डेंगू और ज़ीका से लड़ने वाले मच्छर

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- Author, वैष्णवी चंद्रशेखरन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
मच्छर कई बीमारियों की जड़ माने जाते हैं. डेंगू, मलेरिया और ज़ीका जैसी बीमारियों के वायरस की ये इंसानों तक होम डिलीवरी करते हैं.
ख़ुद मच्छरों के काटने से कोई बीमारी भले न हो लेकिन इनके शरीर में मौजूद बीमारियों के कीटाणु इनके काटने से ही इंसान में घुसते हैं. यही वजह है कि दुनिया में कई बीमारियों के ख़ात्मे के लिए मच्छरों को मारने का नुस्खा आज़माया जाता है.
इंसान की तमाम कोशिशों के बावजूद, डेंगू, मलेरिया और मच्छरों की वजह से होने वाली दूसरी बीमारियां बड़ी तेज़ी से फैल रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि पिछले पचास सालों में डेंगू की बीमारी तीस गुना तक बढ़ गई है.

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कई नुस्खे आज़माए गए
1970 तक ये बीमारी सिर्फ़ 9 देशों में भयंकर तौर पर असर दिखाती थी. मगर आज डेंगू एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के सौ से ज़्यादा देशों में कई बार महामारी का रूप धर लेता है. पिछले कुछ सालों में ज़ीका वायरस भी लैटिन अमरीकी और दूसरे देशों में फैलता दिख रहा है.
अफ़सोस की बात ये है कि अब तक न तो डेंगू का कोई इलाज खोजा जा सका है और न ही ज़ीका का. ये दोनों ही बीमारियां एडीज़ मच्छर के काटने से फैलती हैं.
यही वजह है कि पिछले कई दशकों से मच्छरों के खात्मे के तमाम नुस्खे आज़माए गए हैं. जैसे कि पिछली सदी के मध्य तक डाइक्लोरो डाइफेनाइल ट्राइक्लोरोईथेन यानी डीडीटी नाम के केमिकल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ था. इससे मच्छरों पर क़ाबू पाने में काफ़ी मदद मिली थी.

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मच्छर दोबारा क्यों लौटे?
ब्राज़ील को इसी की मदद से 1958 में एडीज़ मच्छर मुक्त देश घोषित कर दिया गया था. इसके बाद डीडीटी के छिड़काव के नियमों में ढील दे दी गई. नतीजा ये हुआ कि 1970 के दशक से मच्छरों ने दोबारा ब्राज़ील में वापसी की. ये पड़ोसी देश वेनेज़ुएला से घुसपैठ करके आए थे. धीरे-धीरे ये मच्छर पूरे ब्राज़ील में फैल गए. मच्छर लौटे, तो तमाम बीमारियां भी लौट आईं. शहरीकरण की वजह से भी बीमारियों के फैलने की रफ़्तार तेज़ हुई.
इधर, वैज्ञानिकों ने दुनिया को डीडीटी के साइड इफेक्ट से आगाह करना शुरू किया. इससे बड़ी तादाद में परिंदे मर रहे थे. पता चला कि इसकी वजह से इंसानों में कैंसर भी हो रहा था. इसलिए तमाम देशों ने डीडीटी के इस्तेमाल पर 2004 में रोक लगा दी.
अब मच्छरों से होने वाली बीमारियों से लड़ने के लिए एकदम ताज़ा-नया नुस्खा आज़माया जा रहा है.

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मच्छर मारने का ये कैसा प्रयोग?
पिछले साल अक्टूबर में सिंगापुर में एक जगह बड़ी तादाद में लोग जमा हुए थे. इनमें सरकारी अफ़सर थे. स्थानीय लोग थे. मीडिया भी मौजूद था. इन सब के हाथ में मच्छरों से भरे हुए डिब्बे थे.
एक, दो, तीन के काउंटडाउन के बाद सबने एक साथ अपने डिब्बे खोलकर मच्छर हवा में उड़ा दिए. सिंगापुर जैसे गर्म देश में जहां आम तौर पर मच्छरों से परेशान लोग उन्हें मारते हैं, वहां मच्छरों को इस तरह छोड़ने का नज़ारा आम तो था नहीं. लेकिन इन लोगों ने क़रीब तीन हज़ार मच्छर हवा में छोड़े थे.
सिंगापुर के ब्रैडेल हाइट्स इलाक़े में हुए इस इवेंट के लिए लोगों को कई महीने से जानकारी दी जा रही थी. उन्हें बताया गया था कि ये मच्छर काटने वाले नहीं हैं. स्थानीय लोगों को बताया गया था कि ये एक बड़ा साइंस प्रोजेक्ट है, जिसमें वो शरीक होने जा रहे हैं.
असल में हवा में छोड़े गए ये मच्छर वोल्बाशिया नाम के बैक्टीरिया के शिकार थे. ये बैक्टीरिया मच्छरों की प्रजनन की क्षमता पर असर डालता है. साथ ही ये ज़ीका वायरस को भी फैलने से रोकता है.
ये तजुर्बा करने वाला सिंगापुर इकलौता देश नहीं. एशिया और लैटिन अमरीका के कई देशों में ये प्रयोग हो रहा है. बहुत से देशों में मच्छरों की बच्चे पैदा करने की क्षमता ख़त्म कर दी जाती है. फिर उन्हें हवा में छोड़ दिया जाता है. इंडोनेशिया के योग्याकार्ता में भी यही प्रयोग हो रहा है. यहां पर मच्छरों की प्रजनन क्षमता ख़त्म करके बड़े पैमाने पर इंसानी बस्तियों के पास छोड़ा जा रहा है.

