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मध्यप्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्यप्रदेश राज्य का निर्माण 1956 में हुआ था और अब जाकर वहाँ पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार ने अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया है. मध्यप्रदेश में मुख्य रूप से दो ही राजनीतिक दलों का दबदबा रहा है, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी और यही दोनों पार्टियाँ सत्तारूढ़ होती रही हैं. अब तक 12 विधानसभाओं का गठन हो चुका है जिसमें से तीन बार ही भारतीय जनता पार्टी को मौक़ा मिला है. पहली बार 1977 में आपातकाल के बाद, दूसरी बार 1990 में, जब केंद्र की राजनीति में कांग्रेस का पराभव शुरु हुआ और तीसरी बार 2003 में जब एक साथ कई राज्यों में कांग्रेस को शिकस्त मिली. लेकिन पहली दो बार सरकारें अपना कार्यकाल पूरा न कर सकीं. 1977 की सरकार जनता पार्टी की सरकार थी और जनवरी 1977 से जनवरी 1980 तक यह सरकार चली. फिर जनता पार्टी टूट गई और वहाँ भारतीय जनता पार्टी की सरकार स्थापित हो गई. लेकिन इंदिरा गांधी के केंद्र में वापसी के साथ ही फ़रवरी 1980 में पटवा सरकार बर्खास्त कर दी गई और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू हो गया.
इन तीन सालों में कुल तीन मुख्यमंत्री रहे. कैलाश चंद्र जोशी, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और सुंदर लाल पटवा. दूसरी बार भाजपा की सरकार मार्च 1990 में बनी लेकिन दो साल का कार्यकाल पूरा होने के पहले ही 15 दिसंबर 1992 को, यानी छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरने के बाद यह सरकार बर्खास्त कर दी गई. तब सुंदर लाल पटवा मुख्यमंत्री थे. तीसरी बार भाजपा को विधानसभा चुनावों में तब जीत मिली जब कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार दो कार्यकाल पूरे कर चुकी थी और केंद्र में एनडीए सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही थी. दिसंबर 2003 में हुए इन चुनावों में जीत के बाद उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं लेकिन एक पुराने मामले के चलते उन्हें अगस्त 2004 में इस्तीफ़ा देना पड़ा और बाबूलाल गौर को पद पर बिठाया गया लेकिन वे एक साल से कुछ ही अधिक समय पद पर रह सके और नवंबर 2005 में उनकी जगह शिवराज सिंह चौहान को शपथ दिलाई गई. मध्यप्रदेश में 2008 के चुनाव भाजपा शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में ही लड़ने जा रही है. दिखता नहीं कि शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व को इन चुनावों के बाद पार्टी के किसी और नेता से कोई चुनौती मिलने वाली है.
वैसे माना जा रहा था पार्टी से अलग हो चुकीं उमा भारती भाजपा के लिए चुनौती साबित होंगी लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी राजनीतिक हैसियत पिछले बरसों में मज़बूत होने की जगह कमज़ोर ही हुई है. वैसे मध्यप्रदेश विजयाराजे सिंधिया और अटल बिहारी वाजपेयी का भी प्रदेश रहा है लेकिन इन दोनों नेताओं ने राज्य की राजनीति की बजाय अपने को केंद्र की राजनीति को महत्व दिया. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो बाद में मध्यप्रदेश के विदिशा की जगह उत्तरप्रदेश के लखनऊ को ही अपना स्थाई चुनाव क्षेत्र बना लिया. कांग्रेस का दबदबा यदि कहा जाए कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के दबदबे वाला राज्य रहा है तो बहुत ग़लत नहीं होगा क्योंकि राज्य के 42 साल के इतिहास में सिर्फ़ दस साल भाजपा का शासन रहा है जबकि शेष 32 साल कांग्रेस की सरकारें राज्य में शासन करती रही हैं. पंडित रविशंकर शुक्ल राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे और उनके बाद से इस राज्य ने मुख्यमंत्री के रूप में बड़े नेता खड़े किए हैं जिनमें द्वारका प्रसाद मिश्र या डीपी मिश्रा, प्रकाश चंद सेठी, अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा और दिग्विजय सिंह तक शामिल हैं.
