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'तालेबान को आईएसआई से सीधी मदद' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के प्रमुख अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमरीकी अधिकारियों के हवाले से ख़बर दी है कि अफ़ग़ानिस्तान में हमलों के लिए तालेबान को पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी इंटर इंटेलिजेंस सर्विसेस (आईएसआई) से अभी भी सीधे सहयोग मिल रहा है. अख़बार ने बिना नाम प्रकाशित किए अमरीकी सरकार के अधिकारियों के हवाले से कहा है कि तालेबान को आईएसआई से न केवल हथियार और पैसे मिलते हैं बल्कि तालेबान कमांडर अमरीकी फ़ौजों पर हमलों की रणनीति भी आईएसआई के साथ मिलकर बनाते हैं. अख़बार का कहना है कि इस काम में आईएसआई की गोपनीय एस विंग लगी हुई है. इस ख़बर पर प्रतिक्रिया पूछे जाने पर पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर अथर अब्बास ने बीबीसी से कहा है कि वे इस ख़बर की पुष्टि और इनकार की बात दूर इस पर टिप्पणी भी नहीं करना चाहते. उनका कहना है कि ये ख़बर सूत्रों के हवाले से अधिकारियों के नाम प्रकाशित किए बिना छापी गई है और ऐसे में इस पर वे टिप्पणी नहीं करेंगे. बीबीसी के पाकिस्तान संपादक आमिर अहमद ख़ान का कहना है कि अमरीकी अधिकारियों का यह आरोप नया नहीं है लेकिन जब-जब यह बात उभरती है तो यह ज़ाहिर होता है कि उस समय पाकिस्तान और अमरीका के बीच रिश्ते कैसे चल रहे हैं. सहायता अख़बार का कहना है कि तालेबान और दूसरे चरमपंथी गुटों और आईएसआई के बीच संबंध जारी रहने का पता कम से कम छह अमरीकी और पाकिस्तानी अधिकारियों से हुई बातचीत के बाद चला है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने ये बातचीत वॉशिंगटन और इस्लामाबाद में की है. अख़बार का कहना है कि सभी अधिकारियों ने अपना नाम ज़ाहिर न करने का अनुरोध किया क्योंकि वे गोपनीय और संवेदनशील ख़ुफ़िया सूचना के बारे में बात कर रहे थे.
इन अधिकारियों से बातचीत के आधार पर अख़बार ने कहा है कि आईएसआई के अधिकारी और तालेबानी कमांडर नियमित रुप से मिलते हैं और यह चर्चा करते हैं कि अफ़ग़ान चुनाव से पहले हमले तेज़ करना है या क़दम वापस खींचने हैं. इस ख़बर में कहा गया है कि इन गतिविधियों में आईएसआई के मंझोले अधिकारी ही शामिल हैं और आला अधिकारी इससे जुड़े हुए नहीं हैं. वैसे अमरीकी अधिकारी पिछले एक साल से यह शिकायत कर रहे हैं कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी तालेबान को मदद कर रही है लेकिन इस बात सबूत मिले हैं कि चरमपंथी संगठनों को कई स्तरों पर सहयोग मिल रहा है. पाकिस्तान के अधिकारियों ने अख़बार से कहा है कि उनके पास इसकी पुख़्ता जानकारी है हालांकि उन्होंने इस बात से इनकार किया कि इससे विद्रोह मज़बूत हो रहा है. अख़बार के अनुसार अमरीकी अधिकारियों का भी मानना है कि इस्लामाबाद के अधिकारियों का इसमें शामिल होना संभव नहीं दिखता. वैसे पाकिस्तान की सरकार और सेना दोनों सार्वजनिक तौर पर चरमपंथियों के साथ किसी भी तरह के संबंधों से इनकार करते हैं. पुराना आरोप बीबीसी के पाकिस्तान संपादक आमिर अहमद ख़ान का कहना है कि अमरीकी अधिकारी पहले से ही कहते रहे हैं कि उन्हें आईएसआई और अल-क़ायदा में कोई फ़र्क नज़र नहीं आता. उनका कहना है कि ऐसा कहने से यही ज़ाहिर होता रहा है कि अमरीकी अधिकारियों को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी पर भरोसा नहीं है. लेकिन यह बात भी सही है कि बाद में अमरीका और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ने मिलकर काम किया और कई अहम चरमपंथी नेताओं को गिरफ़्तार करके ग्वांतानामो बे और बगराम के बंदीगृहों तक भेजा गया. उनके अनुसार इस तरह की बात फिर से निकले तो यह पता चलता है कि अमरीका और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी के संबंध इस समय कैसे चल रहे हैं. उनका कहना है, "अमरीका अब तक तालेबान के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान चलाता रहा है और उनको मुख्य राजनीतिक धारा से जोड़ने की कोशिश नहीं हुई थी लेकिन अब जाकर ओबामा प्रशासन ने इस दिशा में सोचना शुरु किया है." 'एस विंग' रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि काबुल स्थित भारतीय दूतावास में हमले की योजना भी 'एस विंग' ने बनाई थी. आईएसआई की जिस गोपनीय शाखा 'एस विंग' का ज़िक्र न्यूयॉर्क टाइम्स ने किया है उसके बारे में पाकिस्तान मामलों के जानकार सुशांत सरीन का कहना है कि 'एस विंग' कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान में जितने भी बुरे कार्य होते हैं वो उसके ज़िम्मे होते हैं. उनका कहना है कि यह कहना कि तालेबान को सहयोग देने में आला अधिकारी शामिल नहीं है और इसमें सिर्फ़ मंझोले और छोटे अधिकारी भी हैं, हो सकता है कि बड़े लोगों को बचाने का एक तरीक़ा हो. उनका कहना है कि एस संभावना यह भी है कि आईएसआई के भीतर व्यवस्था एकदम चरमरा गई है. बीबीसी से हुई बातचीत में सुशांत सरीन ने कहा, "एस विंग की कार्रवाइयाँ इतने बड़े स्तर पर होती हैं कि ऐसा संभव ही नहीं दिखता कि वह बड़े अधिकारियों की सहमति के बिना अमल में लाई जा सकें." उनका मानना है कि बहुत संभव है कि इसमें ऊपर से नीचे तक सभी लोग शामिल हों. |
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