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रविवार, 23 सितंबर, 2007 को 04:41 GMT तक के समाचार
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मिलिंद देवड़ा के साथ 'एक मुलाक़ात'

 मिलिंद देवड़ा
मिलिंद देवड़ा देश की राजनीति में विकास को मुख्य मुद्दा बनाना चाहते हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

एक मुलाक़ात में इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं युवा सांसद मिलिंद देवड़ा जो देखने में ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ बहुत अच्छे वक्ता भी हैं. मिलिंद से मेरी मुलाक़ात उनकी किशोरावस्था के दिनों में ही हो चुकी है. वो देश की सबसे धनी और समृद्ध लोगों के लोकसभा क्षेत्र दक्षिणी मुंबई से चुने गए हैं.

देश के सबसे युवा सांसद होने पर आपको कैसा लगता है. क्या कभी सोचा था कि राजनीति में आएंगे या कुछ और करने निकले थे और सांसद बन गए?

मैंने कभी सोचा नहीं था कि राजनीति में आउंगा. मेरी पढ़ाई पहले भारत में हुई और बाद में मैं बोस्टन पढ़ने गया. मैंने एक साल शिकागो में नौकरी भी की. भारत आया यहाँ भी कुछ निज़ी कंपनियों में काम किया. मैं देश के लिए कुछ करना चाहता था. मैंन सोचा था कि जब भी भारत लौटूंगा तो किसी न किसी तरह से देश की सेवा करूंगा. देश लौटने के बाद मैंने ‘स्पर्श’ नाम की एक संस्था बनाई और आज हम स्पर्श के माध्यम से मुंबई के 100 स्कूलों में मुफ़्त कंप्यूटर शिक्षा दे रहे हैं.

इस तरह से काम करते-करते मुझे पता चला कि स्थानीय स्तर पर कितनी समस्याएँ हैं. अभी आपने कहा कि दक्षिणी मुंबई में देश के सबसे अमीर लोग रहते हैं. लेकिन दक्षिणी मुंबई में शहरी ग़रीब लोगों की आबादी भी बहुत है. समस्याओं को देखकर लगा कि मुझे अपने काम को स्पर्श संस्था से आगे बढ़ाना चाहिए. इस तरह मेरी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी. मेरी पार्टी की अध्यक्षा ने मुझे 2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी से टिकट दिया और मैं दक्षिणी मुंबई से चुनाव में उतरा. मेरे घर से भी कभी दबाव नहीं था कि मैं राजनीति में जाऊं. मेरी मां का तो कहना था कि मैं राजनीति में न जाऊं. उनका कहना था कि राजनीति में जाकर निज़ी जीवन ख़राब हो जाएगा. कुछ हद तक उनका कहना सही भी है.

उन्होंने आपके पिता जी के अनुभवों से सीखा होगा. जिस तरह से उनका स्वभाव है उसे देखकर तो मुझे लगता है कि वो बहुत अच्छे पिता होंगे.

हाँ, वो बहुत अच्छे पिता हैं. बचपन से हम जब भी खाने पर बैठते थे तो कभी भी राजनीति की बातें नहीं करते थे. वो स्कूल, पढ़ाई और घर के व्यापार के बारे में बात करते थे. मेरे घर में राजनीति की बातें कम ही होती थीं. मेरे पिता राजनीति में आने से पहले एक व्यापारी थे और उसी तरह उन्होंने हमें भी बड़ा किया. मेरा बड़ा भाई राजनीति में नहीं है वो एक संगीतकार है. पिता जी उनको भी प्रोत्साहित करते हैं. लेकिन वो हमेशा कहते थे कि मिलिंद तुम कभी देश के लिए भी कुछ करना. तभी से मैं कुछ करना चाहता था. इसलिए मैं राजनीति में आया.

 मैं देश के लिए कुछ करना चाहता था. मैंन सोचा था कि जब भी भारत लौटूंगा तो किसी न किसी तरह से देश की सेवा करूंगा. देश लौटने के बाद मैंने ‘स्पर्श’ नाम की एक संस्था बनाई और आज हम स्पर्श के माध्यम से मुंबई के 100 स्कूलों में मुफ़्त कंप्यूटर शिक्षा दे रहे हैं.

