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महबूबा मुफ़्ती से एक मुलाक़ात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक मुलाक़ात में हमारी मेहमान हैं तेज़तर्रार, खरी-खरी कहने वाली और भारत की सियासत के जाने-पहचाने चेहरों में से एक महबूबा मुफ़्ती. वो जम्मू कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख नेताओं में से एक हैं. सबसे पहले, मैंने आपकी तारीफ़ में इतने कसीदे पढ़े. तो दरअसल आप कैसी हैं? मैं आपकी तरह आम इंसान हूँ. मेरा जन्म राजनीतिक परिवार में हुआ. इस कारण कुछ ऐसी बातें हैं जो मुझमें खुद-ब-खुद हैं. मैं बहुत खरी बात कहती हूँ और मुंह पर कहती हूँ. इसलिए शायद मेरी छवि कुछ ऐसी है. अगर आप राजनीति में नहीं होती तो क्या करतीं? अगर मैं राजनीति में नहीं होती तो आम घरेलू औरत होती. अपने माता-पिता और अपनी दो बेटियों के साथ खूब समय बिताती. मुझे बाहर घूमने का ज़्यादा शौक नहीं है. मुझे अपने परिवारवालों और रिश्तेदारों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है. शौक हो न हो, लेकिन राजनीति में तो खूब घूमना-फिरना पड़ता है? ये तो अब मेरी ड्यूटी हो गई है. मैं काम से जाती हूँ. लोगों से मिलना होता है. मुझे इससे अजीब किस्म की खुशी मिलती है. मुझे उनके काम करने में आनंद मिलता है. मुझे लगता है कि अपने जीवन में हम जो भी करें उससे अगर किसी का फायदा हो या उनका छोटा सा काम हो जाए तो ये बहुत संतोष देने वाला है. राजनेता तो लगभग हर जगह जाते हैं, कुछ मन से जाते हैं और कुछ दिखावे के लिए जाते हैं. आपके लिए लोगों से मेल-मिलाप क्या सामान्य सी बात है? ये अब होने लगा है, ऐसा नहीं है. मैंने ये अपने पिता से सीखा है. लोगों से मिलना-जुलना मुझे आम लगता है. औरतें मुझसे मिलने आती हैं, गले लगती हैं. राह चलते कोई युवा मिल जाता है और कहता है कि उन्हें क्रिकेट मैदान चाहिए, तो मुझे ये सब कुछ अब सामान्य सा लगता है. आपने सबसे पहले कब सोचा कि राजनीति आपकी कर्मभूमि होगी? मैंने शुरू से ऐसा नहीं सोचा था. वर्ष 1996 में कश्मीर के हालात बहुत खराब थे. जम्मू कश्मीर में चुनाव की योजना बनी. चर्चा ये चलने लगी कि मुझे विधानसभा क्षेत्र बीजवाड़ा से चुनाव लड़ाया जाए जोकि मेरा घर भी है, . मुफ़्ती साहब ने मुझसे चुनाव लड़ने के बारे में पूछा और मैंने हामी भर ली. हालाँकि तब मुझे अंदाज़ा नहीं था कि विधायक बनने का वाकई क्या मतलब होता है. मैं सोचती थी कि विधायक मौज करते हैं, लोग उनकी वाहवाही करते हैं. लेकिन जब मैं चुनाव में उतरी तो मुझे इसका अहसास हुआ. उस समय हालात बहुत खराब थे. उन हालात में मैं चुनाव में उतरी. शायद मुफ़्ती साहब ने कुछ अच्छे काम किए थे, जिस वजह से मैं जीत गई. आप मुफ़्ती साहब की बेटी हैं और अपनी सफलता का श्रेय आप उन्हें देती हैं. लेकिन क्या आप नहीं मानती कि अब युवा पीढ़ी में अधिकांश लोग मुफ़्ती साहब को बतौर आपके पिता के रूप में पहचानते हैं? नहीं मैं नहीं मानती कि लोग मुफ़्ती साहब को महबूबा के पिता के रूप में पहचानते हैं. क्योंकि मुफ़्ती साहब की शख्सियत बहुत बड़ी है. