐसी बनी कि शहाब की फूफी ज़रीना तीन भाइयों की इकलौती बहन थी, जिनका विवाह ख़ानियानी गांव में हुआ था, अचानक विदेशी हो गईं.

अब उनसे मिलने के लिए पासपोर्ट और वीज़ा रुकावट बन गए हैं. लेकिन बंटवारे के बाद, अब भी दिल एक साथ धड़कते हैं.

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इमेज कैप्शन, थार के रेगिस्तान में पीने का पानी भी मुश्किल से मिलता है

बॉर्डर पर बाड़ लग जाने के बाद

शहाब के बुज़ुर्गों के मुताबिक़, पहले तो दोनों तरफ के लोग किसी न किसी तरह से छुप-छुप कर सरहद पार कर लेते थे. लेकिन, 1992 में बॉर्डर पर बाड़ लग जाने के कारण अब ये भी संभव नहीं है.

शहाब बताते हैं कि उन्होंने अपनी फूफी को तस्वीरों के अलावा कभी नहीं देखा. हां, लेकिन आवाज़ जरूर सुनी है.

वे कहते हैं, "जो लोग राजस्थान जाते थे, मेरी फूफी कैसेट में अपनी बात रिकॉर्ड करके, उनके ज़रिए भेज देती थीं. इस तरह वो अपने भाइयों के साथ अपना दुख-सुख साझा करती थीं. हम भी जवाब में यहां से कैसेट रिकॉर्ड करके भेज देते थे. बस इतना ही संपर्क था."

शहाब कहते हैं कि परिवार के ज़्यादातर सभी बड़े-बूढ़े फूफी की ज़मीन और फ़सलों पर 'रश्क़' करते थे. ख़ास तौर पर उनकी ज़ीरे की फ़सल का ज़िक्र ज़रूर होता, जो वहां बहुतायत में उगता था. बेशक, यह एक नकदी फ़सल है, जिसने लोगों को लखपति बना दिया.

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'पानी कहां है?'

शहाब ने कहा कि एक दिन बचपन में उन्होंने बाबा को सलाह दी ​थी कि ''हम भी तो ज़ीरा उगा सकते हैं. ये बात सुन कर शहाब के पिता हंसे थे और कहा था, "हमारे पास पानी कहां है...जब बारिश होती है तो थोड़ी बहुत फ़सल हो जाती है."

शहाब ने अगला सवाल किया था, "फूफी के पास पानी कहां से आता है?" "क्या वहां बारिश बहुत होती है?"

उन्हें बताया गया, "बारिश का तो पता नहीं, लेकिन वे ज़मीन का पानी इस्तेमाल करते हैं." हमारी तरफ का पानी खारा है. इससे फसलें नहीं होतीं."

लेकिन इस जवाब ने शहाब को संतुष्ट नहीं किया.

पांचवीं कक्षा के बाद, जब उन्होंने अपने पिता से कहा कि वह आगे की शिक्षा के लिए शहर जाना चाहते हैं, तो उनके पिता ने कहा, "वहां रहने और पढ़ने के लिए हज़ारों रुपये ख़र्च होंगे. इतने पैसे हम कहां से लाएंगे? तुम कराची या हैदराबाद के किसी धार्मिक मदरसे में चले जाओ. वहां शिक्षा के साथ-साथ रहने और खाने की भी नि:शुल्क व्यवस्था होगी.

उनके एक रिश्तेदार उन्हें टंडोजाम ले कर आ गए और एक मदरसे में उनका दाख़िला करा दिया.

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'शिक्षा से सोच को मिलीनई दिशा'

शहाब बताते हैं कि मदरसे में दाख़िला होने से उनकी ज़िंदगी बदल गई. यहां उनकी सोच को एक नई दिशा मिली.

इस मदरसे के पास 150 एकड़ कृषि भूमि भी थी और उसके पास से ही एक नहर निकलती थी. वो कहते हैं कि "मेरे जैसे रेगिस्तान के रहने वाले ने, ज़िन्दगी में पहली बार नहर और इतना सारा पानी देखा और देखता ही रह गया.

उनका कहना है कि अब उनके दिमाग को सोचने के लिए एक नया नज़रिया मिल गया था. उन्होंने बचपन से ही मॉनसून के मौसम में अपने क्षेत्र में ग्वार, बाजरा और मूंग की सीमित फसलें देखी थीं. और यही समझते थे कि खेती सिर्फ बारिश के मौसम में ही संभव है. जब कई सालों तक बारिश नहीं होती थी, तो भूखे रहने की नौबत आ जाती थी. हर तरफ बस रेत ही रेत उड़ती रहती थी.

