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बिहार में अब भी लाखों लोग बाढ़ में फँसे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमाम राहत और बचाव कार्य के बावजूद अब भी पाँच लाख से ज़्यादा लोग बिहार की बाढ़ में फँसे हुए हैं. बचाव कार्य में तैनात सैनिकों की संख्या बढ़ाई जा रही है. लेकिन अभी भी कई इलाक़े ऐसे हैं जिनका संपर्क पूरी तरह टूटा हुआ है और सरकारी नौकाएँ वहाँ तक नहीं पहुँच पा रही हैं. दूसरी ओर जिन लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है उन सभी लोगों को शरण देना और राहत सामग्री उपलब्ध कराना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. क़रीब 12 लाख लोग बेघर हो गए हैं. राहत शिविरों में रहने की जगह नहीं और अपर्याप्त राहत सामग्री को लेकर कई इलाक़ों में तनाव भी है. प्रदेश के आपदा प्रबंधन अधिकारी प्रत्यय अमृत के मुताबिक़ अभी तक पाँच लाख लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है लेकिन अभी भी पाँच लाख लोग बाढ़ में फँसे हुए हैं.
सेना बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में और सैनिक भेज रही है. अभी तक 80 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है. लेकिन आशंका है कि मरने वालों की संख्या कहीं और ज़्यादा है. रविवार रात नेपाल से सटे सुपौल ज़िले में पानी का स्तर और बढ़ गया. इलाक़े में जाने वाली मुख्य सड़क पूरी तरह डूब गई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को आपदा प्रबंधन विभाग की बैठक की और बताया कि पाँच लाख से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है. उन्होंने बताया, "पाँच लाख लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है और आने वाले दो-तीन दिनों में सभी को अस्थायी शिविरों में जगह मिल जाएगी." स्थिति क़रीब दो सप्ताह पहले कोसी का तटबंध टूटने के बाद आई बाढ़ का दायरा दिनों-दिन नए इलाक़ों में बढ़ता जा रहा है. कई इलाक़े पूरी तरह जलमग्न हैं तो कई गाँव पूरी तरह बह गए हैं. बिहार का मधेपुरा ज़िला सर्वाधिक प्रभावित है. यहाँ कई इलाक़े पूरी तरह डूबे हुए हैं. बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में जब लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए सरकारी नौका पहुँचती है तो लोगों में उस पर बैठने के लिए होड़ लग जाती है. कई नौकाओं पर तो ज़रूरत से ज़्यादा लोग लदे होते हैं. बाढ़ प्रभावित इलाक़ों का दायरा इतना बड़ा है कि राहत पहुँचाना भी सरकारी अमले के लिए सिरदर्द बना हुआ है. कई शरणार्थी शिविर में ज़रूरत से ज़्यादा लोग हैं. यहाँ न पीने का पानी है और न ही दवाओं की व्यवस्था. समन्यव के अभाव में राहत सामग्री से भरे ट्रक रास्ते में ही खड़े हैं.
राहत सामग्री बड़ी मात्रा में पहुँच रही है लेकिन मुश्किल ये है कि इनका वितरण कैसे किया जाए. कई स्वयंसेवी संगठन और ग़ैर सरकारी संगठन भी इलाक़ों में कैंप कर रहे हैं. लेकिन इन सभी संगठनों के लिए राहत और बचाव कार्य में सरकारी विभाग के साथ समन्वय स्थापित करना ही बड़ी चुनौती बन गया है. संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि पीने के पानी की कमी और ख़राब परिस्थितियों के कारण महामारी फैल सकती है. बाढ़ प्रभावित सहरसा ज़िले के एक कैंप में डायरिया और बुख़ार के 35 से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में स्थिति सुधरेगी. आपदा प्रबंधन अधिकारी प्रत्यय अमृत ने बताया, "प्रभावित इलाक़ों में डॉक्टरों को भेजा जा रहा है. मुझे पूरा भरोसा है कि एक-दो दिन में स्थिति बेहतर हो जाएगी." राहत कार्य में और सैनिकों को लगाया जा रहा है. अधिकारियों के मुताबिक़ सेना की 10 और टुकड़ियाँ राहत कार्य में लगाई जा रही हैं. |
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