बालूः जिसके लिए लोग ख़ून बहाने को तैयार

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Sakib Ali/ Hindustan Times via Getty Images

    • Author, विंस बीज़र
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

इस साल सितंबर में दक्षिण अफ्रीका में एक कारोबारी को गोली मार दी गई. इस के एक महीने पहले भारत में दो लोगों की एक संघर्ष में हत्या हो गई.

मेक्सिको में पर्यावरण के लिए काम करने वाले एक शख़्स को मार डाला गया. हज़ारों मील दूर, अलग-अलग जगहों पर हुई इन सभी घटनाओं में एक बात सामान्य थी.

इन हत्याओ की वजह. ये उन तमाम घटनाओं में से हैं, जब 21वीं सदी की सबसे उपयोगी चीज़ के लिए हुए संघर्ष में ये लोग मारे गए.

ये ऐसी उपयोगी वस्तु है, जिसकी अहमियत दिनों-दिन बढ़ रही है, मगर अब भी उसकी अहमियत को लोग शायद उतनी गंभीरता से नहीं समझ रहे हैं, जितना समझना चाहिए.

इस का नाम है-बालू यानी रेत. भले ही आप को ये बात हंसी के लायक़ लगे, लेकिन आज के दौर में बालू हमारे लिए बहुत अहम हो चुका है.

आज हर शहर के निर्माण की ये बुनियादी वस्तु है. शॉपिंग मॉल्स, दफ़्तर, बड़ी-ऊंची इमारतें बनाने में जो कंक्रीट लगती है, वो बालू से ही बनती है.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Getty Images

बालू का अहम योगदान

इसके अलावा सड़कें बनाने में भी बालू का अहम योगदान है. जो अलकतरा सड़क बनाने में प्रयोग किया जाता है, असल में वो गिट्टी और बालू का जोड़ ही तो है.

हर खिड़की का कांच हो हर गाड़ी की विंडशील्ड हो या फिर स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन, ये सभी बालू से बनते हैं. इन्हें बालू को पिघला कर ढाला जाता है.

यहां तक कि हमारे फ़ोन और कंप्यूटर के सिलिकॉन चिप और कम-ओ-बेश हर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने में बालू का प्रयोग होता है.

ये जान कर आप के ज़हन में सवाल उठेगा कि इस में दिक़्क़त क्या है? हमारी धरती पर बेहिसाब बालू बिखरा पड़ा है.

सहारा और एरिज़ोना के विशाल मरुस्थल हों या थार का रेगिस्तान. बड़ी तादाद में बालू यहां मौजूद है.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Alamy

रेगिस्तान का बालू

हम थोड़े से पैसों से बालू आस-पास की दुकानों से भी, आसानी से ख़रीद लेते हैं. लेकिन, आप यक़ीन करें या नहीं, आज दुनिया में बालू की भारी क़िल्लत महसूस की जा रही है.

आप सोच सकते हैं कि जो बालू इतनी आसानी से उपलब्ध है, उसकी कमी भला कैसे हो सकती है?

आज पानी के अलावा बालू वो दूसरी क़ुदरती संसाधन है, जिसका इंसान सब से ज़्यादा उपभोग करता है. हर साल दुनिया भर में 50 अरब टन बालू का प्रयोग किया जा रहा है.

ये इतना बालू और गिट्टी है कि पूरे ब्रिटेन पर इसकी एक परत बिछाई जा सकती है. समस्या बालू की वो क़िस्म है, जिसका हम इस्तेमाल करते हैं.

रेगिस्तान का बालू हमारे किसी काम का नहीं है. हवा की वजह से उस बालू के कण इतने घिस गए हैं कि उनकी मदद से मज़बूत कंक्रीट नहीं बनाए जा सकते हैं.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Getty Images

बालू माफ़िया

जिस बालू की हमें ज़रूरत है, वो नदियों की तलहटी, किनारों और पाट में पाया जाता है. इसके अलावा ऐसा बालू समुद्र और झीलों के तट पर भी पाया जाता है.