मदरसे की इतनी बड़ी ज़मीन पर नहर के पानी से खेती होते देखी तो वे हैरान रह गए. शिक्षकों से बात करते हुए, उन्होंने यह भी जाना कि बारिश के अलावा भी पानी के कई अन्य स्रोत हैं, जिसका इस्तेमाल खेती के लिए भी किया जा सकता है. इसमें भूजल भी शामिल है.

अब, वे अक्सर अपने इलाक़े और सीमा पार होने वाली फ़सलों की तुलना करते, तो उनके मन में यह सवाल भी उठता कि ऐसा कैसे हो सकता है कि सीमा पार का पानी मीठा है और इस तरफ खारा...

शहाब ने आगे बताया कि उन्होंने इस मदरसे से अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर सिंध यूनिवर्सिटी से एमए. इसके बाद सरकारी परीक्षा पास करने के बाद, वे अपने ही गांव के स्कूल में शिक्षक बन कर लौटे.

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इमेज कैप्शन, जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने खेती के लिए भूजल का उपयोग करने का फ़ैसला लिया

मास्टर बनने के बाद गांव में खेती शुरू की

गांव में पढ़ाने के साथ-साथ शहाब ज़मीनों को उपजाऊ बनाने के बारे में भी सोचते रहते. लेकिन कोई साधन नजर नहीं आया.

हालांकि, टेक्नोलॉजी ने अब सीमा पार के रिश्तेदारों के साथ संपर्क करना आसान बना दिया था. पूरी जानकारी मिलने के बाद वे अच्छी तरह समझ गए थे कि वो भी खेती के लिए भूजल का उपयोग कर सकते हैं. लेकिन यह होगा कैसे? आर्थिक मुश्किलें एक सवालिया निशान बन कर उनके सामने आ जाता.

सीमा-पार अब ज़ीरा या पारंपरिक फ़सलों की बात पुरानी हो गई थी. अब वहां फलों के बाग़ लग रहे थे. इन फलदार पेड़ों के साथ-साथ किसान भी फल-फूल रहे थे. राजस्थान में, ज़ीरे सहित हरी-भरी फ़सलों के साथ ख़जूर के फलों से लदे पेड़ों की वीडियो और तस्वीरें शहाब के इरादों को और मजबूत बना रहे थे.

इस संबंध में बाड़मेर के डॉक्टर सुरेंद्र चौधरी का कहना है कि रेगिस्तान में इस क्रांति का श्रेय राजस्थान के कृषि सचिव संजय दीक्षित को जाता है, जो बाड़मेर जिले के कलेक्टर भी रहे थे. वह राजस्थान के लोगों के आर्थिक संकट का स्थायी समाधान खोजना चाहते थे.

वे 2009 में एक प्रतिनिधिमंडल के साथ सऊदी अरब गए, जहां उन्होंने रेगिस्तान में ख़जूर के पेड़ देखे. वे ख़जूर के आर्थिक और पौष्टिक फ़ायदों से प्रभावित हुए. वो वहां के कृषि विभाग से एक समझौते के तहत अपने साथ ख़जूर के पौधे ले आये. पौधों की इन आठ नस्लों में अजवा नस्ल के पौधे भी शामिल थे.

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ख़जूर की खेती ने बदली सोच

उन्होंने राजस्थान के कुछ किसानों को ये पौधे मुफ़्त देने का फैसला किया. लेकिन समस्या यह थी कि किसान इन पेड़ों को लगाने के लिए तैयार नहीं थे.

राजस्थान में इससे पहले कभी ख़जूर के पेड़ नहीं लगाए गए थे. किसान सोच रहे थे कि अपनी ज़मीन पर नए पेड़ लगायें जो चार साल बाद फल देंगे भी या नहीं, पता नहीं. "यह जोखिम कौन उठाए?"

हालांकि बाड़मेर के एक छोटे से गाँव अल-मसर के किसान सादुलाराम चौधरी ने यह कठिन निर्णय लिया.

उन्होंने अपनी ज़मीन पर सैकड़ों पौधे लगा लिए और ड्रिप इरिगेशन की मदद से उन्हें पानी देते रहे. ये क्रांतिकारी किसान डॉक्टर सुरेंद्र चौधरी के पिता थे.