जब आपकी उम्र के लड़के-लड़कियां पार्टी करते हैं, डांस करते हैं, मरीन ड्राइव पर घूमते हैं. उस समय आपको रैली निकालनी पड़ी. ये सबकुछ कैसा लगता था. ऐसा तो नहीं लगता था कि यार कहां फंस गए?

कभी-कभी लगता है कि कहां आ गया हूँ. मेरे दोस्त मुझे फ़िल्म के लिए कहते हैं लेकिन मेरा अगले दिन कुछ दूसरा कार्यक्रम होता है. व्यस्तता बहुत होती है. मुझे क्षेत्र में जाना होता है. लेकिन जो ज़िम्मेदारी मैंने ली है उसके लिए मुझे काफ़ी त्याग की ज़रूरत है और मैं करता हूँ. सांसद बनने के बाद पिछले तीन सालों में मुझे लोगों को जानने-समझने, विदेश-यात्रा करने और दूसरी चीज़ो को पास से देखने का जो मौका मिला उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ.

बलिदान और त्याग की बात तो ठीक है लेकिन कुछ फ़ायदा भी तो मिलता होगा. कुछ मज़ा और रोमांच भी तो आता होगा.

नहीं रोमांच जैसी कोई बात नहीं है. आज विदेश में भारत की छवि बहुत सकारात्मक है. जब कभी भारत के युवा सांसद प्रतिनिधि के रूप में विदेश भेजा जाता है तब बहुत अच्छा अनुभव होता है. मैंने ये देखा कि अगर आप कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं तो सभी अधिकारी और हर राजनीतिक दल के सांसद आपकी मदद करते हैं. मुझे लगता है कि सबसे अधिक प्रोत्साहन की बात तब होती है जब हम आम आदमी की मदद कर पाते हैं. मुझे एक बार एक टैक्सी ड्राइवर मिला और कहा कि हमारी संस्था स्पर्श की वजह से उसकी बच्ची कंप्यूटर और अंग्रेज़ी सीख रही है.

मैं मुबंई में रहा हूँ. मैं देखा है कि स्पर्श ने बहुत काम किया हुआ है. लेकिन जिसे हल्का रोमांच कहते हैं सांसद बनने पर वो भी महसूस होता होगा.

पिता जी को बचपन से राजनीति में देखा है. वो कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता, सांसद और महापौर रहे हैं. इसलिए शक्ति की वजह से जो आदर मिलता है उसे लेकर किसी तरह का रोमांच मेरे अंदर नहीं है. मेरा मानना है इस तरह की ताकत हमेशा नहीं रहती है. ये बदलती रहती है. मैं राजनीति में इस तरह का आदर हासिल करने नहीं आया. अगर कोई ऐसी अपेक्षाएं रखेगा तो अपने लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएगा.

आप जो कह रहे हैं वो बहुत ज्ञान की बात है. लेकिन अगर ईमानदारी से इसका पालन किया जा सके तो बहुत सी समस्याएं दूर की जा सकती हैं. आप अपनी पसंद का एक गाना बताएं.

मैं सच बताऊं तो मुझे आज के इंडीपॉप टाइप के गाने पसंद नहीं हैं. मुझे पुरानी फ़िल्मों के गाने बहुत अच्छे लगते हैं. एक फ़िल्म है ‘दो आँखें बारह हाथ’. उसका एक गाना है ए मालिक तेरे बंदे हम...

बचपन में किस चीज़ में सबसे अधिक रुचि किसमें होती थी.

बचपन में हमें गिटार सीखने भेजा जाता था. उस समय हमें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था. लेकिन जब मैं अमरीका गया तो गिटार बजाने लगा. आज तो मुझे गिटार बजाने का उतना समय नहीं मिलता. लेकिन संगीत में मेरी बहुत रुचि है. बहुत सुखद अनुभूति होती है संगीत सुनकर. बचपन से मैं जब कभी तनाव में होता था तो संगीत सुनता था और मुझे बहुत अच्छा लगता था.

