वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इंसानों ने एक ऐसा माहौल बना दिया है, जिसमें पशु-पक्षियों की बीमारियां, इंसानों में आ रही हैं और दुनियाभर में तेज़ी से फैल रही हैं.
वैज्ञानिकों का ये भी कहना है कि प्रकृति में इंसान के अतिक्रमण की वजह से ये प्रक्रिया और भी तेज़ हो गई है.
ये बात वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कही है जो नई बीमारियों के फैलने की प्रक्रिया और स्थान का अध्ययन करते हैं.
इस प्रक्रिया में विशेषज्ञों ने एक पैटर्न रिक्गनिशन सिस्टम विकसित किया है जो कि ये बताने में सक्षम है कि वन्य जीवों से जुड़ी कौन सी बीमारी इंसानों के लिए कितनी ख़तरनाक साबित हो सकती है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिवरपूल के वैज्ञानिकों को नेतृत्व में जारी इस वैश्विक प्रयास के तहत उन रास्तों को विकसित किया जा रहा है जिनके ज़रिये भविष्य की महामारियों के लिए बेहतर ढंग से तैयार हुआ जा सके.
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'पांच बार बचे लेकिन...'
यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिवरपूल के प्रोफेसर मेथ्यू बेलिस कहते हैं, "बीते पांच सालों में हमारे सामने सार्स, मर्स, इबोला, एविएन इंफ़्लूएंजा और स्वाइन फ़्लू के रूप में पांच बड़े ख़तरे आए हैं. हम पांच बार बचने में कामयाब रहे लेकिन छठवीं बार हम बच नहीं सके."
"और ये कोई आख़िरी महामारी नहीं है. ऐसे में हमें वन्यजीवों से जुड़ी बीमारियों पर विशेष अध्ययन करने की ज़रूरत है."
इस काफ़ी बारीक़ अध्ययन के तहत बेलिस और उनके साथियों ने प्रिडिक्टिव पैटर्न रिकग्निशिन सिस्टम तैयार किया है जो कि वन्यजीवों से जुड़ी सभी विदित बीमारियों के डेटाबेस की पड़ताल कर सकता है.
ये सिस्टम हज़ारों जीवाणुओं, परजीवियों और विषाणुओं का अध्ययन करके ये पता लगाता है कि वे कितनी और किस तरह की प्रजातियों को संक्रमित करते हैं. इस जानकारी के आधार पर ये सिस्टम ये तय करता है कि कौन सी बीमारी इंसानों के लिए कितनी ख़तरनाक है.
अगर किसी पैथोजेन को प्राथमिकता के क्रम में ऊपर रखा गया है तो वैज्ञानिक उससे बचाव और इलाज़ की तलाश के लिए महामारी फैलने से पहले ही शोध शुरू कर सकते है.
प्रोफेसर बेलिस कहते हैं, "ये तय करना कि कौन सी बीमारी महामारी का रूप ले सकती है, द्वितीय चरण का काम है. फिलहाल हम पहले चरण पर काम कर रहे हैं."
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लॉकडाउन ने क्या सिखाया?
कई वैज्ञानिक मानते हैं कि जंगलों के कटान और विविधता से भरी वन्यजीवन में इंसानों के अतिक्रमण को लेकर इंसानी रवैया जानवरों से इंसानों में बीमारी के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार है.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफेसर केट जोन्स कहती हैं, "सबूत ये बताते हैं कि कम जैवविविधता वाले इंसानों की ओर से बदले गए पारितंत्र (इकोसिस्टम) जैसे कि खेत और बाग आदि में इंसानों के कई बीमारियों से संक्रमित होने का ख़तरा ज़्यादा होता है."
लेकिन वह ये भी कहती हैं, "सभी मामलों में ऐसा हो, ये ज़रूरी नहीं है. लेकिन सभी तरह की जंगली प्रजातियां जो कि इंसानों की मौजूदगी के प्रति सहनशील होती हैं जैसे कि रोडेंट प्रजाति (चूहे आदि) अक्सर कई पैथोजन को संभालकर रखने और संक्रमित करने में काफ़ी प्रभावी होती हैं."
"ऐसे में जैव-विविधता की कमी के चलते ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जहां इंसानों और जानवरों के बीच संपर्क बढ़े और कुछ निश्चित विषाणुओं, जीवाणुओं और परजीवियों को इंसानों को संक्रमित करने का मौका मिले."