डॉक्टर सुरेंद्र कहते हैं, "जो किसान मेरे पिता का मज़ाक़ उड़ाते थे, वे अब उन्हें अपना गुरु मानते हैं. हमारी ज़मीन पर छह सौ से अधिक ख़जूर के पेड़ हैं, जिनमें सऊदी अरब और इराक़ की किस्में शामिल हैं. इनमें से सबसे कीमती अजवा है, जिसे हम ढाई से तीन हज़ार रुपये (भारतीय) प्रति किलो के हिसाब से बेचते हैं."

"अब मेरे पिता सादुलाराम एक ब्रांड बन गए हैं. बाड़मेर जिले में अब तक तीन सौ किसान ख़जूर के बाग लगा चुके हैं, जबकि अन्य एक हज़ार किसान ख़जूर के पेड़ लगाने की योजना बना रहे हैं."

इस कहानी ने शहाब को प्रभावित किया. वे कहते हैं, "मैं ख़ुद रेगिस्तान का रहने वाला हूं. यहां की भौगोलिक परिस्थितियों से मैं अच्छी तरह वाक़िफ़ हूं. ऐसे में रेगिस्तान में ख़जूर के पेड़ का सफल रोपण, सादुलाराम चौधरी का यह कारनामा किसी क्रांति से कम नहीं था. और ये सफल उदाहरण मेरे लिए एक सुनहरा सपना था जिसे मैं जागती आँखों से देखता था."

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'खारे भूजल से खेती शुरू की'

शहाब कहते हैं कि "बड़े-बूढों से मैंने सुना था कि इरादे अच्छे हों तो मंज़िल भी आसान हो जाती है. अब मुझे विश्वास हो गया."

उनका कहना है कि 2014 के सबसे भीषण सूखे के दौरान, उन्होंने लोगों की मदद के लिए कराची जाने का फैसला किया, ताकि अपने परिचितों से मदद हासिल कर सके.

कराची में किसी ने उनका संपर्क एक एनजीओ से कराया, जिसने उनके गांव वालों की हरसंभव मदद की.

उन्होंने इस फाउंडेशन के महासचिव फ़ैयाज़ आलम से अपनी ज़मीनों को उपजाऊ बनाने के बारे में भी सलाह ली. डॉक्टर फ़ैयाज़ आलम कृषि में नए-नए प्रयोग करने में रुचि रखते हैं. उन्होंने तुरंत 'हाँ' कर दी और शहाब की 20 एकड़ ज़मीन को उपजाऊ बनाने का फ़ैसला किया.

लेकिन पानी कहां से आएगा? यही एकमात्र रुकावट थी. इसका समाधान भी जल्द ही निकल गया.

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बुज़ुर्गों ने कहा कि भूजल से न कोई फ़सल होगी और न ही कोई फलों के पेड़ लग सकेंगे. उनका मानना था कि ज़मीन का खारा पानी फ़सलों और पेड़ों के लिए हानिकारक होगा.

लेकिन शहाब इस परियोजना को लाभदायक और अमल में लाने के क़ाबिल समझ रहे थे, क्योंकि सीमा पार उनका परिवार ट्यूबवेल के पानी से ही खेती कर रहा था और लाखों रुपये कमा रहा था.

शहाब कहते हैं कि उन्होंने अल्लाह का नाम लेकर बोरिंग करने की इजाज़त दे दी. कुछ ही समय में उनकी ज़मीन पर 450 फीट गहरी बोरिंग की गई और 16 हज़ार गैलन की क्षमता वाला एक स्टोरेज टैंक बनाया गया.

और ज़मीन से पानी निकालने के लिए सोलर सिस्टम भी लगा दिया गया. जब इस पानी की जांच की गई तो इसका टीडीएस 2500 था. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यदि पानी का टीडीएस 1000 से अधिक है तो वह पीने के योग्य नहीं है.

लेकिन थार में लोग 3000 टीडीएस का पानी भी पीते हैं, क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है.

आख़िरकार, इसी पानी से फ़सलों की शुरुआत हुई और फिर अगला साल आया जब कपास, सरसों और गेहूं की फ़सलों की सफलता ने क्षेत्र के लोगों को हैरान कर दिया. शहाब के इस एग्रो फार्म को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आए.

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'नख़लिस्तान' बनाने का सपना कैसे पूरा हुआ?

शहाब बताते हैं कि वे इन फ़सलों की सफलता से बहुत खुश थे. लेकिन यह तो अभी पहला चरण था. अक्टूबर 2018 में, डॉक्टर फ़ैयाज़ आलम ने स्थानीय लोगों को और भी हैरान करने की ठानी और रेगिस्तानी भूमि को 'नख़लिस्तान' में बदलने का फ़ैसला किया.

