कोविड 19: उन पांच अहम दिनों की कहानी जिनमें फैला कोरोना संक्रमण

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    • Author, जेन मैकम्यूलेन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

एक साल पहले चीन की सरकार ने वुहान में लॉकडाउन लागू कर दिया था. कई सप्ताह तक अधिकारी दावा करते रहे कि कोरोना वायरस संक्रमण नियंत्रण में है, तब तक वहां मांस के एक बाज़ार के इलाके में कुछ दर्जन मामले थे. लेकिन वास्तविकता ये थी कि कोरोना संक्रमण पूरे शहर में फैलते हुए देश भर में पसर चुका था. यह स्टोरी उन पांच अहम दिनों की है जब कोरोना संक्रमण वुहान में तेज़ी से फैला था.

30 दिसंबर तक वुहान के अस्पतालों में कई लोगों को तेज़ बुख़ार और न्यूमोनिया की शिकायत के बाद कई लोग भर्ती हो चुके थे. इनमें पहला मामला, एक दिसंबर को बीमार पड़े 70 साल से अधिक उम्र के बुज़ुर्ग का था. इनमें से अधिकांश लोग हुनान सी फूड मार्केट से जुड़े हुए थे.

डॉक्टरों ने आशंका जताई कि यह रेगुलर न्यूमोनिया के मामले नहीं हैं. प्रभावित लोगों के फेफड़ों के नमूनों को जेनेटिक सीक्वेंसिंग करने वाली कंपनियों को भेजा गया ताकि बीमारी की वजह का पता चले.

शुरुआती नतीजों में ही इसके सार्स से मिलते जुलते नोवल कोरोना वायरस होने के संकेत मिल गए. स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों और देश के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) को इसके बारे में बताया गया लेकिन आम लोगों को कोई जानकारी नहीं दी गई.

बॉस्टन के नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के एमओबीएस लैब के मॉडल के मुताबिक तब तक कोई नहीं जानता था कि तब तक संक्रमितों की संख्या 2300 से 4000 तक पहुंच चुकी होगी. इतना ही नहीं संक्रमितों की संख्या हर कुछ दिनों में दोगुनी हो रही थी. महामारी वाले रोगों के विशेषज्ञों के मुताबिक महामारी फैलने के शुरुआती दौर में हर दिन या कहें हर घंटा बेहद अहम होता है.

30 दिसंबर 2019: वायरस का अलर्ट

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30 दिसंबर को शाम चार बजे, वुहान सेंट्रल अस्पताल के अपातकालीन विभाग के प्रमुख को बीजिंग के कैपिटल बायो मेडिकल्स लैब में हुए सीक्वेंसिंग के नतीजे मिले. चीन की सरकारी मीडिया को बाद में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि नतीजे देखते हुए उन्हें पसीना आ गया था.

नतीजों के सबसे ऊपर चेतावनी भरे शब्दों में लिखा था- सार्स कोरोना वायरस. उन्होंने इस पर लाल रंग का घेरा बनवाया.

इसके बाद उन्होंने इसे चीन की मैसेजिंग ऐप वीचैट पर अपने सहकर्मियों को यह रिपोर्ट भेजी. करीब डेढ़ घंटे के अंदर लाल रंग के बने घेरे वाली यह रिपोर्ट अस्पताल के नेत्ररोग विभाग के डॉक्टर ली वेनलियांग के पास पहुंची. उन्होंने इसे अपनी यूनिवर्सिटी के सैकड़ों छात्रों के समूह को चेतावनी देते हुए भेजा, "इस ग्रुप के बाहर इस मैसेज को नहीं भेजें. अपने परिवार और घर वालों के लिए एहतियात बरतें."

दक्षिणी चीन में 2002 और 2003 के बीच सार्स का प्रकोप फैला था, तब भी बीजिंग प्रशासन ने कहा था कि सबकुछ नियंत्रण में है. इसके चलते ही वह वायरस दुनिया भर में फैल गया था. बीजिंग प्रशासन ने जिस तरह से सार्स प्रकोप को संभाला था, उसकी दुनिया भर में आलोचना हुई.

