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राष्ट्रीय पार्टियों का घटता क़द | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी को इस बात का विश्वास नहीं है कि इस चुनाव में उनका गठबंधन पूर्ण बहुमत हासिल कर सकता है. भारत में गठबंधन सरकार का एक दशक पूरा हो रहा है. पाँच साल तक सरकार चला लेने के बाद डॉक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास मुस्कुराने के कई कारण हैं. शुरू के चार वर्षों तक भारत का विकास दर आठ प्रतिशत से भी ऊपर रहा है और अब भी वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की दूसरी सबसे तेज़ विकास करने वाली अर्थव्यवस्था है. लेकिन फिर भी कांग्रेस अपने पुराने ज़माने का फीका रूप ही रह गई है, क्योंकि इस पार्टी को 543 सदस्यीय लोकसभा में 25 साल पहले पूर्ण बहुमत मिला था. कांग्रेस का वर्तमान गठबंधन क्षेत्रीय पार्टियों की मदद पर टिका रहा जो फ़िलहाल सीटों के सख़्त मोल तोल में जुटे हुए हैं. दूसरी तरफ़ कांग्रेस की विरोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सहयोगी असल में दूर हो चुके हैं. भाजपा के पास 1998 के बाद पहली बार दक्षिण भारत के दो महत्वपूर्ण राज्यों आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में कोई भी सहयोगी पार्टी नहीं है. हाल में पूर्वी राज्य उड़ीसा में भाजपा की पुरानी सहयोगी बीजू जनता दल उससे अलग हो गई है. इसकी वजह कुछ हद तक पिछले साल राज्य में भाजपा के ज़रिए अल्पसंख्यकों के विरुद्ध चलाया जाने वाला हिंसक अभियान है. विशिष्ट समूह भारत में तीसरे मोर्चे का अनुभव संयुक्त मोर्चा के नाम से 1996 के मध्य के बाद दो बरसों तक रहा. इस सरकार में वाम दलों का बाहर से समर्थन था, बाक़ी इसमें क्षेत्रीय पार्टियों का बोल बाला था.
गंठबंधन की सरकार का नेतृत्व एचडी देवगौड़ा कर रहे थे जो कर्नाटक का मुख्यमंत्री पद छोड़ कर आए थे. वह ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सके क्योंकि बहुत से क्षेत्रीय महात्वाकांक्षी नेता अपने को देवगौड़ा से आगे देखते थे. भारत के राज्यों के आकार और आबादी को देखते हुए 'क्षेत्रीय' शब्द ग़लत संकेत दे सकता है. देश की सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की 19 करोड़ आबादी पूरे ब्राज़ील की आबादी के बराबर है. इस राज्य की मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री की दावेदार हो सकती हैं. वह महिला हैं और दलित भी हैं. यह दोनों समाजिक वर्ग राजनीतिक लामबंद और बैलट बॉक्स के ज़रिए सत्ता तक पहुंचने में समर्थ हैं. दक्षिण और पश्चिम के राज्यों के पास विदेश से व्यापार करने की अनुकूल परिस्थिति है और उन राज्यों के मुख्यमंत्री बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विश्व-बैंक से बड़ी आसानी के साथ बात कर सकते हैं. एन चंद्रबाबू नायडू 2004 में आंध्र प्रदेश में सत्ता से हाथ धो बैठे थे. ई-गवर्नेंस के सूत्रधार कहे जाने वाले नायडू राज्य की छोटी पार्टीयों से सहयोग बना कर किसानों और ग़रीबों तक पहुंचे. लेकिन कांग्रेस को डराने वाला यह 'प्रेत' भाजपा से अलग हो चुका है. भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे के फिर से उभरने में नायडू का शामिल होना सांकेतिक है. तीसरे मोर्चे की गुंजाइश को इस बात से आसानी के साथ बयान किया जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी ऐसी पार्टी नहीं दिखती है जो अपने आप में चुनाव जीतने का दम रखती हो. तीसरे मोर्चे की सारी पार्टियाँ राजनीति के विकेंद्रीकरण का समर्थन करती हैं. हाशिए के खिलाड़ी आम तौर पर ये लोग शहरी से ज़्यादा गाँव के मतदाताओं की ओर झुके हुए हैं. ये सुधार विरोधी नहीं हैं लेकिन वे बाज़ारी शक्तियों की बजाए नागरिक कल्याण से प्रेरित हैं. उनके विकास और उत्थान का मतलब है बड़ी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों का पतन.