बचपन में राजनीति को करियर के विकल्प के रूप में देखते थे.

अमरीका में प्रबंधन की पढ़ाई करते समय मैंने राजनीतिशास्त्र की कुछ कक्षाएं पढ़ी थीं. वैसे राजनीति शास्त्र और राजनीति में बहुत अंतर है. अपने पिता जी को मैंने कभी राजनेता के रूप में नहीं देखा. उन्हें हमेशा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखा. वो हमेशा सामाजिक गतिविधियों को ही राजनीति कहते थे. उन्होंने कभी राजनीति में भावनात्मक मुद्दों का सहारा नहीं लिया. आज मैं देखता हूं कि बहुत से राजनीतिक दल अपने फ़ायदे के लिए भावनात्मक मुद्दों को उठाते हैं. मेरे लिए राजनीति समाजसेवा है. इसलिए जब कभी मैं अपने लोकसभा क्षेत्र में जाता हूँ तो एक राजनेता की तरह बात नहीं करता बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह बात करता हूँ.

 अपने पिता जी को मैंने कभी राजनेता के रूप में नहीं देखा. उन्हें हमेशा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखा. वो हमेशा सामाजिक गतिविधियों को ही राजनीति कहते थे. उन्होंने कभी राजनीति में भावनात्मक मुद्दों का सहारा नहीं लिया. आज मैं देखता हूं कि बहुत से राजनीतिक दल अपने फ़ायदे के लिए भावनात्मक मुद्दों को उठाते हैं.

इस तरह से कितने दिन चल पाएगा.

यही दृष्टिकोण लेकर मैं चला हूँ. और मुझे लगता है कि अगर ऐसे ही काम किया जाए तो देश की तरक्की होगी. अगर हम पहले की तरह जाति-धर्म के मुद्दे पर ध्यान देते रहेंगे तो बहुत दिक्कत होगी.

आप जैसे कई युवा, उच्च शिक्षा प्राप्त लोग राजनीति में आ रहे हैं. वो सभी ये बात कहते हैं कि राजनीति में भावनात्मक मुद्दे नहीं उठाने चाहिए. लेकिन हमारे देश में कई तरह के लोग हैं उनकी अलग-अलग सोच है. उन्हें भावनात्मक रूप से साथ रखने की ज़रूरत है. तो इस तरह दूसरा तरीका अपनाकर कहीं युवा सांसद आम लोगों से कट तो नहीं जाएंगे.

हर राजनीतिक दल में ऐसे युवा सांसद हैं जो विकास की बात करते हैं. ये मिलकर काम करें तो बात बन सकती है. देखिए हमें विकास का काम भी करना है और अपने-अपने दलों में राजनीति भी करनी है. लोगों के बीच जाकर वोट भी लेने हैं. मुझे लगता है कि अगर हम लोगों के बीच जाएं और उनसे विकास की बात करें तो ऐसा नहीं है कि वोट नहीं मिलेगा. अपनी एक रणनीति और रवैया जनता के सामने रखेंगे कि देखिए मैं आपको नौकरी इस तरह से देना चाहता हूँ. आपके गांव का इस तरह से विकास करना चाहता हूँ. लोग बेवकूफ़ नहीं हैं. आपकी रणनीति कैसे लागू हो वो भी एक भावनात्मक मुद्दा हो सकता है.

आपने बोस्टन में पढ़ाई की है. बोस्टन और मुंबई में क्या अंतर देखने को मिला.

ठंडी तो बहुत थी वहां. बर्फ़ गिरती थी वहां. मेरे लिए जो सबसे बड़ी बात थी वो ये थी कि मैं पहली बार घर छोड़कर जा रहा था और वो भी अमरीका. पैसे की कभी-कभी दिक्कत हो जाती थी. दुनियाभर की विविधता देखने को मिली. मेरे जो दोस्त बने वो अलग-अलग देशों के हैं. एक अमरीका का है, एक पोलैंड का है.

सब 'का' का ही हैं कोई 'की' नहीं है क्या.