आज इस बालू की इतनी ज़बरदस्त मांग है कि पूरी दुनिया में कम-ओ-बेश हर नदी का तट खंगाला जा रहा है. नदियों को खोदा जा रहा है.

समुद्र तटों की खुदाई कर के बालू निकाला जा रहा है.

आज हाल ये है कि भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में बालू माफ़िया ने इस बालू उत्खनन के धंधे पर अवैध क़ब्ज़ा कर लिया है.

नतीजा ये कि आए दिन संघर्ष हो रहा है और ख़ून-ओ-क़त्ल हो रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम से जुड़े रिसर्चर पैस्कल पेडुज़्ज़ी कहते हैं, "बहुत लोगों को बालू से जुड़े ये तथ्य चौंका सकते हैं. लेकिन, ऐसा होना नहीं चाहिए. हमारी धरती पर इतना बालू नहीं है कि हम हर साल 50 अरब टन निकाल भी लें और पर्यावरण व आम लोगों की ज़िंदगी पर असर भी न पड़े."

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Getty Images

शहरों में रहने वाली आबादी

रेत की बेतहाशा बढ़ती मांग के पीछे है तेज़ी से बढ़ रहा शहरीकरण. हर साल करोड़ों लोग गांवों से शहर की तरफ़ कूच कर रहे हैं.

ख़ास तौर से भारत जैसे विकासशील देश में. पूरे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका में शहर इतनी तेज़ी से विकसित हो रहे हैं, जो रफ़्तार अब से पहले कभी नहीं देखी गई.

1950 से लेकर अब तक शहरों में रहने वाली आबादी चार गुना बढ़ चुकी है. आज दुनिया भर के शहरों में 4.2 अरब लोग रह रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक़, अगले तीन दशकों में 2.5 अरब और लोग शहरों में आ कर रहने लगेंगे.

इसका मतलब ये होता है कि पूरी दुनिया में न्यूयॉर्क जैसे आठ शहर हर साल बढ़ रहे हैं.

अब इन सभी लोगों के रहने के लिए घर, आने-जाने के लिए सड़कें बनाने के लिए भारी तादाद में बालू की दरकार है.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Alamy

समुद्र तट का दायरा

भारत में साल 2000 के बाद से निर्माण कार्य में बालू का इस्तेमाल तीन गुना बढ़ चुका है.

चीन ने पिछले एक दशक में जितना बालू इस्तेमाल किया है, उतना तो अमरीका ने पूरी एक सदी में भी नहीं किया.

आज एक ख़ास तरह की रेत की इतनी सख़्त मांग है कि समुद्र किनारे बसा दुबई शहर ऑस्ट्रेलिया से बालू मंगाता है.

सोचिये, ऑस्ट्रेलिया के कारोबारी, अरबों को बालू बेच रहे हैं.

लेकिन, बालू केवल निर्माण कार्य में ही प्रयुक्त हो रही हो, ऐसा भी नहीं. आज बालू की मदद से नई ज़मीन भी तैयार हो रही है.

कैलिफ़ोर्निया से लेकर हॉन्ग कॉन्ग तक विशाल जहाज़ समुद्र से बालू निकालकर समुद्र तट का दायरा बढ़ा रहे हैं.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Getty Images

समंदर पर क़ब्ज़ा

इस के लिए समुद्र की तलहटी से करोड़ों टन बालू निकाली जा रही है. दुबई के पाम-ट्री आइलैंड दुनिया भर में बनावटी जज़ीरों के लिए सबसे ज़्यादा मशहूर हैं.

लेकिन, ऐसी कई मिसालें हैं, जब इंसान ने समंदर पर क़ब्ज़ा कर के रिहाइश बना ली है.

