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रविवार, 22 जुलाई, 2007 को 01:38 GMT तक के समाचार
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एक मुलाक़ात: उमर अब्दुल्ला के साथ

उमर अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की विरासत संभाल चुके हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

एक मुलाक़ात में हमारे आज के मेहमान हैं एक ऐसी शख़्सियत जो भारत के जाने-माने राजनीतिक परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं.

हमेशा विवादों से घिरे रहने वाले ये शख्ख बहुत ख़ूबसूरत राज्य से आते हैं. इन्होंने एमबीए की पढ़ाई की है. लोग इन्हें बहुत ही फ़ैशनेबल युवा राजनीतिज्ञ की तरह देखते हैं.

ये बताइए जो इतना घुमा-फिराकर मैंने आपका परिचय दिया कि साफ़-सुथरे, एमबीए, जाने-माने राजनीतिक परिवार से ताल्लुक़ रखने वाले शख्ख हैं आप. इनमें से कौन सी पहचान को ख़ुद के सबसे क़रीब पाते हैं?

देखिए जहाँ तक फ़ैशनेबल होने वाली बात है ये ख़िताब तो आप सब ने मुझे दिया हुआ है जिसके लिए मैं आप सबका धन्यवाद देना चाहता हूँ. लेकिन जहाँ तक कपड़े पहनने वाली बात है तो मैं पहले से ही ऐसा था और सियासत में आने के बाद मैंने अपने को बदला नहीं. आपकी नज़र तब पड़ी जब मैं सियासत में आया. अपनी पढ़ाई का फ़ायदा मुझे सियासत में तो मिल ही जाता है लेकिन मेरा लक्ष्य राजनीति है. मेरा पेशा राजनीति है, मेरी रुचि राजनीति है, मेरा सब कुछ आज राजनीति के इर्द-गिर्द ही घूमता है.

वैसे आपके ख़ून में ही राजनीति है. आप शेख़ अब्दुल्ला के पोते हैं और फ़ारुक़ अब्दुल्ला के बेटे हैं. क्या आपने बचपन से ही सोचा था कि सियासत में आना है?

नहीं. बचपन से नहीं सोचा था. वैसे दादा और वालिद राजनीति में थे और उनको देखते हुए बड़ा हुआ. लेकिन ख़ुद के लिए सोचा था कि कुछ अलग करना है. वैसे लोग मेरे दिमाग में भरा करते थे कि आपको तो घूम फिरकर सियासत में ही आना है. लोग मेरे वालिद की मिसाल दिया करते थे कि वो तो मुल्क़ छोड़कर ही चले गए थे लेकिन वापस आए. मैं मानता नहीं था लेकिन उन लोगों की बात सही साबित हुई.

ये कैसे हुआ. आपने तो मुल्क़ भी नहीं छोड़ा. फिर कैसे इधर आए?

नहीं ऐसा नहीं था. मैंने निजी क्षेत्र में काम करना शुरू भी किया था और सोचा कि यहीं करियर भी बना लूँ. लेकिन फिर सोचा अगर इतना वक़्त मैं सियासत और लोगों की मदद में लगाऊंगा तो मुझे अधिक संतुष्टि होगी. निजी क्षेत्र में काम करके मुझे वो तसल्ली नहीं मिल रही थी जो मैं चाहता था. मैंने सोचा मेरे तज़ुर्बे और तालीम को क्यों न सियासत में इस्तेमाल करूँ और देखूँ लोगों को इसका कुछ फ़ायदा मिल सकता है या नहीं.

उमर अपनी पसंद का एक गाना बताएं.

देखिए मैं पुराने गाने पसंद करता हूँ इसलिए नए गाने पसंद करने वालों से मैं माफ़ी मांगना चाहता हूँ. एक पुराना गाना है ये वादा रहा...जो गुलमर्ग के मंदिर में फ़िल्माया गया था. ये गाना 'ये वादा रहा' फ़िल्म का ही है. मुझे ये गाना बहुत पसंद है.

कश्मीर में तो एक से एक मूवीज़ फिल्माई जाती थीं.

जी हां. हमें याद है कि जब हम पिकनिक पर जाया करते थे तो इस गाने को गाया करते थे.

तो थोड़ा गाकर बताइए.

