कोरोना का एक सालः भारत ने कैसे लड़ी कोविड महामारी के ख़िलाफ़ जंग

कोरोना वायरस

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    • Author, प्रवीण शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत में कोविड-19 का पहला मामला पिछले साल 30 जनवरी को सामने आया था. उस वक्त चीन के वुहान से केरल की एक मेडिकल छात्रा वापस अपने घर लौटकर आई थी और उसमें कोविड-19 की पुष्टि हुई थी.

इससे पहले 2019 के आखिर में चीन ने अपने शहर वुहान में कोरोना वायरस के फैलने की जानकारी दी थी.

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जनवरी से ही शुरू हुई सतर्कता

कोरोना वायरस के फैलने की खबरें आने के साथ ही भारत शुरुआत में ही यानी जनवरी मध्य से ही इसे लेकर सतर्क हो गया था. इसके बाद सरकार ने तुरंत ही ट्रैवल एडवाइज़री जारी करना और पाबंदियां लगाना शुरू कर दिया.

हेल्थकेयर रेस्पॉन्स के लिहाज़ से पहला कदम यह उठाया गया कि विदेश से आने वाले लोगों को क्वारंटीन किया जाए.

हालांकि, पूरे देश को इस महामारी से बचाने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियों की ज़रूरत थी.

इसमें संक्रमितों की पहचान के लिए टेस्टिंग करना, संक्रमित पाए जाने वाले लोगों के इलाज या उन्हें आइसोलेशन में रखने से संबंधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स (एसओपी) तैयार करने, राज्यों और केंद्र की स्वास्थ्य मशीनरी और प्रशासन के बीच तालमेल बैठाने के साथ ही बड़े पैमाने पर नर्सों, डॉक्टरों और दूसरे हेल्थकेयर स्टाफ की ट्रेनिंग शामिल थी.

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केंद्र सरकार ने लॉकडाउन का टेस्ट रन करने के लिए 22 मार्च को सुबह 7 बजे से लेकर रात 9 बजे तक के लिए जनता कर्फ्यू लगा दिया. उस वक्त भारत में कोविड-19 के महज़ 500 मामले आए थे और 10 से भी कम मौतें हुई थीं.

इसके बाद 25 मार्च से शुरू हुआ लॉकडाउन एक के बाद एक चार चरणों के ज़रिए 31 मई तक के लिए पूरे देश में लागू रहा.

डॉ. एनके अरोड़ा इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के बनाए गए नेशनल टास्क फोर्स के ऑपरेशंस रिसर्च ग्रुप के हेड हैं. वे कोविड-19 के खिलाफ इस लड़ाई से बेहद नज़दीकी से जुड़े रहे हैं.

डॉ. अरोड़ा बताते हैं कि जनवरी में ही सरकार ने इससे निबटने के लिए उपाय करने शुरू कर दिए थे और एयरपोर्ट्स पर स्क्रीनिंग की जाने लगी थी. सार्स और मार्स के वक्त के अनुभव इसमें काम आए.

जून से देश में अनलॉक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से शुरू हुई और 27 जनवरी को जारी गृह मंत्रालय की हालिया गाइडलाइंस में तकरीबन सभी पाबंदियां हटा ली गई. उम्रदराज़, बीमारियों का सामना कर रहे लोगों को भी घर ज़रूरी काम होने पर ही बाहर आने-जाने की सलाह भी हटा ली गई.

पिछले एक साल में भारत में कोविड-19 से निबटने के लिए तैयारियों और नीतिगत फैसलों के मामले में हर राज्य का अलग-अलग रेस्पॉन्स रहा है.

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कमज़ोर हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर की मुश्किल

फरवरी के अंत तक इस बीमारी के बारे में ज़्यादा जानकारी सामने आने लगी. इसी के साथ तैयारियां शुरू की जाने लगीं.

मार्च आते-आते सरकार को ये लगने लगा था कि अगर अगले कुछ हफ्तों के लिए देश में लॉकडाउन नहीं किया गया तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे.

डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि सबको पता है कि हमारा हेल्थ सिस्टम उतना अच्छा नहीं है. दूसरी ओर, निजी अस्पतालों में करीब 70 फीसदी मरीज़ों को हैंडल किया जाता है और बकाया 30 फीसदी लोग ही सरकारी अस्पतालों में इलाज कराते हैं.

