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फ़ारुक़ अब्दुल्ला से एक मुलाक़ात | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इस बार हमारे मेहमान हैं कश्मीर ही नहीं देश की चर्चित राजनीतिक हस्ती फ़ारुक़ अब्दुल्ला. कश्मीर में आपका इतना लंबा सियासी सफ़र रहा है. कैसा अनुभव रहा आपका? सियासत अज़ीब चीज़ है. कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि ये ऐसा जरिया है कि इंसान बहुत करना चाहता है, लेकिन इतने दबाव और खिंचाई है कि बहुत ज़्यादा नहीं कर सकता. कहीं ये कश्मीरी लक्षण तो नहीं है? नहीं, ऐसा नहीं है. मैं तथ्यात्मक बात कह रहा हूँ. मैं मूल रूप से डॉक्टर हूँ. डॉक्टर अगर किसी मरीज को ठीक करता है तो वह कभी नहीं भूलता. लेकिन सियासत में कुछ भी करो, लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं. आप हज़ार काम कर लीजिए, लेकिन दो काम नहीं कर सके हों तो लोग बस उन दो कामों पर ही अटके रहते हैं. आप पेशे से डॉक्टर हैं. आपने जयपुर के मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की. आपसे जुड़े तमाम किस्से हैं? बिल्कुल. आपने बहुत से किस्से सुने होंगे. अल्लाह का शुक्र है. जिस इंसान के किस्से होते हैं वही तो ज़िंदा रहता है. आपको राजनीति विरासत में मिली. लेकिन जब आप राजनीति में आए, ये सोचा समझा फ़ैसला था या हालात के चलते ऐसा हुआ? देखिए, मेरे वालिद बुजुर्ग थे. मैंने देखा कि दिल्ली से संपर्क बहुत ज़रूरी है. जब मैं 1975 में विलायत से वापस लौटा तो मैंने बहुत कोशिश की मैं सांसद बनूँ. लेकिन क्योंकि मैं ब्रिटिश नागरिक था, इसलिए ऐसा नहीं हो सका. फिर मोरारजी देसाई की सरकार ने मुझे भारतीय नागरिकता दी और मैं 1980 में पहली बार सांसद बना. मैंने दिल्ली और कश्मीर के बीच की दूरियों को खत्म करने की भरपूर कोशिश की. लेकिन चापलूसों की मंडली बहुत कुछ तबाह कर देती है. इतिहास बताता है कि तमाम रजवाड़े चापलूसों की मंडली से बर्बाद हो गए. जब आप इंग्लैंड में थे तो क्या सोच कर भारत वापस आए. क्या कोई ख़ास योजना थी? नहीं. ऐसी कोई बात नहीं थी. वालिद बुजुर्ग हो चुके थे. वो सबको नहीं सुन सकते थे. मैंने सोचा कि मैं उन तक वो बातें पहुँचाऊँ जो दूसरे कहने से डरते थे. आपके पिता शेर-ए-कश्मीर के नाम से जाने जाते थे. बतौर पिता आपको उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत क्या लगती थी? देखिए, वो बच्चों से प्यार ज़रूर करते थे, लेकिन बतौर पिता उनके पास बहुत कम वक़्त था. कई साल उन्होंने जेलों में काटे. मूल रूप से मां ने ही हमारी परवरिश की है. वो साफ तरीक़े से अपनी बात कहते थे. उनके प्रशासकीय फ़ैसले बहुत ज़बर्दस्त होते थे. वो सबको धैर्यपूर्वक सुनते थे और सोच विचार के बाद फ़ैसला देते थे. वो फ़ैसला सुनाते हुए डरते नहीं थे. वो कौन सी ख़ासियतें हैं जो आप चाहते कि आपमें भी होती?
