कोरोना: आत्मनिर्भर भारत बनाने की कोशिश और तस्करी शुरू होने का अंदेशा?- नज़रिया
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Author, आलोक जोशी
पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
उदारीकरण के बाद यानी 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद देश में तरक़्क़ी की रफ़्तार तेज़ हुई इस पर तो कोई विवाद नहीं है. मगर इस तरक़्क़ी का फ़ायदा किसे किसे मिला इस पर लगातार विवाद रहा है. सबसे बड़ा सवाल यही उठता रहा कि ग़रीबी मिटाने में या आर्थिक विषमता कम करने में सुधारों ने क्या योगदान किया? क्या ग़रीबी ख़त्म हो गई?
इस सवाल का जवाब देने में तो सुधारों के बड़े से बड़े पैरोकार को भी नज़रें चुरानी ही पड़ती हैं. ग़रीबी हटाओ की अपार सफलता के पचास साल बाद भी ग़रीबी तो नहीं हटी, हाँ 'सबका साथ सबका विकास' के नाम से उसी फ़िल्म का एक ब्लॉकबस्टर रीमेक ज़रूर देखने को मिला है.
आर्थिक सुधारों या बाज़ार के खुल जाने से एक चीज़ जो पूरी तरह ग़ायब हो गई वो थी स्मगलिंग यानी तस्करी. नशीली दवाओं या चरमपंथियों के हथियारों की तस्करी तो बंद नहीं हुई लेकिन रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ें, इलेक्ट्रॉनिक्स और ख़ास तौर पर सोने, ज़ेवरात और परफ़्यूम जैसी चीज़ों की तस्करी के तो शटर डाउन हो ही चुके थे. वजह साफ़ थी, जब सब कुछ सीधे रास्ते से लाया जा सकता है, उसी दाम पर बेचा जा सकता है, तो मामूली टैक्स या ड्यूटी चुकाने के बजाय चोर रास्ते से आने का जोखिम कोई क्यों उठाएगा?
लेकिन इन दिनों ये आशंका बढ़ रही है कि कहीं फिर तस्करी का धंधा तेज़ तो नहीं हो जाएगा. और इसके साथ ही सवाल ये है कि क्या फिर ऐसे हालात बनेंगे जिसमें ईमानदारी से टैक्स चुकाकर सामान ख़रीदने वाले लोग नुक़सान में रहेंगे और तस्करों के हाथों वही सामान सस्ता ख़रीदने वाले पड़ोसी उन्हें मुँह चिढ़ाते दिखेंगे. आप पूछ सकते हैं कि अचानक ये तस्करी का सवाल कहाँ से उठ रहा है.
तो ध्यान दीजिए. भारत के सबसे तेज़-तर्रार उद्योगपतियों के संगठन सीआईआई के सालाना जलसे में ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चमड़ा, जूते-चप्पल और फ़र्नीचर के अलावा एसी यानी एयरकंडीशनर के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर होने की ज़रूरत है. उन्होंने ये गिनाया कि अभी देश में एसी की कुल ज़रूरत का तीस परसेंट हिस्सा इंपोर्ट होता है, जिसे रोकना ज़रूरी है.
ख़बरें हैं कि उद्योग मंत्रालय के अधिकारी दस ऐसे सेक्टरों पर काम में लगे हैं जिनमें इंपोर्ट कम करके 'मेक इन इंडिया' या आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर बढ़ाया जाएगा. इनमें कैपिटल गुड्स, मशीनरी, फ़ार्मा, सेलफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, ज्यूलरी और टेक्सटाइल के साथ ही एसी यानी एयर कंडिशनर का नाम भी शामिल है.
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भारत में चीज़ें बनाने पर ज़ोर
सेलफोन बनाने का ज़िक्र तो ख़ूब हुआ लेकिन पिछले बजट में सेलफोन के भीतर लगने वाले प्रिंटेड सर्किट बोर्ड या पीसीबी पर ड्यूटी दस से बढ़ाकर बीस परसेंट और चार्जर पर पंद्रह से बीस परसेंट कर दी. तर्क वही कि इन चीज़ों के भारत में बनने को बढ़ावा दिया जाना है.
इससे पहले पिछले साल सरकार ने सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी दस परसेंट से बढ़ाकर साढ़े बारह परसेंट कर दी. ऊपर से सरचार्ज जोड़कर ये ड्यूटी पंद्रह परसेंट के पार चली जाती है. यानी चोर रास्ते से सोना लाना फिर आकर्षक होने लगा है. तमाम जानकारों ने यह आशंका सामने रखी कि इससे सोने की तस्करी में फिर तेज़ी आ सकती है.
जवाहरात और ज़ेवरात का कारोबार करने वालों की संस्था जीजेईपीसी ने तो गणित जोड़कर भी बताया कि हीरे-जवाहरात पर ड्यूटी पाँच से बढ़ाकर साढ़े सात परसेंट होने के बाद पिछले साल डायमंड ज्यूलरी का एक्सपोर्ट दस परसेंट गिर गया और हीरे की पॉलिश के आर्डरों में भी ख़ासी गिरावट आई है.