इसकी उम्मीद तो आप मुझसे नहीं करिए. अगर गाना सुनना है तो आपने ग़लत अब्दुल्ला को पकड़ा है.

उमर अब्दुल्ला
साफगोई से बात करने वाले उमर परिवार के लिए पूरा वक़्त निकालते हैं

और भी फ़िल्में जैसे 'कश्मीर की कली' बनाई गईं वहाँ. उनका भी कोई गाना पसंद है आपको.

अगर आप मुझसे पूछेंगे कि कौन सा गाना किस फ़िल्म का है तो मैं नहीं बता पाऊंगा.

शम्मी कपूर का अलग अंदाज़ होता था.

कश्मीर पर जो फ़िल्में बनी हैं वो मेरे लिए राजेश खन्ना से अधिक जुड़ी हैं. शम्मी कपूर मेरे समय से थोड़ा पहले हुए हैं.

 मैंने हमेशा से कोशिश की है कि मैं अपनी पब्लिक और प्राइवेट लाइफ़ में फ़र्क रखूँ. मैं उनमें से नहीं हूँ जो अपनी पब्लिक लाइफ़ की वजह से प्राइवेट लाइफ़ के लिए वक़्त नहीं निकालते. अगर मैं अपने लिए वक़्त नहीं निकालूँगा तो बहुत दिक्कत हो जाएगी. मैं अपने बच्चों के लिए और परिवार के लिए वक़्त निकालता हूँ और इसके बाद जब मैं काम पर लौटता हूँ तो ज़्यादा अधिक फ़ोकस कर पाता हूँ.

राजेश खन्ना पसंद हैं आपको?

हाँ. उनकी जो फ़िल्में कश्मीर में बनीं वो मुझे बहुत पसंद हैं.

उमर अब्दुल्ला आप अपनी पर्सनल लाइफ़ और पब्लिक लाइफ़ में कैसे अंतर करते हैं? इसकी वजह से कैसी जिम्मेदारियाँ महसूस करते हैं?

देखिए जिम्मेदारियाँ तो हैं. लेकिन मैंने हमेशा से कोशिश की है कि मैं अपनी पब्लिक और प्राइवेट लाइफ़ में फ़र्क रखूँ. मैं उनमें से नहीं हूं जो अपनी पब्लिक लाइफ़ की वजह से प्राइवेट लाइफ़ के लिए वक़्त नहीं निकालते. अगर मैं अपने लिए वक़्त नहीं निकालूँगा तो बहुत दिक्कत हो जाएगी. मैं अपने बच्चों के लिए और परिवार के लिए वक़्त निकालता हूँ और इसके बाद जब मैं काम पर लौटता हूँ तो ज़्यादा अधिक फ़ोकस कर पाता हूँ.

बहुत साफ़गोई से बात करते हैं आप. लोग कहते हैं कि आप बहुत शालीन हैं, बहुत पढ़े-लिखे हैं. कहीं मिसफ़िट तो नहीं हैं सियासत के लिए.

नहीं. मिसफ़िट तो नहीं हूँ. अगर ऐसा होता तो लोग तीन बार संसद में चुनकर नहीं भेजते.

वैसे कुछ लोग ये भी कहते हैं कि लड़कियाँ आपको चुनकर भेजती हैं.

मैंने ये तो देखा नहीं है कि मुझे लड़कियाँ चुनती हैं या लड़के. लोग मुझे चुनकर संसद में भेजते हैं.

लड़कियों की अटेंशन से आपको ख़ुशी होती है या दिक्कत?

अगर लड़कियों की अटेंशन मेरे व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करती है तो मुझे दिक्कत होती है नहीं तो कोई परेशानी नहीं है. लेकिन जैसे खिलाड़ियों और फ़िल्म स्टारों को दिक्कत होती है वैसी कोई परेशानी मुझे नहीं होती. हम सियासतदानों को आज भी शक़ के नज़रिए से देखा जाता है. इन दिनों कुछ अधिक ही. कभी हम सवाल बेचते हैं तो कभी अपनी पत्नी के पासपोर्ट पर दूसरे को मुल्क़ के बाहर ले जाते हैं.

आपको ऐसा नही लगता कि आपकी अलग स्टाइल है, अलग पहचान है?