मैंने सोचा था कि मैं अपने बच्चों को भरपूर प्यार दूँगा. जब तक मैं डॉक्टर था तब तक ये आसान रहा. लेकिन जब सियासत में आया तो मैं भी बच्चों से दूर हो गया. मैं अधिकाँश समय घर से बाहर रहता था. उनको उनकी मां ने ही ज़्यादा देखा है. तो आपको दुख है कि आप बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे सके? बिल्कुल. मुझे इसका बहुत दुख है. अब मैं इसकी भरपाई कर रहा हूँ. पिछले छह साल में मैंने उनके साथ खूब समय बिताया है. मैं अपने पोते-पोतियों के साथ बातें करता हूँ. अल्लाह का शुक्र है कि उसने मुझे उनके साथ होने का मौक़ा दिया. जिस घर में आप बड़े हुए थे, उसकी कुछ यादें हैं आपके पास? सोबरो में हमारा बहुत बड़ा घर था. बहुत बड़ा किचन था. सर्दियों में हम पैट्रोमैक्स और लालटेन जलाया करते थे. बुखारी से कमरा गरम किया करते थे. मकान में क़रीब 20 कमरे थे और हम बुखारियां जलाकर दो कमरों में रहते थे. तब बर्फ भी खूब पड़ती थी. मैं बहुत बर्फ खाता था और पिता से मार भी पड़ती थी. बीते वक़्त की बातें बहुत खूबसूरत होती हैं. आपको आज की चीज़ ज़्यादा अच्छी लगती है कि पुरानी बातें? वो जमाना ज़्यादा ईमानदार था. उस जमाने में आप जो चीज़ खरीदते थे वो असल होती थी. आज इसका भरोसा नहीं है. आप तेल खरीदते थे तो उसमें मिलावट नहीं होती थी. लेकिन कुछ चीज़ें अच्छी भी तो हुई हैं. सड़कें बन गईं, जहाज बड़े हो गए. तरह-तरह की गाड़ियाँ? बिल्कुल. मैं मानता हूँ. बिजली आ गई, सड़कें बन गई. लेकिन उस वक़्त की सच्चाई गायब हो गई. मतलबी ज़िंदगी बढ़ गई है. जमाना बदल गया. हम भी बदल गए. फ़ारुक़ साहब कश्मीरियत की बहुत बात होती है. आपके लिए कश्मीरियत क्या है? देखिए, कश्मीरियत का मक़सद है हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हम सब हैं भाई-भाई. हममें कभी फर्क नहीं था. जब मैं पढ़ता था तो मैंने कभी परवाह नहीं की कि आप हिंदू हैं, सिख हैं या ईसाई. जब मैं पढ़ता तो मेरा एक दोस्त हिंदू था. दोपहर को हम उसके घर में खाना खाने बैठे. उस जमाने में ब्राह्मण रसोई की चौखट को गाय के गोबर से पोतते थे. मुझे इस बात का पता नहीं था. मेरे दोस्त की मां ने मुझे खाना चौखट के इस तरफ दिया. फिर मैंने उनसे पूछा कि आपके लड़के में और मुझमें क्या फ़र्क है. तो उन्होंने मुझे अंदर खाना खिलाया. बचपन में कैसे थे आप? मैं बहुत शैतान था. मैं मेवा चुराने के लिए दरख्तों पर चढ़ जाता था. स्कूल से भाग जाता था. मां मेरे नौकर को मेरे साथ भेजती थी. वो मार-मार कर मुझे स्कूल ले जाता था. मैंने वालिद से भी बहुत मार खाई है. जब मैं दसवीं में पढ़ता था तो उन्होंने मुझे सिगरेट पीते देखा तो बहुत पिटाई की. उसके बाद मैंने कभी सिगरेट नहीं छुई. मुझे सिनेमा देखने का बहुत शौक था. रीगल सिनेमा में रात को अंग्रेज़ी फ़िल्में लगती थी. एक दिन पिता रात को जल्दी आ गए. उन्होंने मां से पूछा कि फ़ारूख़ कहाँ है. फिर मुझे वालिद से बहुत मार पड़ी. तब धार्मिक फ़िल्में बहुत आया करती थीं, मुझे वो बहुत अच्छी लगती थी. नारद मुनि का रोल मुझे अच्छा लगता था. आज तो हर तरफ नारद मुनि भरे पड़े हैं. आपकी छवि बहुत मेहनती और जुनून वाले इंसान की है. कहाँ से आती है ये ऊर्जा? कुछ अल्लाह की मेहरबानी है और डॉक्टरी ने मुझे सिखाया है कि वही तुम्हारे पास आएगा जिसको दर्द होगा. सुनने से ही उसका दर्द आधा हो जाएगा. आप शुरू में ही उस पर चढ़ जाओ तो उसकी हमदर्दी कैसे ले पाओगे. आपने कभी अपने बच्चों पर हाथ उठाया है? नहीं. अल्लाह का शुक्र है. कभी नौबत ही नहीं आई. मेरी बेग़म ने उनकी बहुत अच्छी परवरिश की. उन्हें पैसे