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इस तथ्य को गंभीरता से लिया गया और लॉकडाउन लगाने से करीब 10 दिन पहले प्रधानमंत्री दफ्तर (पीएमओ) के गाइडेंस में 4-5 कमेटियां और ग्रुप बनाए गए.

भारत के सामने एक बड़ी चिंता यह भी थी कि मरीज़ों की भारी तादाद को कैसे मैनेज किया जाएगा. देश में हेल्थकेयर इंफ्रास्टक्चर कमज़ोर था.

डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि इससे निबटने के लिए दो-तीन कदम उठाए गए. कुछ हॉस्पिटलों को डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटलों में तब्दील कर दिया गया.

दूसरा, कुछ मेडिकल कॉलेज जो अच्छे नहीं चल रहे थे उन्हें सरकार ने टेकओवर कर लिया और वहां पर कोविड के मरीज़ों का इलाज किया जाने लगा.

इसके अलावा, दिल्ली में बेहद कम वक्त में 10,000 बेड का अस्पताल तैयार कर लिया गया.

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उस वक्त तक ये समझ आ गया था कि हर मरीज़ को वेंटिलेटर की ज़रूरत नहीं होती है.

डॉ. अरोड़ा एक उदाहरण देते हैं कि बरेली के एक मानसिक अस्पताल में एक खाली पड़ी जगह को दो हफ्ते में 500 बेड्स का कोविड हॉस्पिटल बना दिया गया. वे कहते हैं कि इतने युद्ध स्तर पर काम किया गया.

इसके अलावा, होटलों को भी हॉस्पिटल में तब्दील किया गया.

डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि दूसरी ओर, ये भी साफ हो गया था कि हर मरीज़ को देखने के लिए डॉक्टर की ज़रूरत नहीं है, ऐसे में पैरामेडिकल स्टाफ को ट्रेनिंग देकर तैयार किया गया.

दवाइयों को लेकर बड़ा विवाद रहा कि कौन सी दवाई कोविड-19 महामारी के इलाज पर कारगर है. हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन और डेक्सामेथासोन या रेमडेसिवियर जैसी दवाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बहस चलती रही.

बाद में यह साफ हो गया कि कोविड के मरीज़ को चाहे घर पर रखें या अस्पताल में, इसमें कुछ मुख्य चीज़ें ही अहम हैं जैसे कि मरीज़ को सांस लेने में कोई दिक्कत तो नहीं है, उसकी ऑक्सीजन का स्तर और पल्स रेट.

10 लाख आशा वर्कर्स और 1.5 लाख एएनएम के ज़रिए हर तबके तक इन जानकारियों को पहुंचा दिया गया.

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पीपीई किट्स, वेंटिलेटर्स, टेस्टिंग किट्स पर ज़ोर

मार्च में चीन में संक्रमण के ज़्यादा मामले सामने आने के बाद भारत में वेंटिलेटर्स और आईसीयू बेड्स की कम संख्या को लेकर चिंता पैदा होने लगी थी.

डॉ. अरोड़ा बताते हैं कि उस वक्त तक ये भी नहीं पता था कि देश में वेंटिलेटरों की कितनी संख्या है. तब आईसीयू और वेंटिलेटर्स की गिनती शुरू की गई.

इसमें पता चला कि देश में करीब 17,000 वेंटिलेटर हैं. साथ ही निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च भी लाखों रुपये में बैठ रहा था. ऐसे में सरकार को इस गंभीर हालात का अंदाज़ा हो रहा था.

दूसरी ओर, कम टेस्टिंग दर हमेशा से एक बड़ी दिक्कत बनी रही. जब कर्फ्यू और लॉकडाउन लागू किया गया था उस वक्त तक पूरे देश में केवल 6,500 सैंपल्स की ही टेस्टिंग हुई थी. मार्च के मध्य तक रोज़ाना होने वाले टेस्ट्स की संख्या महज़ 1,400 ही थी.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन की वाइस प्रेसिडेंट डॉ. प्रीति कुमार बताती हैं कि जून तक पीपीई किट और दूसरी तैयारियां हो गईं. सबसे अच्छी बात ये थी कि हमने अपनी टेस्टिंग किट्स बनाईं और उन्हें एप्रूव किया. इस दौरान अलग-अलग संस्थाओं में कोऑर्डिनेशन भी अच्छा रहा. आईसीएमआर और डीसीजीआई जैसी संस्थाओं ने तेज़ी से टेस्टिंग किट्स को मंज़ूरी दी. इससे टेस्टिंग का दायरा बढ़ाने में मदद मिली.