चीन का उस वक्त ध्यान चीन के अंदर लोगों के गुस्से और विरोध प्रदर्शन पर ही टिका था. 2002 से 2004 के दौरान सीवियर एक्यूट रिस्पेरिटरी सिंड्रोम (सार्स) से दुनिया भर में 8000 लोग संक्रमित हुए थे और इनमें 800 लोगों की मौत हुई थी.

ली के ग्रुप में मैसेज शेयर करने के कुछ ही घंटों के बाद, ली के मैसेज के स्क्रीनशाट्स ऑनलाइन शेयर किए जाने लगे. चीन में लाखों लोग ऑनलाइन सार्स के बारे में बात करने लगे. लेकिन बाद में पता चला की सीक्वेंसिंग करने वाले से ग़लती हुई. यह सार्स ना होकर उससे मिलता जुलता नया कोराना वायरस था. लेकिन यह नाज़ुक दौर था और इसके फैलने की ख़बर पर ध्यान नहीं दिया गया.

वुहान के स्वास्थ्य आयोग को शहर के अस्पतालों की स्थिति के बारे में पता था. उस दिन वहां बीजिंग स्थित राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग के अधिकारी पहुंचे. वुहान और बीजिंग के कम से कम पांच सरकारी लैब में फेफड़ों के सैंपल भेजे गए ताकि वहां सैंपलों की सीक्वेंसिंग हो सके.

वहीं दूसरी ओर चीन के सोशल मीडिया में सार्स वायरस के प्रकोप की बात फैल गई थी. तब वुहान के स्वास्थ्य आयोग ने अस्पतालों को दो आदेश भेजे. इसके तहत सभी मामलों को सीधे स्वास्थ्य आयोग के पास भेजने का निर्देश दिया गया, इसके अलावा बिना अनुमति के कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं किए जाने का आदेश दिया गया. महज़ 12 मिनट के अंदर ये रिपोर्ट लीक होकर ऑनलाइन पहुंच गई थी.

अगर वरिष्ठ महामारी रोग विशेषज्ञ मारजोरि पोलाक नहीं होतीं तो दुनिया को इस महामारी के बारे में चीन के लोगों की अपनी भाषा वाली ऑनलाइन से पता चलने में कुछ दिन और लगते. दुनिया भर में बीमारियों के प्रकोप के तौर पर फैलने के बारे में अलर्ट भेजने वाली संस्था प्रोमेड- मेल की डिप्टी एडिटर मारजोरि पोलाक को ताइवान में मौजूद अपने संपर्क से एक मेल मिला कि क्या वे ऑनलाइन पर हो रही चर्चा के बारे में कुछ जानती हैं?

फरवरी, 2003 में प्रोमेड ने ही सबसे पहले चीन में सार्स के प्रकोप की ख़बर ब्रेक की थी. पोलाक के लिए वे पल एक बार लौट आए थे. उन्होंने बीबीसी को बताया, "मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि हम लोग मुश्किल में हैं."

तीन घंटे के अंदर, उन्होंने एक आपातकालीन पोस्ट लिखा जिसमें उन्होंने इस बीमारी के बारे में और भी जानकारी मांगी. मध्यरात्रि के करीब महज़ एक मिनट में उनकी ये पोस्ट प्रोमेड के करीब 80 हज़ार सब्सक्राइबरों को भेजी गई.

31 दिसंबर 2019: मदद की पेशकश

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धीरे-धीरे ये ख़बर फैलने लगी थी तब चीन के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) के महानिदेशक प्रोफेसर जॉर्ज एफ गाओ को दुनिया भर के संपर्कों से मदद की पेशकश आने लगी.