को खर्च करने का, ज़िंदगी को जीने का तरीक़ा बताया. आपको उमर अब्दुल्ला की सबसे अच्छी बात क्या लगती है? मुझे उसकी सबसे अच्छी बात ये लगती है कि वो सब कुछ साफ़-साफ़ और मुँह पर बोल देता है. फ़ारुक़ अब्दुल्ला किसी को नाराज़ नहीं करना चाहता. उमर में ये नहीं है. वो सीधी बात करता है. वो दुनिया को समझता है. वो बहुत तैयारी के साथ काम करता है. आपकी छवि आकर्षक पुरुष की थी. उमर अब्दुल्ला भी हैंडसम हैं, लेकिन आपका व्यक्तित्व कुछ अलग है? मुझमें और उसमें एक फर्क़ है कि उसकी बीवी जनरल की बेटी है, मजाल है कि उसकी आँख कहीं और उठे. मेरी बीवी अंग्रेज़ है और मैं महिलाओं के बीच खूब उठता-बैठता हूँ. आप दिल से बहुत रोमांटिक हैं? देखिए, रोमांस ज़िंदगी के लिए बहुत ज़रूरी है. ज़िंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या खाक जीया करते हैं. एक ज़माने में बहुत किस्से थे आपके और कुछ अभिनेत्रियों के बारे में. लेकिन सच में कितने लोगों से आपका नाता था? मेरा बहुत अभिनेत्रियों के साथ नाम जोड़ा गया. अब मैं सबसे दूर रहना ही पसंद करता हूं. जिस जमाने में पढ़ा करता था उसमें अभिनेताओं में दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद थे तो अभिनेत्रियों में नर्गिस, मीना कुमारी, नूतन, निम्मी और मधुबाला थी. स्कूली छात्र के रूप में मुझे मधुबाला से प्यार था. वो कमाल की खूबसूरत थी. हम अभिनेताओं को नकल करने की कोशिश किया करते थे. आज के दौर में करिश्मा, करीना ने बहुत अच्छा काम किया और कर रही हैं. ब्लैक में रानी मुखर्जी ने कितना अच्छा अभिनय किया. रानी मुखर्जी के साथ मुझे टेलीविज़न पर बात करने का मौक़ा मिला. मैं शाहरुख़ और सलमान से भी मिला हूँ. दोनों बेहतरीन अभिनेता और इंसान हैं. आपको आजकल की अभिनेत्रियों को डेट पर ले जाने का मौक़ा मिले तो किसे ले जाना चाहेंगे? आजकल तो सभी अच्छी अभिनेत्रियां हैं. लेकिन डेट का सवाल ही नहीं है. मैं इन्हें स्क्रीन पर देखकर ही खुश हूँ. आपका फेवरिट पासटाइम क्या है? मेरा फेवरिट पासटाइम गोल्फ़ और संगीत है. मुझे संगीत बहुत पसंद है, चाहे घर में, गाड़ी में. कभी-कभी खुद भी गा लेता हूँ. चुनाव की घोषणा से पहले मैं गिटार सीख रहा था. गिटार के साथ ये फायदा है जब कभी इंसान उदास हो तो गिटार बजाने से मन कुछ हल्का हो जाता है. बचपन में मैंने कोशिश की थी. लेकिन मेरे वालिद ने कहा कि तुम्हें क्या गवैया बनना है. मैं जब भी किसी स्कूल में जाता हूँ या मैंने जब किसी स्कूल को सांसद फंड से पैसा दिया हो तो मैं उनसे ज़रूर कहता हूँ कि बच्चों को संगीत ज़रूर सिखाओ. देखिए सारंगी हिंदुस्तान का सबसे अच्छा वाद्ययंत्र है लेकिन अब ग़ायब हो रहा है. ‘उमराव जान’ में देखिए सारंगी का कमाल. आपकी पसंदीदा फ़िल्में? मुझे ‘उमराव जान’ के अलावा ‘ब्लैक’ बहुत पसंद आई. मैं सिंग इज किंग देखना चाहता हूँ. मैंने जोधा अकबर भी देखी. कलाकारों ने बहुत शानदार अभिनय किया है. गाने भी बहुत अच्छे हैं. एआर रहमान का संगीत पसंद है आपको? पसंद है. पहले-पहले तो बहुत पसंद आया. लेकिन फिर इसमें कुछ भटकाव सा दिखा. उम्मीद करता हूँ कि इसमें फिर संतुलन दिखेगा. जब आप बहुत उदास होते हैं तो क्या करते हैं? जब कभी मैं उदास होता हूँ तो गाड़ी