उस वक्त डायग्नोसिस करने को लेकर दिक्कतें थीं. पीपीई किट्स और मास्क सब उस वक्त चीन से आ रहे थे. उस वक्त एक पीपीई किट 5,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये की पड़ रही थी. एन95 मास्क का दाम करीब 250-500 रुपये बैठता था. सैनिटाइज़र्स के दाम भी बेहद ज़्यादा थे.

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साथ ही शुरुआत में देश में केवल एक लैब थी, फिर 11 टेस्टिंग लैब्स हुईं और आज ये संख्या 2,000 से ज़्यादा है. टेस्टिंग पर काफी निवेश हुआ है.

डॉ. कुमार कहती हैं कि भारत में फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री काफी मज़बूत है और जैसे ही वायरस के जीनोम का पता चला, वैसे ही वैक्सीन बनाने का काम शुरू हो गया.

इसके साथ ही सरकार ने वेंटिलेटर्स, पीपीई किट्स और मास्क जैसी ज़रूरी चीजों और उपकरणों को बनाने पर ज़ोर दिया.

डॉ. अरोड़ा कहते हैं, "शुरुआत में हम पूरी तरह से वेंटिलेटर्स का आयात करते थे, लेकिन अक्तूबर-नवंबर तक हमारे अस्पतालों में 1 लाख वेंटिलेटर थे. आज भारत वेंटिलेटर्स का नेट एक्सपोर्टर है."

साथ ही जून तक भारत में टेस्टिंग किट्स के रीएजेंट्स भारत में ही बनने लगे थे. लैब्स भी देश के हर ज़िले में मौजूद हैं.

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कैसे तेज़ी से बढ़े मामले

देश में 30 जनवरी को पहला मामला सामने आने के 44 दिन बाद यानी 14 मार्च को संक्रमितों की संख्या 100 के पार पहुंच गई थी.

इसके बाद संक्रमितों का आंकड़ा 1,000 के पार 28 मार्च को पहुंच गया और 100 से 1,000 तक पहुंचने में केवल 14 दिन लगे.

18 मई को देश में संक्रमितों की तादाद 1 लाख को पार कर गई थी. तकरीबन साढ़े तीन महीने में 1 से 1 लाख संक्रमितों पर देश पहुंच गया था.

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इसके बाद अहम पड़ाव 16 जुलाई को आया जब देश में संक्रमितों की तादाद 10 लाख को पार कर गई थी.

28 जनवरी तक देश में कोरोना संक्रमितों की तादाद 1.07 करोड़ के पार पहुंच चुकी है और इससे मरने वालों का आंकड़ा भी 1,53,847 हो चुका है.

पिछले साल मई में कुल एक्टिव केसों के 80 फीसदी केवल पांच राज्यों- महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, गुजरात और मध्य प्रदेश में थे. इसमें भी 60 फीसदी से ज़्यादा केस पांच शहरों में ही थे जिनमें मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद शामिल हैं.

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राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन की वाइस प्रेसिडेंट डॉ. प्रीति कुमार कहती हैं कि ऐसी किसी भी महामारी या दूसरी आपात परिस्थितियों में किसी भी देश के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका अहम हो जाती है.

कोरोना वायरस महामारी से निबटने में भी देशों का जैसा प्रदर्शन रहा है उसकी बड़ी वजह वहां का नेतृत्व रहा है.

डॉ. प्रीति कुमार कहती हैं भारत में एक स्पष्ट रणनीति और नीति रही है और आज हम इस वजह से बेहतर स्थिति में हैं.

चूंकि, इस महामारी के बारे में बहुत कम जानकारी थी, ऐसे में लोगों के पास साफ संदेश जाना चाहिए.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. जेए जयलाल ने कहा, "हालांकि, कोविड-19 का एक साल का सफर काफी मुश्किलभरा रहा है, लेकिन हमें संतुष्टि है कि भारत आज एक अच्छी स्थिति में है. हम कोविड-19 के ग्राफ को नीचे लाने में सफल रहे हैं. यह सब अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर और मेडिकल स्टाफ की मेहनत के बगैर मुमकिन नहीं था. साथ ही सरकार की कुशलता से भी इस महामारी से निबटने में मदद मिली है."