चीन ने सार्स के बाद अपने यहां संक्रामक बीमारियों के लिए आधारभूत व्यवस्थाओं को नए सिरे से तैयार किया था. 2019 में गाओ ने वादा किया था कि ऑनलाइन निगरानी की विस्तृत व्यवस्था के चलते ऐसी कोई बीमारी दोबारा नहीं फैलेगी. गाओ से संपर्क से साधने वाले दो वैज्ञानिकों ने बताया कि सीडीसी प्रमुख इससे चिंतित नहीं दिखे थे.

न्यूयार्क स्थित संक्रामक बीमारियों पर रिसर्च करने वाले समूह इकोहेल्थ एलायंस के प्रेसीडेंट डॉ. पीटर डास्ज़ैक ने बीबीसी को बताया, "मैंने जार्ज गाओ को लंबा मेला भेजा. मैंने अनुरोध किया कि आप लोगों की किसी भी तरह की मदद के लिए मैं अपनी टीम भेजता हूं." पीटर डास्ज़ैक के मुताबिक उन्हें इसके जवाब में एक छोटा सा संदेश मिला जिसमें हैप्पी न्यू ईयर लिखा हुआ था.

न्यूयार्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी की महामारी रोग विशेषज्ञ इयान लिपकिन ने भी गाओ से संपर्क साधा. वे जब रात का डिनर ले रहे थे तब उन्हें गाओ का जवाबी कॉल आया. लिपकिन ने उस बातचीत के बारे में बीबीसी को बताया, जिससे चीनी अधिकारियों के दिमाग़ में उस वक्त क्या चल रहा था, का पता चलता है.

उन्होंने बताया, "उन लोगों ने वायरस की पहचान कर ली थी. यह नया कोरोना वायरस था. उन लोगों के मुताबिक वह बहुत ज़्यादा संक्रामक नहीं था. लेकिन ये बात मुझे पची नहीं क्योंकि तब तक मुझे कई लोगों के संक्रमित होने की जानकारी मिल गई थी. मुझे नहीं लगता है गाओ ने मुझे सही जानकारी नहीं दी, बल्कि मुझे लगता है कि उनलोगों का आकलन ग़लत था."

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लिपकिन के मुताबिक गाओ को सैंपलों के सीक्वेंस जल्दी से जल्दी जारी करने चाहिए थे. उन्होंने गाओ से कहा भी कि इसमें किसी तरह की हिचक नहीं होनी चाहिए. गाओ से बीबीसी ने बातचीत के लिए संपर्क किया, लेकिन वे बात करने के लिए तैयार नहीं हुए. हालांकि उन्होंने चीन की सरकारी मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि जितनी जल्दी हो सकती थी उतनी ही जल्दी सैंपलों के सीक्वेंस जारी किए गए थे और उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कभी नहीं कहा कि यह संक्रमण इंसानों से इंसानों में नहीं फैल रहा था.

उसी दिन वुहान के स्वास्थ्य आयोग ने एक प्रेस रिलीज़ जारी करके बताया कि वायरल न्यूमोनिया के 27 मामलों की पहचान हुई है लेकिन इस संक्रमण के इंसानों से इंसानों तक पहुंचने के कोई स्पष्ट सबूत नहीं मिले हैं. इसके 12 दिनों के बाद चीन ने इस महामारी के जीनेटिक सीक्वेंस को अंतरराष्ट्रीय मीडिया से शेयर किया था.

चीन की सरकार के प्रतिनिधियों से बीबीसी ने बातचीत करने की कई बार कोशिश की लेकिन कोई बातचीत करने के लिए उपलब्ध नहीं हुआ. इसके बदले उन्होंने कोविड-19 के ख़िलाफ़ चीन की लड़ाई पर एक विस्तृत आधिकारिक बयान ज़रूर दिया, जिसके मुताबिक, "चीन ने हमेशा खुली पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी और समय के साथ इस महामारी पर क़दम उठाए हैं."