अफ्रीकी देश नाइजीरिया के सबसे बड़े शहर लागोस में हर साल क़रीब 2400 एकड़ या 9.7 वर्ग किलोमीटर ज़मीन अटलांटिक महासागर से छीनी जा रही है, ताकि बढ़ती आबादी को बसाया जा सके.

चीन ने सैकड़ों मील के नए समुद्र तट बना डाले हैं. यहां तक कि चीन ने एकदम नए-नए द्वीपों का निर्माण कर के उन पर लग्ज़री रिज़ॉर्ट बना डाले हैं.

ये नई ज़मीनें बेशक़ीमती है. लेकिन, इन्हें बसाने में बेहिसाब दौलत भी लगती है.

समुद्रों की खुदाई से केन्या, फ़ारस की खाड़ी और फ्लोरिडा में मूंगे की चट्टानों को भारी नुक़सान पहुंचा है. पानी गंदा होने से समुद्री जीव मर रहे हैं.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Getty Images

बालू के निर्यात पर पाबंदी

बालू की खुदाई का नतीजा ये हुआ है कि मलेशिया और कम्बोडिया में मछुआरों की रोज़ी छिन गई है.

चीन में समुद्र में नई ज़मीन तैयार करने की वजह से हज़ारों मील के दलदली समुद्री तट गुम हो गए हैं.

इन में आबाद परिंदे और मछलियां और दूसरे हज़ारों जीव विलुप्त हो चुके हैं. सिंगापुर की मिसाल तो और भी हैरान करने वाली है.

अपनी साठ लाख से ज़्यादा आबादी के लिए नई ज़मीन के लिए सिंगापुर ने पिछले 40 साल में क़रीब 50 वर्ग मील ज़मीन समुद्र से छीन ली है.

लेकिन, इसकी पर्यावरण को भयंकर क़ीमत चुकानी पड़ी है.

हाल ये है कि इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और कम्बोडिया जैसे पड़ोसी देशों ने सिंगापुर को बालू के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Getty Images

तबाही की वजह

नीदरलैंड के एक रिसर्च ग्रुप के मुताबिक़, 1985 से लेकर अब तक इंसानों ने 5237 वर्ग मील ज़मीन का विस्तार किया है. ये जमैका जैसे देश के बराबर का इलाक़ा है.

इस में से ज़्यादातर का निर्माण बालू की भारी तादाद के इस्तेमाल से हुआ है.

बालू को कंक्रीट और दूसरे औद्योगिक इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल किया जाना तो और भी तबाही का बायस बना है.

निर्माण कार्य के लिए बालू अक्सर नदियों से निकाला जाता है. नदियों से बालू निकालना आसान होता है. बाल्टी में भर कर निकाल कर नावों में लादिए और तट पर ले आइए.

लेकिन, नदी की तलहटी की खुदाई की वजह से पानी धुंधला हो जाता है. इससे मछलियों का दम घुटता है.

पानी के भीतर पलने वाली ज़िंदगी को सूरज की रौशनी नसीब नहीं होती. नदी से बालू खनन की वजह से वियतनाम में मीकांग नदी का डेल्टा घटता जा रहा है.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, NurPhoto via Getty Images

रेत का उत्खनन

ये डेल्टा क़रीब दो करोड़ लोगों को खाना उपलब्ध कराता है. इस डेल्टा में पैदा होने वाला धान दक्षिणी पूर्वी एशिया की बड़ी आबादी का पेट भरता है.

लेकिन, जलवायु परिवर्तन और समुद्र का तट बढ़ने से ये डेल्टा पहले ही सिकुड़ रहा था.

अब बेहिसाब बालू खनन की वजह से मीकांग डेल्टा रोज़ इतना घट रहा है कि रोज़ फुटबॉल के डेढ़ मैदानों के बराबर इलाक़ा यहां से ग़ायब हो रहा है.