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वायरस की शुरुआत
कुछ ऐसी बीमारियां फैली हैं जिन्होंने इस जोख़िम को साफ साफ दिखाया है. साल 1999 में मलेशिया में फैला निपाह वायरस चमगादड़ों से सुअरों में पहुंचा था.
दरअसल, इस वायरस की शुरुआत उस सुअर बाड़े से हुई जो कि जंगल के पास मौजूद था. चमगादड़ ने सुअर बाड़े में मौजूद एक पेड़ पर लगे फल को खाया. लेकिन इस दौरान चमगादड़ का खाया हुआ और उसकी लार में सना हुआ एक फल सुअर बाड़े में गिर गया. इसके बाद वहां मौजूद सुअरों ने उस फल को खा लिया.
क्योंकि चमगादड़ जिस पेड़ पर फल खा रहा था, वह पेड़ सुअर बाड़े में मौजूद था. चमगादड़ के फल खाते खाते
इस तरह वायरस से संक्रमित हुए सुअरों के संपर्क में काम करने वाले 250 लोग संक्रमित हो गए. सौ से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई.
कोरोना वायरस की मृत्यु दर का आकलन अभी जारी हैं. लेकिन मौजूदा आकलन इसे 1 फीसदी ठहरा रहे हैं. जबकि निपाह वायरस की मृत्यु दर 40 से 75 फीसदी थी. यानि इस वायरस से संक्रमित होने वाले सौ में से 40 से 75 लोगों की मौत हो जाती है.
बीमारियों के फैलने की संभावना
लिवरपूल यूनिवर्सिटी और इंटरनेशनल लाइवस्टॉक रिसर्च इंस्टीट्यूट (नैरोबी) कहता है कि शोधार्थियों को उन क्षेत्रों के प्रति लगातार सजग रहने की ज़रूरत है जहां इस तरह के वायरस फैलने का ख़तरा ज़्यादा है.
जंगलों के किनारे बसे खेत और पशु बाज़ार ऐसी जगहें हैं जहां पर इंसानों और वन्यजीवों के बीच दूरी काफ़ी कम हो जाती है और ऐसी ही जगहों से बीमारियों के फैलने की संभावना रहती है.
प्रोफेसर फीवरी कहते हैं, "हमें ऐसी जगहों को लेकर हमेशा सचेत रहने की ज़रूरत है और ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि कुछ अजीब हरकत जैसे कि कोई बीमारी फैलने पर समय रहते प्रतिक्रिया की जा सके."
"इंसानों में हर साल तीन से चार बार नई बीमारियां सामने आ रही हैं, और ये सिर्फ एशिया या अफ़्रीका में नहीं हो रहा है, बल्कि यूरोप और अमरीका में भी हो रहा है."
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बीमारियां बार बार आ सकती हैं...
वहीं, बेलिस कहते हैं कि नई बीमारियों पर लगातार नज़र रखा जाना बेहद ज़रूरी है क्योंकि हमने एक महामारियों के लिए उपयुक्त स्थितियां पैदा कर दी हैं.
प्रोफेसर फीवरी मानते हैं कि इस तरह की बीमारियां बार बार आ सकती हैं. वह कहते हैं, "प्राकृतिक दुनिया के साथ हमारे संपर्क की प्रक्रिया में ये होता रहा है. अभी अहम बात ये है कि हम इसे समझ कर इसकी प्रतिक्रिया किस तरह दें. वर्तमान समस्या प्राकृतिक दुनिया पर हमारे प्रभाव के परिणाम के बारे में बता रही है.
"हम जिस भी चीज़ का इस्तेमाल करते हैं उसके प्रति शुक्रगुज़ार नहीं होते हैं - हम जो खाना खाते हैं, हमारे स्मार्ट फोन में जिन चीज़ों का इस्तेमाल होता हैं; हम जितना उपभोग करेंगे, उतना ही ज़्यादा कोई उन चीज़ों को ज़मीन से निकालकर पैसा कमाएगा और दुनिया भर में पहुंचाएगा."
"ऐसे में ज़रूरी है कि हम ये समझें कि हम जिन संसाधनों का इस्तेमाल उपभोग करते हैं, उनका प्रभाव क्या होता है."
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
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हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
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अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.