एक जनवरी, 2020: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हताशा

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अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक किसी नयी संक्रामक बीमारी जिससे दुनिया भर को ख़तरा हो, उसके फैलने के 24 घंटे के अंदर विश्व स्वास्थ्य संगठन को रिपोर्ट करना होता है. लेकिन पहली जनवरी, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास इस महामारी फैलने को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी.

इससे एक दिन पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारियों ने प्रोमेड की पोस्ट और ऑनलाइन रिपोर्ट्स देखी थी, लिहाज़ा उन्होंने चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग से संपर्क साधा.

वॉशिंगटन डीसी के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में नेशनल एंड ग्लोबल हेल्थ लॉ पर डब्ल्यूएचओ के सहयोग से चल रहे सेंटर के निदेशक और इंटरनेशनल हेल्थ रेगुलेशन रोस्टर के सदस्य प्रोफेसर लॉरेंस गोस्टीन ने कहा, "इसकी रिपोर्ट होनी चाहिए थी. इसका नहीं होना पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामकों का उल्लंघन था."

डब्ल्यूएचओ के महामारी रोग विशेषज्ञ और बाद में कोविड-19 टेक्निकल टीम को लीड करने वाली डॉ. मारिया वैन केरखोवे, उन लोगों में शामिल थीं जो एक जनवरी की मध्यरात्रि में बुलाए गए आपातकालीन कांफ्रेंस कॉल में शामिल हुई थीं.

उन्होंने बताया, "हमारा पहले अनुमान था कि यह नया कोरोना वायरस हो सकता है. हमारे लिए उस वक्त यह जानना महत्वपूर्ण नहीं था कि यह इंसान से इंसान तक पहुंच रहा है, बल्कि हम यह जानना चाह रहे थे कि यह किस रफ्तार से फैल रहा है और यह कहां हो रहा है."

चीन ने इसके दो दिन बाद डब्ल्यूएचओ को जवाब भेजा था. लेकिन उनका जवाब अस्पष्ट था- जवाब में कहा गया था कि हमारे यहां वायरल न्यूमोनिया को 44 मामले मिले हैं, जिनके कारणों का पता नहीं चल पा रहा है.

डॉक्टर ली वेनलियांग

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चीन ने कहा है कि वह तीन जनवरी के बाद से डब्ल्यूएचओ के साथ नियमित तौर पर संपर्क में रहा. समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) ने डब्ल्यूएचओ की बैठक की रिकॉर्डिंग हासिल की है, जिसमें कुछ उन्होंने पीबीएस फ्रंट लाइन और बीबीसी के साथ शेयर किया है. इस रिकॉर्डिंग्स से दूसरी तस्वीर उभरती है जिससे उस सप्ताह डब्ल्यूएचओ के वरिष्ठ अधिकारियों की हताशा का पता चलता है.

इस रिकॉर्डिंग्स में डब्ल्यूएचओ के हेल्थ इमरजेंसी प्रोग्राम के निदेशक माइक रयान को यह कहते हुए सुना जा सकता है, "संक्रमण के आदमी से आदमी तक पहुंचने के कोई सबूत नहीं हैं, यह कहना पर्याप्त नहीं है. हमें आंकड़ा चाहिए."

चीन से मिली जानकारी को बताने के लिए डब्ल्यूएचओ क़ानूनी तौर पर बाध्य था. डब्ल्यूएचओ ने तब मानव से मानव के बीच संक्रमण फैलने की आशंका जताई थी, लेकिन इसकी पुष्टि अगले तीन सप्ताह में हो सकी.

समाचार एजेंसी एपी के डेक कांग ने बताया, "डब्ल्यूएचओ के अधिकारियों ने अपनी आशंकाओं को कभी सार्वजनिक तौर पर ज़ाहिर नहीं किया और चीन ने भी इसे लंबित रखा. आख़िरकार, बाक़ी दुनिया को उतना ही पता चला जितना कि चीनी अधिकारी बताना चाहते थे. वे बताना चाहते थे कि सबकुछ नियंत्रण में हैं, जबकि वास्तविकता यह नहीं थी."