डॉ. कुमार कहती हैं कि लॉकडाउन को लेकर अलग-अलग राय हो सकती हैं, लेकिन ये ज़रूरी था क्योंकि इस महामारी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी और हम इसे लेकर बिलकुल तैयार नहीं थे. ऐसे में हमें रिसर्च, पीपीई किट्स, हॉस्पिटल्स में क्वारंटीन जैसी तैयारियों का वक्त चाहिए था और लॉकडाउन से इसमें मदद मिली.

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सितंबर में फिर से आई तेज़ी

जून तक सब ठीक लगा, लेकिन अगस्त में आते-आते मामलों में फिर से तेज़ी आने लगी. सितंबर में हम तकरीबन हर दिन 90,000 केस पर पहुंच गए थे और लग रहा था कि इसे कंट्रोल करना मुश्किल हो जाएगा.

डॉ. कुमार कहती हैं कि लेकिन, आज केसों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है. हम कंफर्टेबल पोज़िशन में हैं, वैक्सीन लगाई जाने लगी. नए केस और मृत्यु दर दोनों बेहद नीचे आ गए हैं.

डॉ. प्रीति कुमार कहती हैं, "लेकिन, ये एक साइकल है, ऐसे में हमें अलर्ट रहना चाहिए क्योंकि ये फिर से वापसी कर सकता है."

वे कहती हैं कि ऐसा लग रहा है कि 50-60 फीसदी लोगों में एंटीबॉडी विकसित हो चुकी हैं. इसका मतलब है कि शायद हमारे यहां कम्युनिटी में एक इम्युनिटी फैल गई है.

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भारत में ज़्यादा मौतों की चेतावनी

डॉ. कुमार कहती हैं कि महामारी तीन चीज़ों से बनती है. पहला, वायरस, दूसरा इंसान और तीसरा वातावरण. ये इनका एक मेल है. ऐसे में तापमान बदलने, बारिश जैसे मौसम बदलने, इंसानों के व्यवहार और वायरस के म्यूटेशन इन तीनों में संतुलन ज़रूरी है. इनमें से कुछ भी बिगड़ने पर हालात बिगड़ते हैं.

ताइवान, सिंगापुर, जापान और कोरिया इन्हें पहले ही सार्स का अनुभव था. ऐसे में वहां लोगों ने जल्द ही मास्क पहनने और दूसरी हिदायतों का पालन किया. दूसरी ओर, यूरोप और यूएस में इन नियमों का पालन नहीं किया गया.

डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि कई एक्सपर्ट्स के ये कहने के बावजूद कि भारत में कोविड से बड़े पैमाने पर मौतें होंगी, देश इतने बुरे हालात में जाने से इस वजह से बच पाया क्योंकि यहां कम्युनिटी एंगेजमेंट मज़बूत था.

2005 में जब एचआईवी फैल रहा था. तब भी कहा गया था कि भारत में सबसे ज़्यादा केस होंगे और 2.5 करोड़ लोग इससे संक्रमित होंगे. लेकिन, जब आंकड़े आए तो ये 25 लाख था. भारत की बड़ी आबादी, कमज़ोर हेल्थ सिस्टम, कम पढ़े-लिखे लोग और नियमों को लेकर लापरवाही जैसी चीज़ों के आधार पर ये अनुमान लगाए जाते हैं.

हालांकि, डॉ प्रीति कुमार कहती हैं कि कुछ फैक्टर्स हमारे पक्ष में जाते हैं. हमारे यहां युवा आबादी है. दूसरा, जब लॉकडाउन हुआ तभी शायद मई-जून में ही हमारे यहां संक्रमण काफी फैल चुका था और उनमें इम्युनिटी आनी शुरू हो गई थी. इसके अलावा, हमारे यहां प्रशासनिक कामकाज अच्छी तरीके से हुआ, राजनीतिक नेतृत्व ने सक्रियता से काम किया और इससे वायरस पर नियंत्रण पाने में मदद मिली.

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अलग-अलग मॉडल्स को लेकर चलती रही जंग

इस दौरान अलग-अलग राज्यों और ज़िलों में कोरोना महामारी को रोकने के लिए किए गए उपायों और उनकी सफलता को लेकर दावे होते रहे. कभी लगा कि केरल का मॉडल सबसे अच्छा है, कभी राजस्थान का कोई ज़िला अपने मॉडल की वजह से मशहूर हुआ और कभी यूपी सुर्खियों में आया. इसे लेकर राजनीतिक खींचतान भी खूब रही. कंटेनमेंट जोन्स और लोगों को होने वाली असुविधाओं को लेकर अलग-अलग सरकारों पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगे.