हर किसी का अपना अलग स्टाइल होता है. मेरा भी काम करने का अपना तरीका है. मैंने किसी की नक़ल नहीं की है. मेरी कोशिश रहती है कि मैं ख़ुद के काम को ईमानदारी से करूँ. इस कोशिश में मैं काफ़ी हद तक कामयाब भी हो चुका हूँ.

आप मिस करते हैं ख़ूबसूरत कश्मीर में फ़िल्म शूटिंग की कमी.

मिस करते हैं. हम सिर्फ़ फ़िल्म वालों को मिस नहीं करते हम टूरिस्टों को मिस करते हैं. हम उन सामान्य परिस्थितियों को मिस करते हैं जो हमने अपने वक़्त देखी है. मैं इस बात को मिस करता हूँ कि अब मैं गेट खोल कर साइकिल से श्रीनगर शहर का दौरा नहीं कर सकता जिस तरह बचपन में किया करता था. अब ये देखना पड़ता है कि हर मोड़ पर बगल में कौन खड़ा है. जब कोई मुझ से ये पूछता है कि आप कैसा कश्मीर चाहते हो तो मैं कहता हूँ कि मैं अपने बचपन वाला कश्मीर चाहता हूँ जहाँ लोग मज़हब और जात की पहचान छोड़ एक दूसरे के साथ रहा करते थे. मैं ऐसा कश्मीर चाहता हूँ जिसे महात्मा गाँधी ने उम्मीद की किरण कहा था जब पूरा देश जल रहा था. उम्मीद करते हैं कि ज़ल्द से ज़ल्द ऐसा कश्मीर देखने को मिलेगा.

आपके बचपन की कौन सी यादें हैं जो सोचकर आपको मज़ा आता है?

बहुत सी यादें हैं. मेरी माँ एक नर्सिंग होम चलाती थी जिसके स्टाफ़ के साथ हम पिकनिक पर जाया करते थे. दरिया के किनारे फल रखकर बैठा करते थे. गुलमर्ग के मैदान में डेज़ी के फ़ूलों की माला बनाते थे. ये छोटी-छोटी चीज़ें हम आज नहीं कर पाएंगे. लेकिन मैं चाहता हूँ कि हमारे बच्चे कभी इस तरह कर पाएं.

 हम सिर्फ़ फ़िल्म वालों को मिस नहीं करते हम टूरिस्टों को मिस करते हैं. हम उन सामान्य परिस्थितियों को मिस करते हैं जो हमने अपने वक़्त देखी है. मैं इस बात को मिस करता हूँ कि अब मैं गेट खोल कर साइकिल से श्रीनगर शहर का दौरा नहीं कर सकता जिस तरह बचपन में किया करता था. अब ये देखना पड़ता है कि हर मोड़ पर बगल में कौन खड़ा है. जब कोई मुझ से ये पूछता है कि आप कैसा कश्मीर चाहते हो तो मैं कहता हूँ कि मैं अपने बचपन वाला कश्मीर चाहता हूँ जहां लोग मज़हब और जात की पहचान छोड़ एक दूसरे के साथ रहा करते थे

और घर के बारे में कुछ बताएं.

घर तो वही है जो पहले था. आज भी हम उसी घर में रहते हैं जिसमें विलायत से आने के बाद रहा करते थे. घर की यादें तो बहुत हैं क्योंकि मैं और मेरी बहनें उसी घर में बड़े हुए. हर एक पेड़ में यादें समाई हुई हैं.

वैसे तो हर बच्चा शरारती होता है लेकिन आप कितने शरारती थे?

शरारती तो था. वो आप मेरे वालिद और माँ से पूछिए तो वो बताएंगे. लेकिन शरारत की हद नहीं पार करता था. मेरा मानना है कि हर बच्चे को शरारत करनी चाहिए लेकिन हद पार नहीं करनी चाहिए.

उमर अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं.

इतने बड़ी शख़्सियतों की बीच आप घिरे रहे. आप के दादा 'शेरे कश्मीर' कहे जाते थे. इन सबमें अपने को कहाँ पाते थे. कुछ याद है अपने दादा की?

ध्यान तो है. कहीं कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी. मैं तो उन्हें दादा की तरह देखता था. लेकिन उनके बारे में मैं जानता था कि वो बड़ी शख़्सियत थीं क्योंकि मैं जब उनके साथ बाहर निकलता था तो लोगों की प्रतिक्रिया देखा करता था. लेकिन कभी वो हमसे उस तरह पेश नहीं आते थे तो हम भी कभी परेशानी महसूस नहीं करते थे क्योंकि हम तो बच्चे थे.