दो जनवरी: डॉक्टरों पर अंकुश

टीवी समाचार

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वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या हर कुछ दिन पर दोगुनी हो रही थी और वुहान के अस्पतालों में संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. ऐसे समय में जब डॉक्टरों को चिंताएं सावर्जनिक तौर पर बताने की अनुमति देने के बदले उनको चुप रखने के लिए कारगर अभियान चलाया गया.

दो जनवरी को चाइना सेंट्रल टेलीविजन ने उन डॉक्टरों पर एक ख़बर दिखाई जो चार दिन पहले अपने इलाके में वायरस के प्रकोप फैलने की बात कह चुके थे. इस रिपोर्ट में इन डॉक्टरों को अफ़वाह फैलाने वाले और इंटरनेट यूज़र्स कहा गया था. इन डॉक्टरों को पूछताछ के लिए वुहान पब्लिक सिक्युरिटी ब्यूरो में लाया गया और इन पर क़ानून के मुताबिक कार्रवाई करने की बात कही गई.

इन डॉक्टरों में आंखों के डॉक्टर ली वेनलियांग भी शामिल थे, जिनकी चेतावनी वायरल हो चुकी थी. उन्होंने अपने अपराध को स्वीकार करते हुए एक बयान पर हस्ताक्षर किए. फरवरी महीने में उनकी मौत कोविड-19 से हो गई.

चीन की सरकार का कहना है कि इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि देश भर में वायरस के प्रकोप फैलने की ख़बर को दबाने की कोशिश हुई थी. चीन की सरकार के मुताबिक ली जैसे डॉक्टरों से यह अपील की गई थी कि वह अपुष्ट सूचनाओं को नहीं फैलाएं.

सरकार की इस कोशिश का असर डॉक्टरों पर दिखा. डॉक्टरों के सामने यह स्पष्ट होने लगा था कि संक्रमण एक इंसान से दूसरे इंसान को होने लगा है, लेकिन वे सार्वजनिक तौर पर यह बोल नहीं रहे थे. ली के अस्पताल वुहान सेंट्रल के एक कर्मचारी ने बीबीसी को बताया, "इतने लोगों को बुखार हो रहा था. स्थिति नियंत्रण के बाहर चली गई थी. हमलोग घबराने लगे थे. लेकिन अस्पताल ने हमसे कहा कि इस मुद्दे पर आप किसी से बात नहीं कर सकते."

चीन की सरकार ने हमसे कहा, "कोई भी वायरस इंसान से इंसान तक पहुंचता है, इसकी जांच करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया काफ़ी जटिल होती है." चीन के अधिकारी अगले 18 दिनों तक यह कहते रहे वायरस का संक्रमण इंसानों से इंसानों तक नहीं हो रहा है.

तीन जनवरी- डॉक्टरों को नोटिस

प्रोटीन स्पाइक

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चीन के कई लैब में वायरस की जेनेटिक सीक्वेंस की मैपिंग की होड़ लगी थी. इनमें शंघाई के मशहूर वायरोलॉजिस्ट प्रोफेसर झांग योंगजहेन भी शामिल थे, जिन्होंने तीन जनवरी से सीक्वेंसिंग की शुरुआत की. लगातार दो दिन तक काम करके उन्होंने इसका पूरा सीक्वेंस तैयार कर लिया था. उनके नतीजे से यह ज़ाहिर हो रहा था कि यह वायरस सार्स से मिलता जुलता है और इसी वजह से यह एक से दूसरे तक संचरित होने वाला वायरस है.

05 जनवरी को योंगजहेन के दफ्तर ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग को सलाह दी कि सार्वजनिक जगहों पर एहतियात के उपाय किए जाने चाहिए.