इस संबंध में उमरकोट जिले के बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान से भी तकनीकी सहायता मांगी गई. संस्थान ने ख़जूर के पेड़ की ख़रीद में भी सहायता की.

इसका सहायक संस्थान, एरिड ज़ोन रिसर्च इंस्टीट्यूट, उमरकोट और थारपारकर में विभिन्न फलों और अन्य लुप्त हो रहे पेड़ों के पुनर्वास के लिए बहुत काम कर रही है.

संस्थान के निदेशक डॉक्टर मोहम्मद सिद्दीक़ डिपर के अनुसार, उनका संस्थान थार क्षेत्र में कृषि और बाग़वानी के क्षेत्र में ही अनुसंधान कर रहा है.

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जब रेगिस्तान में फल उगने का चमत्कार हुआ

डॉक्टर फ़ैयाज़ आलम ने कनाडा में स्थित पाकिस्तान के लोगों के एक संगठन के सहयोग से थारपारकर के कृषि फार्म पर पहला बग़ीचा और नख़लिस्तान बनाना शुरू किया.

इस्लामाबाद से 100 जैतून, खैरपुर से 125 असली नस्ल के ख़जूर और मीरपुर ख़ास से कंधारी अनार और बेर के 300 पौधे मंगाए गए.

शहाब हंसते हुए गांव वालों की टिप्पणियों को याद करते हैं. इस बार भी गांव वालों ने उनका मज़ाक़ उड़ाया और कहा कि ''थारपारकर में जैतून... यह एक पागल का सपना है."

"ख़जूर तो अंग्रेज़ भी नहीं लगा सके थे. तो मास्टर शहाब और उनके दोस्त कैसे सफल हो सकते हैं?"

शहाब कहते हैं कि ''मैं लोगों की बात सुनता और मुस्कुरा कर चुप हो जाता. केवल अल्लाह से सफलता की दुआ मांगता था.

शहाब ने न केवल ख़ुद इस ज़मीन पर मेहनत करना शुरू किया, बल्कि अपने छोटे भाई को भी शामिल कर लिया. वे दोनों सुबह-सवेरे ज़मीन पर आते, पेड़ों को पानी देते, खाद डालते और पेड़ों के बीच उगने वाले जंगली घास को निकालते.

वो दिन-रात कड़ी मेहनत कर रहे थे. और इस तरह उनकी कड़ी मेहनत और दृढ़ता ने रेगिस्तान में चमत्कार उगा दिया. सिर्फ़ एक साल बाद ही बेर के पेड़ पर बड़ी संख्या में फल आने लगे. अगले साल अनार के पेड़ों पर फल लगे. और इस साल 26 पेड़ों पर खजूर के फल लगे हैं.

डॉक्टर फ़ैयाज़ आलम कहते हैं, "रेगिस्तान में फलदार पेड़ लगाना निस्संदेह एक जोखिम था, लेकिन जब शहाब ने हमें बताया कि सीमा के दूसरी तरफ न केवल फसलें हो रही हैं, बल्कि ख़जूर के बाग भी लगाए जा रहे हैं, तो हमने अपनी ओर से भी इसकी जानकारी जुटाई. तब हमें अंदाज़ा हो गया कि थारपारकर में भी भूजल से खेती हो सकती है.

उन्होंने आगे कहा कि हम अन्य फलों जैसे बेरी, अनार, अमरूद आदि के साथ-साथ ख़जूर के पेड़ लगाने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं.

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'सरकारों ने अब तक प्रयास क्यों नहीं किए?

डॉक्टर फ़ैयाज़ आलम ने कहा कि थार के लोग सवाल करते हैं कि सिंध और संघीय सरकार ने आज तक थार रेगिस्तान में भूजल से खेती और बाग़वानी के लिए कोई काम क्यों नहीं किया.

हद तो यह है कि सिंध सरकार ड्रिप सिंचाई प्रणाली के लिए 60% सब्सिडी प्रदान करती है, लेकिन बड़ी संख्या में किसानों को इस योजना की जानकारी ही नहीं है.

20 हज़ार वर्ग किलोमीटर के विशाल रेगिस्तान क्षेत्र के एक दूर-दराज़ इलाक़े में मास्टर शहाबुद्दीन समेजू की मेहनत और लगन ने वास्तव में रेगिस्तान में गुल खिला दिए हैं.

शहाब कहते हैं कि "हमारे इस छोटे से प्रयास ने आर्थिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया है. रेगिस्तान में ख़जूर की खेती के सफल अनुभव ने यहां के लोगों के लिए उम्मीद के दीपक जला दिए हैं."

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