गोरख़पुर: जापानी बुख़ार क्या बला है और कैसे बनाता है बच्चों को अपना शिकार

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उत्तर प्रदेश के गोरख़पुर में बीती 11 अगस्त को 30 से ज्यादा बच्चों की अचानक मौत हो गई.
ज़िले के डीएम के मुताबिक, इसका कारण बीआरडी अस्पताल में बच्चों को दी जाने वाली ऑक्सीज़न रुकना कारण बताया गया लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन मौतों का कारण जापानी बुख़ार यानी इंसेफ़ेलाइटिस बताया.
उत्तर प्रदेश के सीएम ने इंसेफ़ेलाइटिस के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का ऐलान कर दिया है. और, उन्होंने बताया है कि गोरख़पुर साल 1978 से ही इस बीमारी से लड़ रहा है.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़, इस बीमारी का पहला मामला साल 1871 में सामने आया था. और, मच्छरों से फ़ैलने वाला ये वायरस डेंगी, पीला बुख़ार, और पश्चिमी नील वायरस की प्रजाति का है.
इस बुख़ार को लेकर उठने वाले हर सवाल के जवाब यहां पढ़िए-
जापानी बुख़ार यानी इंसेफ़ेलाइटिस है क्या?
ब्रिटेन की संस्था एनएचएस के मुताबिक, "इंसेफ़लाइटिस एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसमें आपके दिमाग में सूजन आने लगती है. ये एक जानलेवा बीमारी है. इसके लिए आपातकालीन इलाज की जरूरत होती है. इस बीमारी का शिकार कोई भी हो सकता है लेकिन सबसे ज्यादा ख़तरा बच्चों और बूढ़ों को होता है."
वहीं डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़, जापानी बुख़ार से सबसे ज्यादा ख़तरा बच्चों को होता है.

आख़िर क्यों होता है इंसेफ़ेलाइटिस?
इंसेफ़ेलाइटिस के कारणों पर निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है. लेकिन ये निम्नलिखित कारणों से हो सकता है.
- वायरल इन्फेक्शन के मामले में कई वायरस दिमाग तक पहुंचकर इंसेफ़ेलाइटिस कर सकते हैं
- इन्फेक्शन के ख़िलाफ़ लड़ने वाली रोग प्रतिरोधक क्षमता में गड़बड़ी आने पर ये सीधे दिमाग पर हमला कर देती है जिससे दिमाग में सूजन आ सकती है
- फंगल इंफेक्शन
- जापानी बुख़ार इंसेफ़लाइटिस मच्छरों से फैलने वाली बीमारी है
दुनिया में इंसेफ़ेलाइटिस का आतंक
अमरीकी सरकार की संस्था सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, दुनिया भर में भारत, इंडोनेशिया, सिंगापुर, रूस और श्रीलंका से लेकर आस्ट्रेलिया में इस वायरस की पहचान की गई है.

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सीडीसी के मुताबिक, इस बीमारी से प्रभावित होने वालों में 20 से 30 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है.
किन इलाकों में होता है जापानी बुख़ार?
सीडीसी के मुताबिक, जापानी बुख़ार आमतौर पर ग्रामीण और ख़ेती से जुड़े इलाकों में पाया जाता है. खासतौर पर ऐसे इलाकों में जहां चावल की खेती होती है.

एशिया में ये बीमारी गर्मियों में सिर उठाती है और बारिश के मौसम में भी इसका प्रकोप देखा जाता है.
कितने दिन में दिखते हैं प्रभाव?
मच्छर से फैलने वाला जापानी इंसेफ़ेलाइटिस का प्रभाव मच्छर के काटने के 5 से 15 दिनों में दिखाई पड़ने लगते हैं.

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जापानी इंसेफ़ेलाइटिस का पता कैसे लगाएं?
जापानी इंसेफ़लाइटिस का असर ख़ून और स्पाइनल फ्लूइड की विशेष जांच से पता चलता है. ये टेस्ट्स उन एंटीबॉडीज़ का पता लगाते हैं जो हमारे इम्यून सिस्टम में वायरल इंफ़ेक्शन से लड़ने के लिए पैदा होते हैं.
जापानी बुख़ार का क्या है इलाज़?
जापानी बुख़ार के पीड़ितों के लिए कोई ख़ास इलाज नहीं है. ऐसे मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने के साथ-साथ, ऑक्सीज़न मास्क जैसी देखभाल उपलब्ध कराई जाती है.

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जापानी बुख़ार से कैसे बचा जा सकता है?
- जापानी बुख़ार से बचने के लिए शरीर को ढककर रखने वाले कपड़े पहनने चाहिए
- मच्छरदानी का उपयोग करना चाहिए
- जापानी इंसेफ़ेलाइटिस से बचाव के लिए एक वैक्सीन (जेईवी) मौजूद है जिसे अपने डॉक्टर की सलाह पर लिया जा सकता है
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