उत्तर प्रदेश में पिछले आम चुनाव में कांग्रेस और भाजपा कुल मिला कर 80 लोक सभा सीटों में से सिर्फ़ 19 पर ही जीत हासिल कर सकी. कांग्रेस सिर्फ़ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे गंगा क्षेत्र बिहार और पश्चिम बंगाल में हाशिए पर है. दूसरी ओर भाजपा पूर्वी और ज़्यादातर दक्षिणी राज्यों में अपने बल पर एक ताक़त के रूप में उभरने में असफल रही. वर्ष 2004 के चुनावों में हार के बाद यह अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को अपने साथ रखने और नए सहयोगी बनाने की क्षमता भी खो चुकी है. चुनाव नज़दीक आ रहा है और इसके नतीजे पाँच चरणों के चुनाव के बाद 16 मई को आने वाले हैं और यह निश्चित लग रहा है कि भारत में एक बार फिर गठबंधन की सरकार बनने जा रही है. लेकिन हो सकता है कि लगाम कांग्रेस के हाथ से निकल जाए. हो सकता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के सहयोग वाली सरकार बने या इससे भी बुरा यह हो सकता है कि ये बाहर से किसी सरकार का समर्थन करें. इस तरह की व्यवस्था अस्थाई होगी. कांग्रेस को काफ़ी सीटों की उम्मीद है चाहे वह अपनी वर्तमान 153 सीटें न हासिल कर सके, जिससे कि वह चुनाव के बाद मोल-तोल कर सके लेकिन कांग्रेस को कम सीट मिलने का मतलब है क्षेत्रीय पार्टीयों के मोल तोल की शक्ति का बढ़ना. बहरहाल कुछ निश्चित तो नहीं है लेकिन रुझान साफ़ देखे जा सकते हैं. भारत में क्षेत्रीय पार्टियों ने पहले राष्ट्रीय पार्टियों को प्रमुख प्रदेशों में किनारे ला दिया. अब ये सत्ता में साझेदारी से आगे बढ़ कर सरकार का स्वरूप तय करना चाहते हैं. कम होती लोकप्रियता कांग्रेस पार्टी के पतन को 1980 के दशक से देखा जा सकता है. यह उस वक़्त सामने आया जब इसने निम्न वर्ग ख़ास तौर से अल्पसंख्यकों में अपनी लोकप्रियता खोनी शुरू की. और ऐसा इसलिए हुआ कि अल्पसंख्यकों ने ये महसूस किया कि कांग्रेस पार्टी उनके जान माल की सुरक्षा के बदले समझौते की राजनीति कर रही है. और इस पार्टी से उत्तर भारत के किसान और फिर दलित जिन्हें कभी 'अछूत' कहा जाता था उनसे अलग हो गए. हिंदी भाषी क्षेत्र के अलावा दूसरी क्षेत्रीय पार्टी अपनी अलग आवाज़ चाहती थी. गुजरात को छोड़ कर भाजपा भी कांग्रेस की ही तरह क्षेत्रीय भावनाओं को मुनासिब प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं कर सकी. अनुभव यह बताता है कि क्षेत्रीय पार्टियाँ सरकार को ठीक ढ़ंग से नहीं चला सकती. दो बड़ी पार्टियों की कमान दुरुस्त है क्योंकि उनके नेता पर पार्टी के किसी सदस्य ने कभी मुश्किल से ही उंगली उठाई है. इसके अलावा गंठबंधन समझौते से चलता है न कि दबाव से. भारत में केंद्र सरकार राज्य सरकारों के सामने आर्थिक से लेकिर सांस्कृतिक हर स्तर पर ज़्यादा ही देने पर विवश हुई है. बहुत सी क्षेत्रीय नेता रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय पर 1996 से 2004 तक रही हैं. आगे भी अगर इस प्रकार का कोई गठबंधन आता है तो वह कांग्रेस से ऐसी डील कर सकता है. इससे किसी प्रकार की मुहिमबाज़ी पर लगाम कसी जा सकती है. इस प्रकार के किसी भी गठबंधन की अपनी अवधि पूरा करने की उम्मीद कम होती है, जिससे भारतीय राजनीति में नई जगह बनती नज़र आती है. वीपी सिंह के साथ यही मामला रहा था जो 1989-90 के दौरान प्रधानमंत्री थे और उन्होंने सरकारी नौकरियों में बहाली की नई परिभाषा दी थी. सुनने में यह अजीब लग सकता है लेकिन अल्पकालीन सरकारें कुछ ऐसी नई चीज़ शुरू कर सकती हैं जो भारतीय राजनीति पर अपना अमिट निशान छोड़ जाएं. विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र हो सकता है कि बड़े बदलाव के मुहाने पर है. सिर्फ़ मतदाता ही बता सकते हैं कि क्षेत्रीय खिलाड़ी अंतिम हंसी तो नहीं हंसने वाले हैं. |
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