इस विविधता के माहौल में रहना भी एक चुनौती था. वहां रहकर मुझे बहुत सीखने और जानने को मिला.

वहां रहने, जानने या बसने का मन नहीं किया.

हां था वैसे. मैं वहां साढ़े तीन साल पढ़ा. फिर एक साल शिकागो नौकरी में था. लेकिन वहां इतने दिनों के रहने के बाद लगा कि वापस लौटना चाहिए. एक भावनात्मक लगाव था. मुझे शुरू से पता था कि मैं वापस लौटूंगा. मैं 1995 में वहां गया था.

सबसे ज़्यादा क्या याद आता था. मां का बनाया खाना या पड़ोस की लड़की.

घर का खाना. वहां का खाना खाकर घर बहुत याद आता था.

घर की कुछ खाने वाली चीज़ पास नहीं होती थी.

मेरे पास तो नहीं होती थी. लेकिन मेरा एक दोस्त था अमित शाह. उसका घर अमरीका के न्यूजर्सी में ही था. उसके घर से खाने का सामान आता रहता था.

मुंबई में आप बड़े हुए हो. मुंबई की याद नहीं आती थी?

मुंबई का प्रदूषण, यातायात, मरीन ड्राइव, चौपाटी, मेरे वो सभी दोस्त जो मुंबई में थे. वैसे मैं साल में एक-दो बार छुट्टियों के लिए मुंबई आता था. मैं अपने घर का आराम बहुत मिस करता था. अमरीका में सारे काम ख़ुद करने पड़ते थे. जब मैं एक महीने के लिए घर आता था तो ख़ूब आराम से रहता था.

अब तो आपका काफ़ी समय दिल्ली में भी ग़ुजरता होगा. दिल्ली और मुंबई में क्या अंतर पाते हैं?

सांसद बनने के पहले दो वर्षों में मैं जब संसद सत्र में हिस्सा लेने सोमवार को दिल्ली आता था तो बुधवार को ही लौटने का मन करने लगता था. मेरे पिता जी को दिल्ली पहुंचते ही मुंबई वापस लौटन का मन करने लगता है. अब मेरा मन दिल्ली में लगने लगा है. आज मैंने दिल्ली में कई दोस्त बना लिए हैं. लेकिन मुबई मेरी पहली पसंद है. मुंबई और दिल्ली में जो मैंने अंतर देखा वो ये हैं कि दिल्ली में वर्ग-चेतना (क्लास कंशसनेस) बहुत है. मुंबई में आम आदमी को ये परवाह नहीं है कि आप क्या हैं. हर आदमी में ख़द को लेकर बहुत विश्वास है. उसको फ़र्क नहीं पड़ता कि आप फ़िल्म अभिनेता, राजनेता या बड़े व्यापारी हैं. मुंबई में आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करते.

मेरे ख़याल से मुंबई में आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करते हैं और दिल्ली में औहदे के आधार पर भेदभाव करते हैं.

मुंबई में 'पावर कंशसनेस' नहीं है. अगर मैं मुंबई में जाकर कहूं मैं सांसद हूँ तो लोगों पर अधिक असर नहीं पड़ेगा. लेकिन अगर दिल्ली में लोगों के पास जाकर कहेंगे कि आप सांसद या बड़े व्यापारी हैं तो लोग आपके सामने झुक जाएंगे.

मिलिंद देवड़ा
मिलिंद देवड़ा ने 2004 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में कदम रखा

मैं अपने दोस्तों को बताता हूँ कि मैं मुंबई में पांच साल रहा. लेकिन मैंने सुबह घूमते वक़्त कभी राजनीतिक बहस नहीं सुनी. वो बात अलग है कि कोई बड़ा मुद्दा या चुनावी माहौल चल रहा हो. वहां पर शेयर मार्केट, फ़िल्म की चर्चा अधिक होती है. दिल्ली में राजनीतिक चर्चाएं आम हैं. आप कह रहे हैं कि आप दिल्ली से बहुत संतुष्ट हैं. ऐसी क्यी चीज़ें हैं जिनकी वजह से आप अपने को दिल्ली में संतुष्ट पाते हैं?

