भारत में अब ज़ीका वायरस का ख़तरा, जानिए- लक्षण और बचाव

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भारत के केरल में ज़ीका वायरस के 14 मामले सामने आने के बाद राज्य सरकार अलर्ट पर है.
केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने इसकी पुष्टि की है कि तिरुअनंतपुरम ज़िले में ज़ीका वायरस के मामले मिले हैं.
केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज ने बीबीसी हिंदी को बताया, "राज्य की पूरी स्वास्थ्य मशीनरी को अलर्ट कर दिया गया है. सभी ज़िलों के मेडिकल अफसरों को गर्भवती महिलाओं का ख़ास ख़्याल रखने के लिए कहा है. हम लगातार जांच कर रहे हैं. और हम पुणे स्थित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ वीरोलॉजी को सैंपल भेज रहे हैं. चिंता की कोई बात नहीं है. हममे राज्य भर में टेस्टिंग और निगरानी की सुविधा बढ़ा दी है."
भारत में पहली बार ज़ीका वायरस का मामला वर्ष 2016-17 में आया था, जब गुजरात में इसके मामले मिले थे.
वर्ष 1947 में यूगांडा के ज़ीका जंगल में रहने वाले बंदरों में सबसे पहले ये वायरस पाया गया था. लेकिन 1952 में इसे औपचारिक रूप से एक ख़ास वायरस माना गया.
हालाँकि शोधकर्ताओं ने ये पाया कि भारत में बड़ी संख्या में लोग इस वायरस के संपर्क में आए थे, क्योंकि जब इस नई बीमारी के लिए टेस्ट हुए, जो कुल 196 में से 33 लोगों में इसको लेकर इम्युनिटी पाई गई.
इन शोधकर्ताओं ने वर्ष 1953 में अपने दस्तावेज़ में ये निष्कर्ष निकाला कि ज़ीका वायरस भारत में लोगों को संक्रमित करता है.
हालाँकि ये वायरस ज़्यादातर मच्छरों से फैलता है, लेकिन ये यौन संबंधों से भी फैलता है.
इस वायरस के संक्रमण के कारण बच्चों में मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है. कई मामलों में कम विकसित मस्तिष्क वाले बच्चे पैदा होते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ ने वर्ष 2016 में ज़ीका वायरस के संक्रमण को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी कहा था.
ज़ीका वायरस से संक्रमण के लक्षण क्या हैं?
इस वायरस के संक्रमण से कम संख्या में ही मौतें होती हैं. पाँच संक्रमित लोगों में से एक में ही इसके लक्षण दिखते हैं.

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- हल्का बुख़ार
- आँखों का संक्रमण (लाल और आँखों में सूजन)
- सिरदर्द
- जोड़ों का दर्द
- शरीर पर लाल चकत्ते
इस संक्रमण के कारण एक ख़ास तरह का तंत्रिका तंत्र से संबंधित परेशानी हो सकती है, जिसे गिलैन बैरे सिंड्रोम भी कहते हैं. ये अस्थायी पक्षाघात का कारण बन सकता है.
अभी तक इस वायरस के लिए न कोई वैक्सीन आई है और न ही दवा उपलब्ध है. इसलिए मरीज़ों को आराम करने और ज़्यादा से ज़्यादा तरल पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है.
लेकिन सबसे ज़्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चों पर पड़ता है. ऐसी स्थिति में कम विकसित मस्तिष्क वाले बच्चे पैदा होते हैं. इसे माइक्रोसेफली कहा जाता है.
माइक्रोसेफली क्या होता है?