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में मुश्किल दौर में काम किया है. मैं ये नहीं कह रही कि लोग मुझे नहीं पहचानते, लेकिन मैं आज जो भी हूँ या जो कुछ भी कर रही हूँ उसके स्रोत मुफ़्ती साहब हैं. वो ईमानदार हैं, दोगले नहीं हैं. कश्मीर में किसी भी गाँव में चले जाइए. उन्होंने वहाँ के लिए कुछ न कुछ ज़रूर किया है. तो आपके प्रेरणास्रोत आपके पिता हैं. उसके बाद कौन है जिनसे आप सबसे अधिक प्रेरित हैं? देखिए पिता से प्रेरित होना स्वाभाविक है. लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि मैं सबसे अधिक किससे प्रभावित हूँ तो मैं कहूँगी इंदिरा जी से. मेरे पिता मुफ़्ती साहब कांग्रेस के अध्यक्ष थे. तब इंदिराजी का कश्मीर बहुत आना-जाना था. कश्मीर एक बड़ा मसला रहा है. मेरे लिए इंदिरा गांधी हिंदुस्तान थी. वो बहुत अच्छी शासक और राजनेता थीं. इंदिरा जी ने क़ानून का राज स्थापित किया. आज दंगे फ़साद हो रहे हैं. धर्मनिरपेक्षता नाममात्र की रह गई है. लेकिन इंदिरा जी के जमाने में ऐसा नहीं था. तब आप तो बहुत छोटी होंगी, लेकिन व्यक्ति के रूप में इंदिरा जी में ऐसी क्या बात थी जिसकी आप नकल करना चाहेंगी? नकल करने जैसी तो कोई बात नहीं थी. वैसे तो वो बहुत लंबी-चौड़ी नहीं थी, लेकिन भीतर से बहुत मज़बूत थीं. उनके इरादे पक्के थे और मुश्किल की घड़ी में वो ज़्यादा ताक़तवर बन जाती थी. मुझे बहुत सारे कॉम्पलीमेंट मिले हैं. कुछ लोग बंगाल से यहाँ घूमने के लिए आए थे और जब उन्होंने ये कहा कि आपको देखकर इंदिराजी की याद आती है तो मैं बहुत खुश हुई. तो क्या आप भी अंदर से इंदिराजी जैसी मज़बूत हैं. जो सोचती हैं वो करती हैं? देखिए, मैं दिखावा नहीं कर सकती. मैं जो हूँ वो हूँ. मेरे पिता तो कहते भी हैं कि मैं बहुत मुँहफट हूँ. आगे-पीछे नहीं देखती. व्यक्ति को विनम्र होना चाहिए. आत्मसम्मान होना चाहिए. जिन हालात में मैं हूँ, उसके लिए इरादों का पक्का होना बहुत ज़रूरी है. अगर मुझे कोई बात करनी हैं तो मैं खुल्लमखुल्ला कहूँगी कि मुझे ये करना है. राजनीति में पुरुषों का बोलबाला है. हालाँकि अभी सोनिया गांधी, मायावती जैसे बड़े नाम भी हैं, लेकिन क्या महिला होने के नाते आपको कुछ अजीब लगता है? मेरा मानना है कि जम्मू-कश्मीर के लोग औरतों को राजनीति में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. जब मैं राजनीति में आई तो किसी ने मुझे बहन के रूप में और किसी ने बेटी के रूप में देखा. तो मैं ये कहूँगी कि दूसरे राज्यों के मुक़ाबले जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की स्वीकार्यता ज़्यादा है. आपका फेवरिट पासटाइम क्या है? मेरे पास ज़्यादा समय तो होता नहीं है. लेकिन जब भी कुछ समय मिलता है मैं माता-पिता और बच्चों के पास बैठती हूँ. इसके अलावा मैं रोज शाम को एक घंटा टहलती हूँ. मुझे बहुत सफ़र करना पड़ता है तो मैं कुछ संगीत सुनती हूँ, किताबें पढ़ती हूँ. ख़ालिद हुसैनी की किताबें मुझे बहुत पसंद हैं. आपको किस तरह का संगीत पसंद है?
हर तरह का संगीत मुझे पसंद है. संगीत जो भी दिल को छू जाए. ग़ज़लें भी मुझे पसंद हैं. ‘वो कागज की कश्ती, बारिश का पानी’ काफ़ी पसंद है. आपने ‘सिंग इज़ किंग’ देखी है? नहीं, फ़िल्म तो नहीं देखी है, लेकिन इसके प्रोमो देखे हैं. ख़ासकर कॉमेडी में मुझे गोविंदा की फ़िल्में बहुत पसंद हैं. उनकी फ़िल्मों के नाम अजीबो-ग़रीब ज़रूर होते हैं, लेकिन फ़िल्में बहुत हंसी मज़ाक वाली होती हैं. आपको फ़िल्में देखने का शौक है? बचपन में बहुत फ़िल्में देखी हैं. स्कूल से सीधे सिनेमा हॉल पहुँच जाते थे और कहते थे कि हम मुफ़्ती साहब के बच्चे हैं. मेरी बहन साथ होती थी और हम बॉक्स में बैठकर फ़िल्में देखते थे. हाल ही में कोई फ़िल्म देखी है? नहीं. इन दिनों तो कोई फ़िल्म नहीं देखी है. मेरे छोटे भाई तसद्दुक हुसैन ने बतौर सिनेमेटोग्राफर ओंकारा की है. उनके लिए मैं फ़िल्म देखने गई थी. मुझे ओंकारा बहुत अच्छी लगी. हालाँकि उसके डायलॉग कुछ मुश्किल थे, लेकिन हो सकता है कि क्योंकि फ़िल्म मेरे भाई की थी