दिल्ली में मैंने काफ़ी दोस्त बना लिए हैं. मैं दिल्ली में आकर महसूस करता हूं कि मैं सांसद हूँ. मज़ाक में मैंने दोस्तों से कहता हूँ कि जब मैं मुंबई में होता हूँ डिप्लोमैटिक पासपोर्ट वाला एक निगम पार्षद बन जाता हूं. मुंबई में मुझे स्थानीय स्तर के मुद्दों पर ध्यान देना पड़ता है. मैं अपने क्षेत्र की जनता को ये नहीं कह सकता कि स्थानीय और राज्य के मुद्दों के लिए आपके पास दूसरे प्रतिनिधि हैं और मैं केंद्र में आपकी बात रखने के लिए हूँ. दिल्ली में आकर संसद में बोलने का मौका मिलता है. सम्मेलनों में भाग लेने का मौका मिलता है. तब लगता है कि मैं सांसद हूँ. मुंबई मेरा लोकसभा क्षेत्र है और घर भी. ऐसे बहुत से सांसद हैं जो दिल्ली में ही रहते हैं और महीने में सिर्फ़ एक-दो दिन के लिए अपने क्षेत्रों में जाते हैं. वो दो जीवन जीते हैं. एक दिल्ली वाला और एक क्षेत्र वाला.

और दो बीवियाँ भी रखते हैं. एक गांव में और दिल्ली में.

ये मैं नहीं कहना चाहता.

आपकी तो एक भी बीबी नहीं है. शादी नहीं हुई है आपकी.

ये मेरी मां का क्षेत्र है. उन्हीं से पूछिए. राजनीति की वजह से ये बहुत कठिन हो गया है कि मैं किसी को समय दे सकूं. उससे मिल सकूं.

मिलिंद के पास गिटार बजाने का वक़्त नहीं है. इश्क़ करने का समय नहीं है. क्या बात है?

क्या करें. राजनीति में बहुत प्रतिबद्धता है. लेकिन अब मैं अपनी ज़िंदगी में चीज़ों को प्राथमिकता के आधार पर तय कर रहा हूँ. पहले ऐसा नहीं कर पा रहा था. अब मैं अपने निज़ी जीवन की चीज़ों पर भी सोचूंगा. चाहे गिटार बजाना हो या इश्क़ लड़ाना हो.

कोई समय-सीमा है इन कामों के लिए?

नहीं कोई समय-सीमा नहीं है. मुझे इतनी कम उम्र मे इतना ज़िम्मेदारी भरा काम मिला. मैं 27 साल की उम्र में सांसद बना. लोग 20-25 साल की राजनीति करने के बाद संसद पहुँच पाते हैं. मेरे पिता जी ख़ुद लंबे समय बाद संसद पहुँचे. फिर भी मैं निज़ी चीज़ों में बदलाव लाना चाहता हूँ. शायद आप मुझे जब अगली बार बुलाएंगे तो चीज़ें काफ़ी बदली हुई होंगी.

अच्छा आप तो सांसद हैं, 27 साल के हैं. आपके पास समय नहीं है. लेकिन औरों पास तो समय है. लड़कियाँ पीछे पड़ती होंगी.

मेरे को ऐसा देखने को नहीं मिला.

कभी प्यार या क्रश हुआ है?

पहला क्रश आठवीं या दसवीं में हुआ था. वो बहुत हल्का था. राजनीति से पहले काफ़ी समय था. अब राजनीति में जाने के बाद उतना आसान नहीं है. अगर मैं अपनी दोस्त के साथ रात के खाने पर जाउंगा. तो सुबह के अख़बार में ख़बर बनेगी कि उनकी जोड़ी बन रही है. उनकी शादी होने वाली है. लोग अफ़वाह भी फैलाते हैं.

मुंबई मे ये कोई मुद्दा नहीं है. और अब तो दिल्ली में भी नहीं है.

अगर आप दक्षिण मुंबई से युवा, अविवाहित सांसद हैं तो लोग ध्यान देते हैं.

पेज थ्री पर आने से दिक्कत है.