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नए नुस्खों की ज़रूरत
मच्छरों की रोकथाम के दुनिया के जाने-माने एक्सपर्ट ड्यून गुब्लर कहते हैं कि बीमारी वाले मच्छरों की रोकथाम के लिए इंसान को नए नुस्खों की सख़्त ज़रूरत है. वो मानते हैं कि फिलहाल दो तरीक़े बेहद कारगर साबित होते दिख रहे हैं.
पहला तो वो जो सिंगापुर और योग्याकार्ता में आज़माया जा रहा है. जिसमें नर मच्छरों की बनावट में बदलाव करके उन्हें बच्चे पैदा करने की ताकत से महरूम कर दिया जाता है. इस तरह से मच्छरों की नई पीढ़ी पैदा होने से रोकी जा रही है.
इससे भी कारगर तरीक़ा वैज्ञानिकों को मिला है वोल्बाशिया नाम के बैक्टीरिया में. ये बैक्टीरिया खुले तौर पर नहीं मिलता. ये किसी न किसी कीड़े के शरीर में ही पैदा होता है, पनपता है और फिर नई पीढ़ी को जन्म देकर ख़त्म हो जाता है. वोल्बाशिया जिस भी कीड़े के शरीर में होता है, उसको ज़ीका, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के वायरस से लड़ने की ताक़त देता है.

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जादुई फॉर्मूला
हालांकि ये एडीज़ नस्ल के मच्छरों में नहीं पाया जाता. लेकिन अब वैज्ञानिक पहले मादा मच्छरों को वोल्बाशिया बैक्टीरिया से संक्रमित कराते हैं. फिर इन मच्छरों को खुली हवा में छोड़ते हैं. ये मादा मच्छर जब अंडे देती हैं, तो बैक्टीरिया नई नस्ल में पहुंच जाते हैं. और मच्छरों की नई पीढ़ी में ज़ीका, डेंगू और चिकनगुनिया जैसे वायरस आने से रोकते हैं. इससे बीमारी के वायरस फैल नहीं पाते.
इस नुस्खे का सुझाव ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दिया था. दुनिया के तमाम वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर ये नुस्खा कामयाब हुआ, तो मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां रोकने का जादुई फॉर्मूला साबित हो सकता है.
सिंगापुर और चीन जैसे देश वोल्बाशिया बैक्टीरिया को सिर्फ़ नर मच्छरों में डालते हैं. इस वजह से वोल्बाशिया से संक्रमित नर मच्छर, आम मादा मच्छरों से सेक्स नहीं कर पाते. नतीजा मच्छरों की आबादी कम होने लगती है. ये आगे चलकर ख़त्म हो जाते हैं.
सिंगापुर की वैज्ञानिक ली चिंग एनजी कहती हैं कि उन्होंने इसलिए ये तरीक़ा चुना क्योंकि नर मच्छर काटते नहीं हैं. इसलिए आम जनता भी इस प्रयोग में साझीदार हो जाती है. सिंगापुर में इसका ट्रायल कामयाब होने के बाद अमरीकी सरकार ने भी वोल्बाशिया से संक्रमित मच्छर खुली हवा में छोड़ने की इजाज़त दे दी है.

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वैज्ञानिकों को उम्मीद पा लेंगे क़ाबू
इंडोनेशिया के योग्याकार्ता में ये प्रयोग पिछले क़रीब तीन साल से चल रहा है. आज की तारीख़ में शहर के 24 इलाक़ों में नियमित रूप से वोल्बाशिया से संक्रमित मच्छर छोड़ जा रहे हैं.
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में वो इन इलाक़ों में मच्छरों से होने वाली बीमारियों पर क़ाबू पा लेंगे. सिंगापुर में तो इस प्रयोग के नतीजे काफ़ी अच्छे रहे हैं.
यानी अब मच्छर ही मच्छरों का ख़ात्मा कर के हमें बीमारियों से बचाने में काम आ रहे हैं.
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