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डॉक्टरों और हेल्थकेयर स्टाफ की जंग

भारत की कोविड-19 से जंग में हेल्थकेयर से जुड़े लोगों का संघर्ष बेमिसाल रहा है. इस जंग में बड़ी संख्या में हेल्थकेयर वर्कर्स और डॉक्टरों को अपनी जान गंवानी पड़ी है.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. जे.ए जयलाल के मुताबिक, अब तक देशभर के 736 डॉक्टर कोविड-19 महामारी से मरीज़ों का इलाज करते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं.

इसके अलावा, बड़े पैमाने पर दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों ने भी कोविड-19 से अपनी जान गंवाई है.

हालांकि, सितंबर में केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि कोविड-19 की ड्यूटी के दौरान संक्रमित होने वाले या जान गंवाने वाले हेल्थकेयर वर्कर्स का आंकड़ा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पास नहीं है.

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने बताया था कि हालांकि, हेल्थ वर्कर्स के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण इंश्योरेंस पैकेज के तहत राहत मांगने वालों का आंकड़ा सरकार के पास मौजूद है. इस स्कीम के ब्योरे के मुताबिक, 11 सितंबर तक देश में कुल 155 हेल्थकेयर स्टाफ, जिनमें 64 डॉक्टर भी शामिल हैं, की मृत्यु कोविड-19 की वजह से हुई है.

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कम्युनिटी एंगेजमेंट का फायदा

लॉकडाउन लगाते वक्त यह सोच थी कि बिना कम्युनिटी एंगेजमेंट के इस बीमारी से निबटना नामुमकिन होगा. इसके लिए लोगों तक जानकारी पहुंचाने और उन्हें जागरूक बनाने की कोशिशें तेज रफ्तार से शुरू की गईं.

शुरुआती दौर में भारत में भले ही वेंटिलेटर्स, मास्क, स्वास्थ इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी थी, लेकिन, लोगों ने इस बीमारी से बचने के लिए बताए गए तरीकों को गंभीरता से लिया.

सामाजिक रूप से देखा जाए तो इस दौरान लोगों ने ज़िम्मेदारी से काम किया. तमाम लोगों ने अपनी शादियां रद्द कर दीं या चंद लोगों की मौजूदगी में इन रस्मों को पूरा किया.

पार्टियां, सिनेमा हॉल्स, जैसी सामाजिक मेलजोल की गतिविधियां बंद हो गईं. यहां तक कि किसी की मृत्यु होने पर निभाए जाने वाले रीति-रिवाज तक को लोगों ने बेहद सीमित कर लिया.

लोगों ने मास्क पहनने, सामाजिक दूरी का पालन करने, साफ-सफाई और हाथ धोने जैसी हिदायतों का पालन किया और इससे भी बीमारी से लड़ने में मदद मिली.

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वैक्सीनेशन

डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि वैक्सीन के लिए मार्च में ही तय कर लिया गया था कि इस पर फोकस रखना है.

12-13 वैक्सीन्स को उसी वक्त सपोर्ट किया गया. डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि लोगों से वैक्सीन के लिए एप्लिकेशंस मंगाई गईं. 31 मार्च इसकी आखिरी तारीख थी.

डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि वैक्सीन से संबंधित रिसर्च की पहली मीटिंग 1 अप्रैल को थी और जून तक 400-500 करोड़ के करीब के प्रोजेक्ट्स अवॉर्ड कर दिए गए थे.

वे कहते हैं कि इसी का नतीजा है कि आज भारत दूसरे देशों को वैक्सीन एक्सपोर्ट कर रहा है.

डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि वैक्सीनेशन के लिए कोविन प्लेटफॉर्म की तैयारियां भी काफी पहले से यानी जून-जुलाई से शुरू कर दी गई थीं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, गुरुवार 28 जनवरी को शाम तक 28 लाख से ज़्यादा फ्रंटलाइन वर्कर्स जिनमें स्वास्थ्य कर्मचारी भी शामिल हैं, उन्हें वैक्सीन लगाई जा चुकी थी.

डॉ. जयलाल कहते हैं कि अब वैक्सीनेशन का काम शुरू हो गया है, और हालांकि यह एक बड़ा काम है, लेकिन हम इसे भी बढ़िया तरीके से करने में सफल रहेंगे.

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