नहीं दिक्कत तो कोई नहीं है. लेकिन ग़लत ख़बर या अफ़वाह होने का भी तो कई मतलब नहीं है.

कंप्यूटर का शौक है.

हां अपने कामों के लिए मैं काफ़ी कुछ कंप्यूटर पर ही निर्भर करता हूँ.

ब्लाग भी है.

ब्लाग तो नहीं है वेबसाइट ज़रूर है. ‘इंटेंटब्लाग डॉट कॉम’ नाम के एक ब्लाग पर मेरा योगदान होता है. ये ब्लाग आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा और फ़िल्म निर्देशक शेखर चोपड़ा ने मिलकर बनाया हुआ है.

आप आध्यात्म और आध्यात्मिक गुरुओं में विश्वास करते हैं?

दरअसल शेखर कपूर मेरे मित्र हैं और राहुल बोस जो एक अभिनेता हैं उन्होंने मुझे इस ब्लाग में योगदान देने के लिए आमंत्रित किया था. अभी तो वो शिकायत भी कर रहे हैं कि मैं अघिक योगदान नहीं कर पा रहा हूँ. मुझे मोबाइल, एसएमएस, कंप्यूटर में बहुत रुचि है. रुचि होने से ज़्यादा इन चीज़ों पर मैं काफ़ी निर्भर हूँ. आज युवा पीढ़ी कंप्यूटर और मोबाइल का बहुत इस्तेमाल कर रही है. इसका गज़ब का असर देखने को मिल रहा है.

तकनीकी एक क्षेत्र है, जनता की समस्याएं दूसरा क्षेत्र है. इसके अलावा और कौन सा क्षेत्र है जिसके लिए मिलिंद देवड़ा में जुनून है.

मुझे घूमना अच्छा लगता है. खेलने में भी रुचि है. मैं पहले स्क्वैश खेलता था. लेकिन कंधे में चोट लगने के बाद छोड़ना पड़ा. तैरना और दौड़ना भी पसंद है. मैं मैराथन भी दौड़ चुका हूँ. मुझे विदेश के साथ-साथ देश में भी घूमना पसंद है. अपने देश में ऐसी कई जगहें हैं जिन्हें बड़े पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है.

विश्वकप क्रिकेट में भारत की जो हार हुई उससे आपको भी निराशा हुई.

हारने के बाद खिलाड़ियों के ऊपर मीडिया ने ऐसे संपादकीय लिखे जिसे पढ़कर लगता था कि कोई नेता किसी घोटाले में पकड़े गए हों. मैं मानता हूँ कि क्रिकेट को लेकर एक जुनून है. लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि ये एक खेल है.

हम अभी बात कर रहे थे कि लोग बहुत भावुक होते हैं. अगर वो हीरो बनाकर सर पर बैठा सकते हैं तो वो विरोध भी करेंगे.

मैं कह रहा हूँ कि आप क्रिकेट को इमोशनल बनाइए लेकिन खेल कॉमर्शियल हो रहा है. अगर हम इमोशनल होकर खेलेंगे तो जीत मिलेगी. मुझे याद है पुराने समय में खेलते हुए खिलाड़ियों में जुनून होता था.

अब इमोशन कम कैलकुलेशन अधिक हो गया है.

खिलाड़ियों को हम अब ऐसे दिखा रहे हैं जैसे वो जनता के प्रति ज़िम्मेदार हों. वो लोक प्रतिनिधि नहीं हैं. जनता और मीडिया को भी समझना चाहिए कि ये एक खेल है.

आपको किताबें पढ़ने का शौक है.

हां शौक तो हैं. लेकिन पिछले दो सालों से कुछ ख़ास नहीं पढ़ सका. मैगज़ीन और संपादकीय पढ़ता हूँ. लेकिन किताब नहीं पढ़ी.

अच्छा क्या अब हम लोगों से कह सकते हैं कि अविवाहित मिलिंद देवड़ा से संपर्क कर सकते हैं.

हां आप ऐसा कर सकते हैं.

फ़िल्में देखने का शौक है.