लेकर निकल जाता हूँ और कुदरत के नजारों को देखता हूँ. कभी डल झील की तरफ कभी पहाड़ की तरफ. हल्का-हल्का संगीत बजता रहता है और मूड ठीक हो जाता है. एक जमाने में आप गाड़ी तेज़ चलाने के लिए जाने जाते थे? मैं आज भी गाड़ी तेज़ चलाता हूँ. यहाँ की सड़कें तो ऐसी हैं नहीं. लेकिन यूरोप में मैं आज भी 120 किमी प्रति घंटे से अधिक की स्पीड से चलता हूँ. मुझे मोटरसाइकिल का बहुत शौक है. गाड़ी उमर अब्दुल्ला को भी चलाने का शौक है. कोई राजनेता जिससे आप बहुत प्रभावित हों या जिसकी प्रशंसा करते हों? देखिए, गांधी तो दुनिया में क्रांति के लिए जाने ही जाते हैं. फिर सीमांत गांधी की लड़ाई, जीवन के आख़िरी दिन तक लड़ाई. आज के नेताओं में मैं वाजपेयी जी का आदर करता हूँ. आरएसएस से होने के बावजूद वो हिंदुस्तान को पहचानते हैं. वो ऐसे शख्स हैं जो मानते हैं कि देश की गाड़ी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी मिलकर खींच सकते हैं. और उनके हिंदी में भाषण तो कमाल के होते हैं. जननेता होना एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है? हाँ, बिल्कुल. आपका दिल बहुत कुछ करना चाहता है. लेकिन जंजीरें आपको ये सब नहीं करने देती. फ़ारुक़ अब्दुल्ला को खाने का शौक है? मुझे खाने का उतना शौक नहीं है जितना मेरे वालिद को था. मुझे शुरू से ही साधारण खाना पसंद है. मेरे भाई तारिक़ को भी खाने का खूब शौक था. मुझे टमाटर, बैंगन, पालक की सब्जी, परमल, लौकी पसंद है. शाकाहारी खाना मुझे बहुत पसंद है. कुछ बनाते भी हैं आप? हाँ, बैगन की करी मैं खूब बनाता हूँ. ये आसान है. आलू की करी भी बना लेता हूँ. क्रिकेट का शौक है? मुझे क्रिकेट देखने का शौक है. पहले सिर्फ़ टेस्ट मैच खेले जाते थे और पाँच दिन लोग बोर हो जाते थे. अभी आईपीएल शुरू हुआ है. पचास-पचास ओवर ने तो क्रांति लाई ही थी. ट्वेंटी-ट्वेंटी ने सब कुछ बदल दिया है. आईपीएल के दौरान सड़कें ऐसे खाली होती थीं, जैसे कभी रामायण देखने के दौरान होती थीं. आपके मुताबिक सच्चा प्यार क्या होता है? मैं समझता हूँ कि जिस शख्स के साथ आप रहते हैं, उसे चाहते हैं जिसे देखकर आपका दिल धड़के, बेचैन रहे वही प्यार है. असली प्यार वो है जब जिसे आप चाहते हैं वो आपके पास न हो और आप बेचैनी महसूस करें. आपका युवाओं के लिए संदेश? जो भी आपके सुनने वाले हैं उनसे कहना चाहूँगा कि जो भी करें, उसे ईमानदारी, लगन और सच्चाई के साथ करें. खुद भी जियो और दूसरों को भी जीने दो. खुद भी तरक्की करो लेकिन दूसरे की तरक्की को रोकने की कोशिश मत करो. प्यार करो लेकिन इस शर्त पर नहीं कि तुम्हें क्या मिलेगा. नफ़रत बोओगे, नफ़रत काटोगे, मोहब्बत बोओगे, मोहब्बत काटोगे. आप भविष्य के प्रति आशावादी हैं? मैं हमेशा आशावादी रहा हूँ. निराशावाद बर्बादी की निशानी है. अगर आपका लक्ष्य सही है तो आप उस तक पहुँच जाएँगे. आप खुद के बारे में क्या कहेंगे? मैं कहूँगा कि मैं इंसान हूँ. मुझमें भी दूसरे इंसानों की तरह कमियां और खूबियां हैं. मेरी अच्छाई ये है कि मैं ज़िंदगी को ज़िंदा देखना चाहता हूँ और किसी की नफ़रत हासिल नहीं करना चाहता. मुझ में कमी ये है कि मैं किसी को ना नहीं कह सकता. |
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