कुल नौ विधानसभाओं में जीत हासिल करने वाली कांग्रेस भी मुख्यमंत्री बदलने में भाजपा से पीछे नहीं रही और उसने इसमें 21 मुख्यमंत्रियों को शपथ दिलाई. हालांकि इनमें से कई लोग बार-बार मुख्यमंत्री बनते रहे और फिर पद से हटते रहे. उदाहरण के तौर पर श्यामाचरण शुक्ल 1969 से 89 तक तीन बार मुख्यमंत्री बने. यह और बात है कि एक भी बार उनका कार्यकाल पाँच वर्षों का नहीं रहा. इसी तरह प्रकाश चंद सेठी और मोतीलाल वोरा दो-दो बार मुख्यमंत्री बने लेकिन दोनों ही बार वो पूरे कार्यकाल में नहीं रहे. अर्जुन सिंह ने एक कार्यकाल तो पूरा किया लेकिन दूसरे कार्यकाल में वो सिर्फ़ एक दिन मुख्यमंत्री रहे और फिर तीसरी बार एक साल से भी कम समय तक पद पर रहे. इन मायनों में दिग्विजय सिंह ही एक अपवाद रहे जिन्होंने पाँच-पाँच साल के दो कार्यकाल पूरे किए. चूंकि दिग्विजय सिंह ने पिछले चुनाव के समय हारने की सूरत में दस साल कोई पद न लेने की घोषणा कर दी थी वे अभी तक इस वादे पर क़ायम दिखते हैं. इसलिए माना जा रहा है कि वे मध्यप्रदेश में अगली पारी के दावेदार नहीं है. इस समय मध्यप्रदेश में सुरेश पचौरी, कमलनाथ, जमनादेवी, सुभाष यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के सूत्रधार दिखते हैं और मौक़ा पड़ने पर इन्हीं में से कोई राज्य की बागडोर संभाल सकता है. बड़े नेता इसके अलावा राज्य ने चंदूलाल चंद्राकर, विद्याचरण शुक्ला, माधवराव सिंधिया और कमलनाथ जैसे नेता भारतीय राजनीति को दिए.
हालांकि मध्यप्रदेश में आदिवासी जनसंख्या बड़ी है लेकिन कांग्रेस और भाजपा की राजनीति में अरविंद नेताम और दिलीप सिंह भूरिया जैसे इक्कादुक्का बड़े नेता ही उभर सके. ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के अलावा किसी और पार्टी की कोई जगह नहीं बनी लेकिन वो इतनी कम थी कि ये राजनीतिक दल हाशिए पर ही रहे. उदाहरण के तौर पर एक समय में बहुजन समाज पार्टी की ताक़त बढ़ती हुई दिखाई दे रही थी और आलम यह था कि अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज को न सिर्फ़ बसपा के हाथों पराजय का स्वाद चखना पड़ा बल्कि वे तीसरे स्थान पर पहुँच गए. लेकिन बसपा की यह जीत बड़ी नहीं बन सकी. इसी तरह गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने भी अच्छी संगठन दिखाई लेकिन उनका इलाक़ा कुछ विधानसभाओं तक सीमित रहा. महाराष्ट्र से जुड़े हुए इलाक़ों में आरएसपी का प्रभाव रहा लेकिन एक दो विधानसभा सीटों पर ही वे प्रभावी दिखे. राज्य का विभाजन वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन हो गया और इसके दक्षिण-पूर्वी हिस्से को अलग करके छत्तीसगढ़ राज्य बना दिया गया. राज्य में विधानसभा की 90 सीटें कम हो गईं और इस तरह राज्य विधानसभा अब 230 सीटों की हो गई. इसी तरह 40 लोकसभा सीटें घटकर 29 ही रह गईं. आदिवासियों की बड़ी आबादी छत्तीसगढ़ के हिस्से चली गईं और इसी के साथ नक्सलियों के प्रभाव वाला बड़ा हिस्सा बस्तर के रूप में मध्यप्रदेश से कट गया. श्यामाचरण और विद्याचरण शुक्ला, मोतीलाल वोरा और अजीत जोगी जैसे नेता छत्तीसगढ़ में चले गए तो मध्यप्रदेश भाजपा से लखीराम अग्रवाल और दिलीप सिंह जूदेव अलग हो गए. |
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