हां फ़िल्में देखता हूँ लेकिन बहुत शौकीन नहीं हूँ. मैं संगीत सुनता हूँ. मैं किसी बहुत प्रभावशाली फ़िल्म को ही अच्छा मानता हूँ. सिर्फ़ मनोरंजन होना मेरे लिए काफ़ी नहीं है. फ़िल्म देखकर प्रेरणा मिलनी चाहिए. ‘स्वदेस’ मुझे बहुत अच्छी लगी.

आपका मनपसंद अभिनेता कौन है?

शाहरुख़ ख़ान. वो बहुत बेहतरीन अभिनेता हैं. ‘स्वदेस’ देखने के बाद तो मैं उनका बहुत बड़ा फ़ैन बन गया.

और अभिनेत्री.

फ़िल्म के बाहर के जीवन की बात करें तो सुष्मिता सेन. वो किसी से डरती नहीं हैं. जो सही समझती हैं वही बोलती हैं. वो एक आधुनिक महिला का प्रतिनिधित्व करती हैं.

क्या आप भी ऐसे हैं?

मेरी कोशिश है कि मैं भी ऐसा बनूं.

राजनीति में रहते हुए ऐसा बने रहना बहुत कठिन है.

राजनीति एक मुख्यधारा का धंधा है. इसमें आप को जनता को ख़ुश रखना होता है. अपनी छवि बनाई रखनी है. लोग बदल रहे हैं. उनकी अपने प्रतिनिधि से मांग बदल रही है.

हाल की कोई और कोई फ़िल्म जिसे देखकर प्रेरणा मिली हो.

‘रंग दे बसंती’ मैंने नहीं देखी है लेकिन देखना चाहता हूँ. मेरे दोस्तों ने बताया कि वो बहुत बढ़िया फ़िल्म है.

गाने भी बहुत अच्छे बने हैं.

हां, प्रसून जोशी ने बहुत अच्छे गाने लिखे हैं. ये एक ऐसी फ़िल्म है जो युवाओं को प्रोत्साहित करती है. इसने दिखाया कि समाज में काम करने के लिए राजनेता बनना ज़रूरी नहीं. आंदोलन खड़ा करके भी काम हो सकता है.

मुन्नाभाई सिरीज़ की कोई फ़िल्म देखी है.

पहली वाली मैंने देखी थी. दूसरी वाली भी मैं देख रहा था लेकिन पूरी नहीं देख पाया.

उसमें भी एक संदेश है.

हां इस फ़िल्म में गांधी जी की विचारधारा का संदेश आधुनिक युवा को देने की कोशिश की गई है. अगर आप शहरी युवा को कुछ संदेश देना चाहते हैं तो आपको काफ़ी आकर्षक तरीके से फ़िल्म बनानी होती है. तभी फ़िल्म का असर पड़ता है. मुन्नाभाई के निर्देशक और कलाकार अपनी इस कोशिश में सफल हुए. गांधी को प्रासंगिक बनाने का अच्छा प्रयास था.

पसंदीदा संगीतकार कौन हैं?

संगीतकार नहीं वो पेशे से गीतकार हैं. मैं प्रसून जोशी को काफ़ी पसंद करता हूँ. वो सिर्फ़ गीत ही नहीं बल्कि स्क्रिप्ट भी बहुत ही बेहतरीन तरीके से लिखते हैं. युवाओं तक अपनी बात पहुँचाने में वो बहुत हद तक सफल हैं. जब भी मुझे समय मिलता है मैं उनसे बात भी करता हूँ. मैं उनसे काफ़ी प्रभावित हूँ.

विज्ञापन भी तो अच्छे लिखते हैं.

हां, वो जानते हैं कि जनता के मुद्दे क्या हैं और उनसे जुड़ना कैसे है.

मुझे तो लगा था कि आप बोलेंगे आरडी बर्मन, एआर रहमान....