वो प्यार करते थे आपको जैसे सब दादा किया करते हैं.

हाँ, प्यार किया करते थे. पिकनिक में ले जाते थे. जैसे हर दादा-दादी अपने बच्चे को किया करते हैं वैसे वो भी हमें प्यार किया करते थे.

ख़ासकर जब माँ-बाप डांटते-मारते हैं तो दादा-दादी बचाते हैं.

हमारा संयुक्त परिवार तो था नहीं. शाम के वक़्त हम उनके घर जाया करते थे. अगर दादा को ये पता चलता कि बाप ने सही बात के लिए डांटा है तो शायद और भी डांटते जैसे हम सही राह पर रहें.

स्कूल के दिनों में पढ़ने में सबसे अच्छा क्या लगता था.

ये पूछिए कि क्या पढ़ने का मन नहीं करता था. इनमें सबसे ऊपर था हिंदी, गणित और विज्ञान. और जब मुझे चुनने का मौक़ा मिला तो मैंने कॉमर्स लिया और वहीं से एमबीए की बात बनी.

पढ़ाई के अलावा किन चीज़ों में रुचि लेते थे?

मुझे बोर्डिंग में पढ़ने का मौक़ा मिला. मैंने पाँचवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई हिमाचल प्रदेश के लारेंस स्कूल से की. वहाँ हमें ख़ूब खेलने का मौक़ा मिला. साल के शुरू में हम क्रिकेट खेला करते थे. बैडमिंटन, फ़ुटबॉल, टेनिस, स्विमिंग, हॉकी सभी खेल खेलने का मौक़ा मिला. लेकिन अगर पूछें कि किस खेल में मास्टरी की तो ऐसा कोई खेल नहीं है.

और कौन सी भाषा बोलने में सहज हैं?

पहले तो अंग्रेज़ी बोलता था लेकिन हिंदी फ़िल्में देखने की वजह से और ज़्यादातर एक ही भाषा बोलते रहने की वजह से मैं हिंदुस्तानी भी बोलने लगा. मैं इसे हिंदी और उर्दू से अलग हिंदुस्तानी कहूंगा. वैसे अब कश्मीरी भाषा में भाषण करने में भी सहज हूँ. पहले ऐसा नहीं था. पहले ग़लतियाँ करता था. अभी भी हो जाती हैं. काफ़ी कुछ सीखा है मैंने.

हिंदी फ़िल्मों में कौन सी फ़िल्में पसंद हैं?

हैरानी की बात है ये कि मैं पुरानी फ़िल्मों के गाने पसंद करता हूँ लेकिन पुरानी फ़िल्में कम देखता हूँ. जो भी नई फ़िल्म आई होती है मैं उन्हें देखता हूँ.

सिनेमा हॉल जाते हैं?

हाँ जाता हूँ.

आख़िरी फ़िल्म कौन सी देखी है?

भेजा फ़्राई. ये उन टिपिकल हिंदी फ़िल्मों से अलग है जिसमें पेड़ के आस-पास नाचा गाया जाता है. मुझे पिक्चर देखकर मजा आया.

काफ़ी लेटेस्ट फ़िल्म देखी आपने?

मैं तो फ़िल्में देखता रहता हूँ.

उससे पहले कौन सी देखी?

उससे पहले 'डोर' नाम की एक फ़िल्म देखी थी डीवीडी पर. वो राजस्थान पर थी. मुझे फ़िल्म देखकर मजा आया. उससे पहले 'एकलव्य' देखी थी.

सारी नई फ़िल्में देखते हैं आप?

मैंने कहा था न कि मैं अपने लिए समय निकाल लेता हूँ.

आपने डॉन फ़िल्म देखी है?

डॉन देखी है. पुरानी और नई दोनों वाली. मुझे पुरानी वाली ज़्यादा पसंद आई.

गाने तो नई वाली के भी ठीक थे?

हाँ वो ठीक है. पुरानी वाली एक क्लासिक मूवी है.

और वो लगे रहो...

उसे तो आप मिस कर ही नहीं सकते. बनाने वाला भी एक कश्मीरी है विधु विनोद चोपड़ा. उनकी सारी फ़िल्में मैंने देखी हैं. चाहे वो मिशन कश्मीर हो, परणीता हो या मुन्नाभाई.