सोने के बारे में तो कई विशेषज्ञ यह कह चुके हैं कि इस पर ड्यूटी बढ़ाना सीधे-सीधे तस्करी का रास्ता खोलना है. 2011 में सोने पर चार परसेंट ड्यूटी लगती थी. 2013 में यह बढ़कर दस परसेंट हो गई. तभी से तस्करी में तेज़ी आ रही थी. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार 2018 में ही देश में क़रीब सौ टन सोना तस्करी के रास्ते आया था.
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में शामिल आर्थिक विशेषज्ञ नीलेश शाह लंबे समय से सोने के बेहतर इस्तेमाल और ऐसे तरीक़े अपनाने के सुझाव देते रहे हैं जिनसे सोने का बेवजह आयात कम हो सके और देश को उसके स्वर्ण भंडार का फ़ायदा भी मिले.
मोबाइल फ़ोन पर ड्यूटी
बजट के ठीक पहले तक यह माँग ज़ोरों पर थी कि सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाकर चार परसेंट कर दी जाए. इसी तरह एप्पल जैसे महँगे सेलफोन बनाने वाले माँग कर रहे थे कि महँगे फ़ोन पर जो बीस परसेंट ड्यूटी लगती है उसे अधिकतम चार हज़ार रुपए पर सीमित कर दिया जाए.
इंडियन सेलुलर एंड इलेक्ट्रॉनिक एसोसिएशन का कहना था कि अगर सरकार ड्यूटी घटा देती तो उसे सालाना ग्यारह सौ करोड़ रुपए की कमाई होती क्योंकि लोग तब ग्रे मार्केट से फ़ोन नहीं लेते.
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यही तर्क सोने और जवाहरात के मामले में है. भारतीय व्यापारियों का कहना है कि अब बहुत से गहने और जवाहरात थाइलैंड जैसे उन देशों के रास्ते आ रहे हैं जिनके साथ आसियान के तहत भारत का मुक्त व्यापार समझौता है. इन पर सरकार को भी कुछ नहीं मिलता और घरेलू कारोबारियों के लिए उससे मुक़ाबला भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि ड्यूटी भरने के बाद वो उनसे दाम मैच नहीं कर सकते.
एकदम यही बात एयर कंडीशनर बनाने वाले भी कहते हैं. उनका कहना है कि जापान की कंपनियाँ जिनके ब्रांड मशहूर हैं वो अपने कंप्रेसर और ज़्यादातर पुर्ज़े थाईलैंड और वियतनाम के रास्ते इंपोर्ट कर रही हैं ताकि व्यापार समझौते का फ़ायदा ले सकें. हालाँकि भारत के एसी मार्केट में क़रीब पैंतालीस परसेंट इंपोर्ट चीन से होता है लेकिन इसके अलावा भी देश हैं जहां से सामान आ रहा है. उनका ध्यान रखा जाना भी ज़रूरी है.
एक उदाहरण से समझ लीजिए. विदेश से आने वाला कोई भी इंसान अपने साथ एक मोबाइल फ़ोन और एक लैपटॉप तो ला ही सकता है. कभी-कभी दो भी. ऐपल का लेटेस्ट मैकबुक लैपटॉप भारत में पौने दो लाख रुपए का मिल रहा है और अमरीका में सवा लाख रुपए से कम का. अब सोचिए इतने फ़र्क़ के लिए क्या कोई चांस नहीं लेगा?
लगभग ऐसा ही फ़र्क़ आइफ़ोन पर भी होता है. फ़िलहाल आना-जाना बंद है, लेकिन हमेशा तो नहीं रहेगा. थाइलैंड से आने वाली किसी भी फ़्लाइट से उतरते मुसाफ़िरों को देखिए, ज़्यादातर की ट्रॉली पर एक एलसीडी या एलईडी टीवी ज़रूर दिखता था, अब एसी भी दिख सकता है. क़ानूनन लाने पर रोक भी नहीं है, बस थोड़ी सी कसरत ही तो है.
और सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह समझना है कि आज की दुनिया में अगर आगे बढ़ना है तो अपनी इंडस्ट्री को मुक़ाबले में खड़े होने लायक़ बनाना होगा, न कि ड्यूटी की बैसाखी लगाकर किसी तरह खड़े रखना. अगर आप एक रास्ता बंद करेंगे तो जुगाड़ से लोग दूसरा दरवाज़ा खोल लेंगे.
यह डर बेबुनियाद नहीं है कि ऐसी नीतियाँ हमें वापस 1970 के दौर में ले जा सकती हैं जहां सिर्फ़ लाइसेंस, परमिट और पाबंदियों का राज था. उनके भरोसे आत्मनिर्भर होने का सपना ख़ामख्याली ही साबित हुआ था.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.