एआर रहमान मुझे पसंद हैं. लेकिन वो सिर्फ़ फ़िल्म संगीतकार नहीं हैं. उन्होंने बहुत कुछ किया है. मुझे फ़्यूज़न संगीत में बहुत रुचि है. अगर हम ज़ाकिर हुसैन की बात करें. वो क्लासिकल इंडियन इंस्ट्रूमेंटलिस्ट के साथ तबला बजा सकते हैं. साथ ही वो दुनिया के सबसे बड़े जैज संगीतकार के साथ भी वो तबला बजा सकते हैं. मैं जब गिटार बजाता हूँ तो ख़ुद भी जैज से लेकर क्लासिकल सबके साथ बजाने की कोशिश करता हूँ.

मिलिंद देवड़ा आप तो आदर्श बनते जा रहे हैं. परंपरा और आधुनिकता का मेल है आप में. लोगों की सेवा करने का जुनून. लड़की मां की पसंद की लाएंगे. सब लोग चाहेंगे कि उनका सांसद ऐसा हो. उनका बेटा ऐसा हो. इसके लिए शुभकामनाएं. लेकिन अगर आपको अपने समय के युवाओं से अपने मन की बात कहनी हो कि सफल कैसे बनें या कहें कि खडुश कैसे रहें तो आप क्या कहेंगे?

 राजनीति के बारे में मैं युवाओं से कहूँगा कि राजनेताओं की आलोचना करने से कुछ नहीं होगा. ये देखना पड़ेगा कि देश में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर क्या हो रहा है. मैंने देखा है कि किसी भी मुद्दे पर लोग दो धड़ों में बंट जाते हैं. जैसे आरक्षण क मुद्दा लीजिए. एक तरफ लोग समर्थन कर रहे हैं तो दूसरी तरफ लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं.

मैं सफल नहीं कहूँगा क्योंकि अगर मैं एक सांसद का बेटा नहीं होता तो मुझे सांसद बनाने वाला कोई नहीं था. राजनीति के बारे में मैं युवाओं से कहूँगा कि राजनेताओं की आलोचना करने से कुछ नहीं होगा. ये देखना पड़ेगा कि देश में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर क्या हो रहा है. मैंने देखा है कि किसी भी मुद्दे पर लोग दो धड़ों में बंट जाते हैं. जैसे आरक्षण क मुद्दा लीजिए. एक तरफ लोग समर्थन कर रहे हैं तो दूसरी तरफ लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं. बीच का कोई रास्ता नहीं निकलता. आज के युवाओं को चाहिए कि वो इस बीच के समाधान पर कोशिश करे.

क्या इस तरह आम राय बनाकर आज का युवा ख़ुश होगा?

किसी नेता ने कहा है कि नेता होने का मतलब किसी एक जमात का नेतृत्व करने से नहीं है बल्कि दोनों पक्षों को साथ लेकर चलने में है. जेसी जैक्सन ने ऐसा कहा है. उन्होंने अमरीका में अल्पसंख्यकों के मुद्दे का राजनीतिकरण किए बिना उनका समाधान करने की कोशिश की और सफलता हासिल की. कोई भी मुद्दा हो अगर हम उस पर एक पक्ष का साथ देते हैं तो विभाजन पैदा होता है. हमें दोनों पक्षों को एक साथ बैठाकर दोनों पक्षों को सुनना चाहिए.

आपको सभी युवा सांसदों में से किसमें सबसे अधिक क्षमता देखते हैं?

किसी एक नाम लेना तो मुश्किल होगा. सभी पार्टी में क्षमतावान युवा सांसद हैं. हम साथ बैठते हैं और मुद्दों पर सदन और सदन के बाहर चर्चा करते हैं. सभी कह भी रहे हैं कि ये एक अच्छा ट्रेंड है.

अगर आप से अभी कहा जाए कि आप एक वैकल्पिक धंधा चुनिए तो आप क्या करेंगे.

शायद मैं अपनी संस्था के माध्यम से तमाम राजनैतिक और ग़ैर-राजनैतिक मुद्दों पर काम करूंगा लेकिन अराजनैतिक तरीके से. राजनीति में रहते हुए आपके सामने बहुत सी मज़बूरियाँ होती हैं जो अराजनैतिक क्षेत्र में नहीं होतीं और अपना काम आसानी से कर सकती हैं.

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