सारी फ़िल्मों के गाने भी बहुत अच्छे हैं. अच्छा ये बताइए जो आपकी बेगम हैं पायल वो आपका पहला प्यार हैं.

इन सवालों का जवाब मैं कहीं देता नहीं और न मैं यहाँ देने जा रहा हूँ. ये लव मैरिज थी.

दोनों की मुलाक़ात कब हुई.

हम दोनों ओबरॉय होटल में काम कर रहे थे. दोनों सेल्स और मार्केटिंग में थे.

क्या ये पहली नज़र का प्यार था.

नहीं ये पहली नज़र की नफ़रत थी. ऐसा पहले छह महीने तक रहा.

अगर आप इसे ग़ुस्ताख़ी न समझें तो ये नफ़रत, ये प्यार?

कभी मैंने इस पर अधिक विश्लेषण नहीं दिया. मैंने कहा ये हो गया तो हो गया. इसमें ज़्यादा जाने की ज़रूरत नहीं है.

 बहुत सी यादें हैं. मेरी माँ एक नर्सिंग होम चलाती थी जिसके स्टाफ़ के साथ हम पिकनिक पर जाया करते थे. दरिया के किनारे फल रखकर बैठा करते थे. गुलमर्ग के मैदान में डेज़ी के फ़ूलों की माला बनाते थे. ये छोटी-छोटी चीज़ें हम आज नहीं कर पाएंगे. लेकिन मैं चाहता हूँ कि हमारे बच्चे कभी इस तरह कर पाएं

आपके हिसाब से किसी भी संबंध में चाहे वो पति-पत्नी का हो या कोई और उसमें ऐसा कौन सा जज़्बा होता है जो संबंध को बनाए रखता है?

मेर हिसाब से दो चीज़ें हैं ट्रस्ट और कम्युनिकेशन. दोनों आपस में जुड़ी हुई हैं. अगर ट्रस्ट नहीं है तो कम्यूनिकेशन का कोई फ़ायदा नहीं और अगर कम्यनिकेशन नहीं है तो ट्रस्ट कैसे बनेगा. कोई भी बात कितनी भी कड़ुवी हो, बात की जानी चाहिए.

अपने बच्चों के साथ समय कैसे गुजारते हैं?

हम एक-दूसरे के साथ साइकिल चलाते हैं, स्विमिंग करते हैं, फ़ुटबॉल खेलते हैं. साल में एक-दो बार छुट्टी पर घूमने जाते हैं. मुझे वीडियो गेम पसंद है. उनके बहाने वीडियो गेम खेलता हूँ.

कितने बच्चे हैं आपके?

दो बेटे हैं मेरे. एक नौ साल का है और दूसरा आठ का है.

उमर अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला श्रीनगर से सांसद हैं

यहाँ घर में बहुत किताबें दिखाई दे रही हैं. लुडलुम से लेकर इतिहास की किताबों तक. तो क्या इतनी विविधता भरी किताबें पढ़ने का शौक़ है या कोई ख़ास किताबें.

नहीं मैं बहुत कुछ पढ़ लेता हूँ. इसके लिए मैं अपनी माँ का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने बहुत पहले से मेरे अंदर किताब पढ़ने का शौक़ पैदा किया. हमारे समय में टीवी पर एक चैनल दूरदर्शन ही आया करता था और किसान भाइयों के लिए 'कृषि दर्शन' कार्यक्रम आया करता था. हम उस कार्यक्रम को नहीं देखा करते थे. सिर्फ़ हफ़्ते के अंत में आने वाली फ़िल्में देखा करते थे और चित्रहार देखा करते थे. वीडियो गेम्स भी नहीं थे तो शाम को किताबें पढ़ा करते थे.

अच्छा ये बताइए जो 'कृषि दर्शन' कार्यक्रम है उसे कोई किसान देखता होगा.

मुझे ऐसा नहीं लगता. कितने किसानों के पास टीवी होगा. और उनके पास वक़्त कितना है इस तरह के कार्यक्रमों के लिए. हर रोज़ दो-तीन किसान तो आत्महत्या कर लेते हैं. कहाँ उनके पास पैसा है कि वो टीवी ख़रीदें और कहाँ उनके पास टाइम है जो वो कार्यक्रम देखें. हम राजनीतिज्ञ अपने को ख़ुश करने के लिए कहते हैं कि किसानों के लिए भी कार्यक्रम है और जिससे हम किसानों के पैरोकार कहलाएँ.