इसलिए मुझे पूरी फ़िल्म अच्छी लगी. आपके पसंदीदा अभिनेता? गोविंदा के अलावा सभी ख़ान एक से बढ़कर एक हैं. सलमान ख़ान, शाहरुख़ ख़ान, सैफ़ अली ख़ान, आमिर ख़ान भी मुझे पसंद हैं. आप किसी ख़ान से मिली हैं? मैं किसी से नहीं मिली हूँ. हाँ दिल्ली में एक सम्मेलन के दौरान शाहरुख ज़रूर हमारे पास बैठे थे, लेकिन हमारी मुलाक़ात नहीं हुई. और पसंदीदा अभिनेत्री? सभी अभिनेत्रियां अच्छी हैं. लेकिन मैं ये कहना चाहूँगी कि उनकी अलग पहचान नहीं है. सब एक जैसी लगती हैं. पहले की अभिनेत्रियों हेमा मालिनी, जीनत अमान को उनकी अलग आवाज़, अभिनय से पहचाना जा सकता है. हाँ मौजूदा अभिनेताओं और अभिनेत्रियों में एक अच्छी बात ये है कि उन्हें फ़िल्मी दुनिया के बाहर की भी खूब जानकारी है. उन्हें करियर के अलावा अपने आसपास होने वाली चीज़ों में भी दिलचस्पी है. आपका पसंदीदा हॉट स्टार कौन है? ये काफ़ी मुश्किल सवाल है. जितने भी फ़िल्मी स्टार हैं सब पिद्दू जैसे हैं. हाँ अक्षय कुमार कुछ अच्छे हैं. आपकी पसंदीदा घूमने की जगह? मेरा ननिहाल. अनंतनाग के एक गांव आखरा नावपुरा. मैं वहीं पैदा हुई. मैंने जीवन का सबसे अच्छा वक़्त वहीं बिताया है. अगर मुझे मौक़ा मिले तो मैं सबसे ज़्यादा समय वहीं गुजारना चाहूँगी. आपकी दो बेटियाँ हैं. आपके बेटियों से कैसे रिश्ते हैं. आप कैसी मां हैं? बदकिस्मती से मैं सिंगल पैरेंट हूँ. मेरी बेटियाँ बहुत छोटी थीं तब से मैंने अकेले ही उनकी परवरिश की. जब तक मैं राजनीति में नहीं थी तब तक मैंने उन्हें खूब समय दिया. लेकिन राजनीति में आने के बाद मैं उन्हें बहुत समय नहीं दे पाई और इसके लिए कहीं न कहीं मैं खुद को ग़ुनाहगार पाती हूँ. तो क्या बेटियों को भी ऐसा ही लगता है कि मम्मी अधिक समय नहीं दे पाई? बिल्कुल. बेटियों इर्तिका, इल्तिजा को लगता है कि मैं उनके साथ रहूँ. वो मेरे साथ के लिए तरसती हैं. मुझे यही तकलीफ़ और दुख है कि बतौर माँ मैं शायद उनके साथ इंसाफ़ नहीं कर सकी. आपको किस किस्म का खाना पसंद है?
खाना मैं घर का पसंद करती हूँ. लेकिन बर्गर मुझे बहुत पसंद है, कभी-कभी पिज्ज़ा भी खा लेती हूँ. हालाँकि मुझे घूमने का बहुत शौक नहीं है, लेकिन मेरी बहन अमरीका में रहती है इसलिए जब भी वहाँ जाती हूँ तो बर्गर ज़रूर खाती हूँ. खाना बनाने का भी शौक है? पहले मैं थोड़ा बहुत खाना बना लेती थी. लेकिन अब मेरी बेटियाँ मेरे बनाए खाने से तौबा करती हैं. मैंने कुछ मर्तबा ऐसा खाना बनाया है कि मेरी बेटियाँ कहती हैं कि आप रसोई में मत जाइए. आपकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत वक़्त? फिर मैं कहूँगी कि मेरा ननिहाल में बिताया वक़्त. हालाँकि अब मेरे नाना-नानी नहीं हैं. मौसियों की शादी हो चुकी है. फिर भी मुझे जब कभी थकावट होती है तो कोशिश करती हूँ कि वहाँ जाऊँ और तरोताज़ा हो जाऊँ. आपके सबसे प्रिय लम्हे? शाम का वक़्त जब मैं टहलती हूँ. मैं टहलते-टहलते मोबाइल पर अपने दोस्तों से बात करती हूँ. राजनीति के अलावा अपने दोस्तों से खूब गप्पे मारती हूँ. आपकी नज़रों में महबूबा कौन हैं? असल बात तो ये है कि महबूबा जैसी दिखती है वैसी ही है. मैं खुद को बहुत ज़्यादा पसंद भी नहीं करती लेकिन नापसंद भी नहीं करती. कुछ पाने की इच्छा है? मैंने कभी इस बारे में नहीं सोचा. अभी मुझे भी उस चीज़ की तलाश है जिसे पाने की मेरी बहुत इच्छा हो. ज़िंदगी में किसी बात का खेद है? नहीं ऐसा कुछ नहीं है. छोटी-मोटी ग़लतियां तो हो जाती हैं. अगर उनको सही करने बैठे तो दोबारा जन्म लेना पड़ेगा. |
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