सदियों से मीकांग नदी, चीन और उत्तरी एशिया के पहाड़ों से बालू को बहाकर ले डेल्टा में ले आती थी.

लेकिन, हाल के कुछ बरसों में जिन देशों से ये नदी गुज़रती है, वो सभी इस में से भारी मात्रा में रेत का उत्खनन कर रहे हैं.

2013 में हुए एक रिसर्च के मुताबिक़ केवल 2011 में ही मीकांग नदी से 5 करोड़ टन बालू निकाला गया था. इस बीच इस नदी पर पांच बड़े बांध बनाए गए हैं.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, Sepia Times/Universal Images Group via Getty Image

जल परिवहन के लिए

चीन, कम्बोडिया और लाओस में अगले कुछ बरसों में मीकांग नदी पर 12 बांध और बनाए जाने हैं.

बांध बनने से मीकांग डेल्टा की तरफ़ बालू के कणों का बहाव और भी कम होगा.

यानी, जिस तादाद में मीकांग से बालू निकाला जा रहा है, उसी मात्रा में क़ुदरती तौर पर बहकर बालू आ नहीं पा रहा है.

माना जा रहा है कि इस सदी के आखिर तक मीकांग का आधा डेल्टा साफ़ हो चुका होगा.

कम्बोडिया और लाओस मीकांग से होकर जल परिवहन के लिए इसकी खुदाई भी कर रहे हैं. इससे हालात और बिगड़ रहे हैं. नदी के तट टूट कर गिर रहे हैं.

बस्तियां बिखर रही हैं. खेत तबाह हो रहे हैं. यही हाल म्यांमार की इरावदी नदी का है.

बालू उत्खनन से हर साल अरबों डॉलर का बुनियादी ढांचा भी तबाह हो रहा है. बालू की वजह से पानी सप्लाई के पाइप अवरुद्ध हो रहे हैं.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, ADEK BERRY/AFP via Getty Images

बेशक़ीमती बालू

नदियों के तटों की बेतहाशा खुदाई से घाना में तो पहाड़ी इलाक़ों की इमारतों की बुनियादें हिल गई हैं. ताइवान में तो साल 2000 में एक पुल इसी वजह से ढह गया था.

इसी तरह पुर्तगाल में एक पुल बालू उत्खनन की वजह से अचानक ढह गया था. जिसकी वजह से वहां से गुज़र रही बस नदी में गिर गई और उस में सवार 70 लोग मारे गए थे.

कांच बनाने में प्रयुक्त होने वाली सिलिका बालू का इस्तेमाल सोलर पैनल और कंप्यूटर चिप बनाने में भी होता है. इसकी मांग भी बढ़ रही है.

अमेरिका में फ्रैकिंग से तेल निकालने के कारोबार में भी सिलिका सैंड की मांग बढ़ रही है.

नतीजा ये है कि अमरीका के विस्कॉन्सिन राज्य में खेती लायक़ ज़मीन और जंगल तबाह हो रहे हैं, ताकि ये बेशक़ीमती बालू निकाली जा सके.

बालू उत्खनन के धंधे में मुक़ाबला इतना कड़ा हो गया है कि अब इस में आपराधिक गैंग की सक्रियता बढ़ गई है.

जो हर साल करोड़ों टन बालू निकाल कर ब्लैक मार्केट में बेच रहे हैं.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, GOH CHAI HIN/AFP via Getty Images

अवैध रेत खनन

लैटिन अमरीका और अफ्रीका में बच्चों को भी इस धंधों में लगा कर उनका गुलामों की तरह शोषण किया जा रहा है.

ये रेत माफ़िया अधिकारियों को रिश्वत देकर बेरोक-टोक अपना अवैध कारोबार कर रहे हैं.

जो अधिकारी विरोध करते हैं या रिश्वत ले कर आंख मूंदने को राज़ी नहीं होते, उन्हें रास्ते से हटा दिया जाता है. उन्हें मार दिया जाता है.