अगर आप राजनेता न होते और खिलाड़ी होते तो कौन सा खेल खेलते.

मैं खेलता नहीं गाड़ी चलाता. रैली ड्राइवर होता या फ़ॉर्मूला वन ड्राइवर होता. मेरे वालिद साहब हमेशा कहते हैं कि मैं बहुत तेज़ चलाता हूँ. हालांकि अपने बारे में वो भूलना पसंद करेंगे कि वो क्या करते थे क्या नहीं करते थे लेकिन मुझे हमेशा कहते हैं.

क्या चलाते हैं आप?

मैं दुपहिया भी चलाता हूँ लेकिन मैं मोटरकार ड्राइवर हूँ. ऑफ़ द रोड होकर चलता हूँ.

डर्ट ट्रैकिंग?

हाँ, डर्ट ट्रैकिंग.

कभी चोट नहीं लगी?

हर हफ़्ते ही कुछ न कुछ हो जाता है. अभी तक हड्डी नहीं टूटी है बस.

 मेर हिसाब से दो चीज़ें हैं ट्रस्ट और कम्युनिकेशन. दोनों आपस में जुड़ी हुई हैं. अगर ट्रस्ट नहीं है तो कम्यूनिकेशन का कोई फ़ायदा नहीं औऱ अगर कम्युनिकेशन नहीं है तो ट्रस्ट कैसे बनेगा. कोई भी बात कितनी भी कड़ुवी हो, बात की जानी चाहिए.

पिता जी की तो नहीं सुनते लेकिन बच्चे?

उनको तो अपने साथ ले जाता हूँ. उन्हें अभी दो पहिए पर नहीं उतारा है लेकिन आगे दो पहिए पर भी उतारूंगा.

रात को सोने से पहले किस किस्म का म्यूज़िक सुनना पसंद करेंगे आप?

कोई भी लाइट म्यूज़िक. वेस्टर्न, क्लासिकल, इंस्ट्रूमेंटल ज़्यादा. पुराने लाइट गाने. मुझे ऐबा पसंद है. मेरे लिए संगीत उन यादों की तरह है जिनके साथ मैं बड़ा हुआ. संगीत के साथ मैं अपने को जोड़ पाता हूँ. मुझे याद है कि 1977 में हम श्रीनगर से लद्दाख जा रहे थे. मेरे वालिद साहब गाड़ी चला रहे थे. हमने पूरे रास्ते ऐबा सुना था.

ऐबा का कौन सा गाना पसंद है.

सभी. शुरू से लेकर आख़िर तक.

फ़िल्म भी तो उन्हीं दिनों आई थी.

हाँ, मरे बच्चों की उसकी आदत पड़ गई है. मुझे मामा मिया.. पश्चिमी संगीत बहुत अच्छा लगता था. उस समय ऐबा का प्रशंसक होने पर आपको बहुत दुखी माना जाता था. जिसको ऐबा का कैसेट लेनी होती थी वो छुपकर एचएमवी से कैसेट ले जाता था और अगर कोई देख लेता था तो कहता था कि अरे इसे क्या हो गया है.

फ़िल्म अभिनेत्री कौन सी अच्छी लगती है?

इस सवाल का जवाब देने पर पहले मुझे परेशानी हो चुकी है. इसलिए मैं जवाब नहीं दे पाऊंगा.

क्या हीरोइन पीछे पड़ गई थी?

नहीं, मैंने सोचा कि जब मैं अगली बार उत्तर दूँगा तो कहीं किसी और हीरोइन का नाम न ले बैठूँ.

अच्छा तो आपको अस्थिर प्रवृत्ति का समझ लिया गया था.

हाँ कुछ उसी तरह की बात है. काजोल ने अच्छा काम किया है. रानी मुखर्जी ने ब्लैक में बढ़िया काम किया है. उसने अपने को सुधारा है.

ये प्रतिभावान अभिनेत्रियाँ आपको ख़ूबसूरत नहीं लगतीं?