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जब बच्चे कम विकसित और असामान्य मस्तिष्क के साथ पैदा होते हैं, जो इसे माइक्रोसेफली कहा जाता है. इस स्थिति में मस्तिष्क ठीक से विकसित नहीं होता.
इसकी गंभीरता कम या ज़्यादा हो सकती है. लेकिन अगर मस्तिष्क इतना विकसित नहीं है कि वो जीवन के अहम कार्यों को नियंत्रित कर सके, तो ये काफ़ी घातक हो सकता है.
जो बच्चे इस संक्रमण से बच जाते हैं, उनमें भी कई बार मस्तिष्क सही से काम नहीं करता और उनका विकास ठीक से नहीं होता, इसमें देरी होती है.
ये रूबेला, गर्भावस्था के दौरान नशीले पदार्थों के सेवन या आनुवंशिक असामान्यताओं जैसे संक्रमणों के कारण भी हो सकता है.
डब्लूएचओ का कहना है कि इस पर वैज्ञानिक रूप से सहमति है कि ज़ीका के कारण माइक्रोसेफली के साथ-साथ गिलैन बैरे सिंड्रोम भी हो सकता है.
गर्भवास्था में कुछ बच्चों की मौत के बाद जाँच में उनके मस्तिष्क में वायरस मिला और ये वायरस यह प्लेसेंटा और माँ के पेट में मौजूद द्रव में पाया गया, जिसे एमनियोटिक द्रव कहा जाता है.
वायरस फैलने की स्थिति में कई सरकारें महिलाओं को प्रेग्नेंट नहीं होने की सलाह भी देते हैं.
विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि ज़ीका वायरस का संबंघ गर्भावस्था की कई जटिलताओं से भी हो सकता है, जिनमें गर्भपात, मृत बच्चे का पैदा होना, समय से पहले बच्चे का जन्म और आँखों की समस्याएँ शामिल हैं.
अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) का कहना है कि ज़ीका वायरस ख़ून में एक सप्ताह तक रहता है और ये यौन संबंध बनाने से भी फैलता है.
सीडीसी का ये भी कहना है कि अगर वायरस का संक्रमण ख़त्म होने के बाद गर्भधारण होता है, तो बच्चे को संक्रमण नहीं होगा.
वर्ष 2016 के दौरान डब्लूएचओ ने ज़ीका वायरस से प्रभावित क्षेत्र में रहने वालों और वहाँ से आने वाले जोड़ों को सुरक्षित सेक्स या आठ हफ़्ते सेक्स न करने की सलाह दी थी. अगर किसी पुरुष को ज़ीका संक्रमण हो जाता है तो उसे छह महीने के लिए सुरक्षित सेक्स या सेक्स न करने की सलाह दी जाती है.
ज़ीका वायरस कहाँ से आया?

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ज़ीका वायरस का पता सबसे पहले यूगांडा में 1947 में चला था. उस समय ये बंदरों में पाया गया था.
लोगों में इस वायरस के संक्रमण का पहला मामला 1954 में नाइजीरिया में मिला. इसके बाद अफ़्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और प्रशांत द्वीप क्षेत्रों में इसका संक्रमण देखा गया.
पहले ज़ीका के संक्रमण का स्तर काफ़ी कम था और इसे जीवन के लिए ख़तरा नहीं माना जाता था.
लेकिन मई 2015 में ब्राज़ील में ज़ीका वायरस के मामले सामने आए और इसके बाद ये तेज़ी से फैला.
ये कैसे फैलता है?

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ये एडीस मच्छरों से फैलता है. ये वही मच्छर हैं, जो डेंगू और चिकुनगुनिया फैलाते हैं.
कनाडा और चिली को छोड़कर ये पूरे अमेरिका महादेश में पाए जाते हैं, जहाँ ख़ूब ठंड पड़ती है और ये इनके लिए अनुकूल होता है. इसके अलावा एशिया में भी ये मच्छर पाए जाते हैं.
लेकिन मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों से अलग ये दिन में ज़्यादा सक्रिय रहते हैं, इसलिए रात को मच्छरदानी लगाने से कम ही फ़ायदा होता है.
अगर ये मच्छर संक्रमित व्यक्ति का ख़ून चूसते हैं तो वे कई अन्य लोगों को संक्रमित कर सकते हैं.
डब्लूएचओ का कहना है कि यौन संबंध से भी ये फैल सकता है.
कितने समय तक लोग संक्रमित रहते हैं?

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अभी तक जो सबूत मिले हैं, उसके आधार पर कहा जाता है कि मच्छरों से होने वाला संक्रमण एक सप्ताह तक रहता है.
लेकिन वीर्य में ये दो सप्ताह तक रह सकता है.
संक्रमण से प्रभावित कई देशों ने पहले भी संक्रमित लोगों से सुरक्षित सेक्स और एक महीने तक रक्तदान न करने की सलाह दी थी.
लोग क्या कर सकते हैं?

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फ़िलहाल इसका कोई इलाज उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसका एक ही विकल्प है कि आप मच्छरों से बचें.
स्वास्थ्य अधिकारी लोगों को सलाह देते हैं कि वे.....
इंसेक्ट रेपेलेंट्स का इस्तेमाल करें
लंबी बाजू के कपड़े पहनें
दरवाज़े और खिड़की बंद रखें
पानी जमा न होने दें, क्योंकि मच्छर उसमें पनपते हैं
अमेरिकी सीडीसी ने गर्भवती महिलाओं को सलाह दी है कि वे प्रभावित इलाक़ों में न जाएँ
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