उनके रिसर्च पार्टनर और सिडनी यूनिवर्सिटी में इवोल्यूशनरी वायरोलॉजिस्ट प्रोफेसर एडवर्ड होम्स ने कहा, "उस दिन वे लगातार कोशिश कर रहे थे कि जल्दी से नतीजे को जारी किया जा सके ताकि पूरी दुनिया को पता चल सके कि वायरस क्या है और उस हिसाब से इलाज की तैयारी शुरू हो."

लेकिन झांग अपनी रिपोर्ट को सावर्जनिक नहीं कर पाए. तीन जनवरी को राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग ने एक गोपनीय मेमो भेज कर लैब में अनाधिकृत वैज्ञानिकों के वायरस पर काम करने और सूचनाएं सार्वजनिक करने पर पाबंदी लगा दी.

समाचार एजेंसी एपी के डेक कांग ने बताया, "इस नोटिस के चलते वैज्ञानिक और लैब्स वायरस को लेकर किसी तरह की सूचना सार्वजनिक नहीं कर सकते थे. एक तरह से इसी नोटिस के बाद लोगों के सामने रिपोर्ट को लीक करके दुनिया भर के लोगों को चेताने का रास्ता भी खुला."

कार्टून

चीन के किसी लैब ने वायरस के जेनेटिक सीक्वेंस को सार्वजनिक नहीं किया. चीन की ओर से लगातार कहा जाता रहा कि यह वायरल न्यूमोनिया है और इसके एक इंसान से दूसरे इंसान तक पहुंचने के कोई संकेत नहीं हैं.

इसके छह दिन बाद यह बताया गया कि नया वायरस कोरोना वायरस है, लेकिन तब तक कोई जेनेटिक सीक्वेंस शेयर नहीं किया गया, अगर ऐसा होता तो वायरस की रोकथाम में मदद मिलती.

तीन दिन बाद यानी 11 जनवरी को झांग ने जोख़िम उठाने का फ़ैसला लिया. वे जब बीजिंग से शंघाई की हवाई उड़ान पर थे तब उन्होंने अपने पार्टनर होम्स से सीक्वेंस को रिलीज़ करने के लिए कह दिया. इस फ़ैसले की क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ी और अगले ही दिन उनका लैब बंद कर दिया गया. लेकिन उनके फ़ैसले ने गतिरोध को तोड़ने का काम किया.

अगले ही दिन वैज्ञानिकों ने सीक्वेंस जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक समुदाय सक्रिय हुआ और 13 जनवरी को डायग्नॉस्टिक टेस्ट के लिए टूल किट सार्वजनिक हो गया.

वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को मिले सबूत के बावजूद चीन ने 20 जनवरी तक यह स्वीकार नहीं किया कि वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान तक फैल रहा है. स्वास्थ्य क़ानून मामलों के एक्सपर्ट लॉरेंस गोस्टीन के मुताबिक किसी भी बीमारी के प्रकोप फैलने के शुरुआती दौर में अफ़रातफ़री का माहौल होता है.

उन्होंने कहा, "इस वायरस पर नियंत्रण पाना हमेशा से मुश्किल था. पहले ही दिन से. लेकिन जब तक हम लोगों या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को पता चला कि यह एक इंसान से दूसरे इंसान तक फैल रही है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. यह फैल चुका था. हमारे पास मौका था, लेकिन हमने इसे गंवा दिया."

जैसा कि सिंगापुर के ड्यूक नस मेडिकल स्कूल में बैट-वायरोलॉजिस्ट वांग लिंफा ने बताया, "20 जनवरी, 2020 डिवाइडिंग लाइन है. इससे पहले चीन काफी बेहतर कर सकता था. अगर ऐसा होता तो बाक़ी दुनिया भी अलर्ट पर रहती और इस महामारी का बेहतर ढंग से सामना कर पाती."

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