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गुरुवार, 11 दिसंबर, 2003 को 03:44 GMT तक के समाचार
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क्या हैं चुनाव परिणामों के संकेत
एक मतदाता
मतदाताओं ने ज़ाहिर किया कि विकास एक महत्वपूर्ण मुद्दा है

विनोद वर्मा

पहली दिसंबर को चार हिंदीभाषी राज्यों के लिए चुनाव हुए थे, दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में.

इनमें से दिल्ली और मध्यप्रदेश के चुनाव परिणाम तो वैसे ही आए जैसी संभावना बताई जा रही थी लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों ने लोगों को एकबारगी चौंकाया है.

चुनावी ख़बरों और रिपोर्ट से यह संकेत मिलने लगे थे कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस को तीसरी पारी मिलना कठिन होगा.

और हुआ भी यही लेकिन जैसी हार दिग्विजय सिंह की हुई वैसी बुरी हार की कल्पना कांग्रेस को नहीं थी.

यहाँ 230 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ़ 36 सीटें मिली हैं.

यहाँ भारतीय जनता पार्टी ने तेज़तर्रार युवा नेता उमा भारती को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाकर मैदान में उतारा था.

दिल्ली में भी भाजपा को एक कमज़ोर विपक्ष के रुप में देखा जा रहा था और हुआ भी यही.

यहाँ कांग्रेस को आसानी से बहुमत हासिल हो गया.

लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणाम अनुमानों के विपरीत निकले.

राजस्थान में माना जा रहा था कि अशोक गहलोत एक बार फिर सत्ता में लौट आएँगे लेकिन वहाँ उन्हें मुँह की खानी पड़ी.

वसुंधरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 120 सीटें जीतकर तख़्ता पलट दिया है.

इसी तरह छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत की संभावना बताई जा रही थी.

ख़ासकर चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री पद के दावेदार और भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव के रिश्वत कांड में फँसने से भाजपा का समीकरण गड़बड़ाता दिख रहा था.

लेकिन चुनाव परिणाम आए तो तस्वीर उलटी हुई दिखाई पड़ी.

विकास ही मुद्दा

जब मध्य प्रदेश में उमा भारती को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया गया था तो विश्लेषकों को लगा था कि भाजपा को गुजरात की जीत रास आ गई है और अब वह हर जगह हिंदुत्व को भुनाने जा रही है.

लेकिन उमा भारती ने विकास को मुद्दा बनाकर चुनाव प्रचार शुरु किया और विकास मध्यप्रदेश में जितना बड़ा मुद्दा बना उतना बड़ा मुद्दा शायद आज तक किसी भी राज्य में नहीं बना था.

भाजपा ने यही फ़ार्मूला राजस्थान में भी अपनाया और अपेक्षाकृत लोकप्रिय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अब विपक्ष में बैठना पड़ रहा है.

छत्तीसगढ़ में जिस तरह से ग्रामीण आदिवासी इलाकों में भाजपा ने जीत दर्ज की उसने इस धारणा को ग़लत साबित किया कि भाजपा शहरी इलाकों की पार्टी है.

यहाँ 34 आदिवासी सीटों में से सिर्फ़ नौ सीटें कांग्रेस को मिली है और शेष पर भाजपा ने कब्ज़ा कर लिया है.

आदिवासी मुख्यमंत्री नारा लगाते अजीत जोगी को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

इन चुनावों ने यह संकेत दे दिए हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में भी भाजपा विकास और सुशासन का नारा लेकर मैदान में उतरेगी.

चाहे चुनाव समय पर हों या समय से पहले, जैसी कि संभावना व्यक्त की जा रही है.

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