मेक्सिको में योस लुई अल्वारेज़ फ्लोरेस नाम के पर्यावरण कार्यकर्ता ने जब अवैध रेत खनन का विरोध किया, तो उन्हें जून महीने में गोली मार दी गई.

इसके बाद उनके परिवार को धमकी भरी एक चिट्ठी भी भेजी गई.

इस घटना के दो महीने बाद राजस्थान में एक अधिकारी को उस वक़्त गोली मार दी गई, जब वो बालू से भरे ट्रैक्टर के काफ़िले को रोकने की कोशिश कर रहा था.

इसी साल एक बालू खनन मज़दूर को सात गोलियां मारी गईं, क्योंकि बालू का खनन करने वाले एक और गिरोह से उसका झगड़ा हो गया था.

बालू खनन को लेकर पिछले कुछ वर्षों में केन्या, गैम्बिया और इंडोनेशिया में भी हिंसक संघर्ष हुए हैं. इन में दर्जनों लोग मारे गए हैं.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, NARINDER NANU/AFP via Getty Images

बालू का विकल्प

बालू की वजह से 81 बरस के अध्यापक से लेकर 22 साल के कार्यकर्ता तक की हत्या की गई है.

एक पत्रकार को ज़िंदा जला दिया गया, तो तीन पुलिस अधिकारियों पर रेत से भरा ट्रक चढ़ाकर उन्हें मार दिया गया.

बालू के बेतहाशा उत्खनन से हो रहे नुक़सान को लेकर जागरूकता भी बढ़ रही है. कई वैज्ञानिक, बालू का विकल्प तलाशने में जुटे हैं.

जैसे कि कोयले से चलने वाले बिजलीघरों की राख. कटा-छंटा प्लास्टिक या ताड़ का छिलका और धान की भूसी.

इसी तरह, कई वैज्ञानिक ऐसा कंक्रीट विकसित करने में जुटे हैं, जिस में बालू का कम प्रयोग होता है. और कंक्रीट की रिसाइकिलिंग की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं.

बहुत से पश्चिमी देशों ने नदी से बालू निकालने का काम पूरी तरह से ख़त्म कर दिया है. हालांकि बाक़ी दुनिया के लिए ऐसा करना फिलहाल मुश्किल है.

इसके लिए निर्माण कार्य में लगे लोगों को बेहतर विकल्प देने होंगे.

ताकि जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से भी निपटा जा सके और बालू के लिए नदियों का बलात्कार होने से उन्हें बचाया जा सके.

सैंड माइनिंग

इमेज स्रोत, UMA SHANKAR MISHRA/AFP via Getty Images

निर्माण में नई सोच

इस के लिए शहरों और सड़कों के निर्माण में नई सोच लानी ज़रूरी है.

बहुत से वैज्ञानिक बालू खनन से होने वाले नुक़सान को रोकने के लिए विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र से दखल देने की मांग कर रहे हैं.

अमरीका की कोलोराडो यूनिवर्सिटी के मैट बैनडिक्सेन ऐसे ही एक वैज्ञानिक हैं.

वो कहते हैं कि, 'हमें निगरानी की ऐसी योजना बनानी चाहिए, ताकि बालू के खनन पर दुनिया भर में निगाह रखी जा सके.'

फिलहाल, किसी को भी ये नहीं पता कि दुनिया में कितना बालू नदियों से निकाला जा रहा है. ये काम किन हालात में हो रहा है. इसका कोई लेखा-जोखा ही नहीं है.

हमें बस पता है कि ये काम हो रहा है. जितने ज़्यादा लोग हैं, उतने ज़्यादा बालू की दरकार है. और उतना ही बालू नदियों से निकाला जा रहा है.

(बीबीसी फ़्यूचर पर मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी फ़्यूचर कोफ़ेसबुक, ट्विटर, औरइंस्टाग्राम पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)