नहीं ख़ूबसूरत भी हैं. बिना ख़ूबसूरती के तो आप टिक ही नहीं पाएंगे. आजकल तो दादी भी बहुत ख़ूबसूरत होती हैं. आजकल दादी के रोल भी मिस यूनिवर्स की तरह हो गए हैं.

आपके फ़ेवरेट स्टार?

बिना किसी संदेह कहूँगा आमिर ख़ान. चाहे वो हास्य भूमिका में हो या कॉलेज़ से तुरंत बाहर निकले लड़के का रोल हो. सबमें वो अच्छे लगते हैं.

और घूमना फिरना?

पसंद है. अपने काम और व्यस्तता के बाद जितना समय निकलता है उसमें घूम फिर भी लेता हूँ.

मनपसंद जगह?

कोई एक बताना तो मुश्किल है. एक जगह जहाँ बार-बार जाते हैं वो दुबई है. वहाँ सबके लिए कुछ-कुछ है. दुबई एक ऐसी जगह है जहाँ आप एक घंटे समुंदर में तैरो और दूसरे घंटे उनके इंडोर स्कींग स्लोप पर स्कींग करो. मुझे अभी तक दूसरी ऐसी जगह नहीं दिखी. और दो जगहें भी हैं जो मुझे और मेरी बीबी को अच्छी लगी. एक, मिस्र जहाँ हमें इतिहास को जानने के लिए नील नदी में सैर की. और, दूसरी जगह है दक्षिण अफ्रीका के 'क्रूगर नेशनल पार्क' में एनिमल सफ़ारी.

जो लोग राजनीति में आना चाहें उनके लिए आप क्या कहेंगे.

पहले वकालत करिए. एक चीफ़ जस्टिस थे जम्मू और कश्मीर के जो बाद में भारत के भी चीफ़ जस्टिस बने आदर्श सेन आनंद. उन्होंने मेरी माँ से कहा था कि इसे कॉमर्स की जगह वकालत कराओ. तब मैंने उनकी नहीं सुनी थी. मुझे इसका अफ़सोस है. इससे संविधान, क़ानून को समझने में मदद मिलती है.

बहस करनी भी आ जाती है?

आप पार्टियों के प्रवक्ताओं को देखें सब वकील हैं. एक के मुक़ाबले दूसरे वकील को लाना पड़ता है.

लेकिन वो मामले को अपनी तरह से घुमाते हैं?

यही तो सियासत है. यही तो स्पिन है. आपको हर चीज़ तीन सेकेंड की साउंड बाइट में कहनी पड़ती है.

 इच्छा यही है कि मैं जो कुछ भी करूँ ईमानदारी से करूँ. लोगों को कभी धोखे में न डालूँ. जब भी मुझे लगेगा मैं लोगों को धोखे में रख रहा हूँ उस दिन सियासत छोड़कर चला जाऊंगा.

आपके कमरे में अगली पीढ़ी के नेताओं की तस्वीरें लगी हुईं हैं. इसमें आप हैं, सचिन पायलट, राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रियंका गांधी हैं. सबसे स्मार्टली ड्रेस्ड कौन हैं इन सबमें से?

अरे साहब वो तो मैं ही हूँ. आप औरों की बात क्यों कर रहे हैं.

आपको तो हमने मान ही लिया.

अगर आप देखें तो इनमें से ज्योतिरादित्य और वरुण गांधी ने पारंपरिक कपड़े पहने हैं. ये बहुत पुरानी तस्वीर है. उस समय सचिन और राहुल राजनीति में नहीं आए थे.

मैं ऐसी तस्वीर कहीं और नहीं देखी जिसमें सभी हों. और प्रियंका गाँधी ऐसे जैकेट में.आपके अलावा आपको सबसे स्मार्ट कौन लग रहा है?

ज्योतिरादित्य. हमेशा वो बढ़िया कपड़े पहनते हैं. वो संसद में भी आते हैं तो उनके कुर्ते, पैजामे और जैकेट सब मैचिंग के होते हैं. उनका मुक़ाबला हम में से कोई नहीं कर सकता.

कोई इच्छा जो आप पूरी करना चाहते हों?

इच्छा यही है कि मैं जो कुछ भी करूँ ईमानदारी से करूँ. लोगों को कभी धोखे में न डालूँ. जब भी मुझे लगेगा मैं लोगों को धोखे में रख रहा हूँ उस दिन सियासत छोड़कर चला जाऊँगा.

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