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सोमवार, 01 सितंबर, 2008 को 13:06 GMT तक के समाचार
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'शिविरों का हाल देखकर नहीं मिलती राहत'

राहत शिविर
बाढ़ प्रभावित लोग राहत शिविरों की व्यवस्था से नाराज़ हैं
बाढ़ की मार झेल रहे बिहार की हालत दिन-ब-दिन और बदतर होती जा रही है. राहत के लिए राज्य सरकार के बड़े वादे हैं और केंद्र की बड़ी घोषणाएं पर ज़मीनी सच की टोह लीजिए तो तस्वीर बहुत गंदी, अभावग्रस्त और तकलीफ़देह नज़र आती है.

सहरसा और पटना के बीच मुख्य संपर्क मार्ग जो कोसी क्षेत्र के ज़िलों को पटना से जोड़ता है, वो कभी भी टूट सकता है. राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच 107 पर लगातार पानी भर रहा है. कुछ जगहों पर हमने पाया कि पानी दो फीट तक चढ़ गया है. अगर पानी ऐसे ही जमा होता रहा तो सड़क के रास्ते सहरसा से संपर्क पूरी तरह से टूट जाएगा.

कई राहतकर्मी, मीडियाकर्मी इस चिंता में हैं कि सहरसा का रास्ता बंद हुआ तो वे वापस कैसे लौटेंगे और राहतकार्य कैसे जारी रह सकेगा. अगर पानी राजमार्ग पर ऐसे ही बढ़ता रहा तो राहतकर्मी और मीडियाकर्मी सहरसा से निकलने के लिए मजबूर हो जाएंगे.

पर मेरी असल चिंता है राहत शिविरों की स्थिति पर. अगर राहतकार्यों में तेज़ी नहीं दिखाई गई और राहत का स्तर नहीं सुधरा तो बिहार महामारी की चपेट में आ जाएगा और स्थितियाँ नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी.

राहतशिविरों की स्थिति

सोमवार को सुबह से ही मैं सहरसा कॉलेज में मौजूद था. यहाँ यह सोचकर गया कि ग्रामीण इलाकों में लगे राहत शिविरों की दर्दनाक स्थिति से यहाँ तस्वीर कुछ बेहतर होगी क्योंकि यह तो ज़िले का मुख्यालय है.

 असल चिंता है राहत शिविरों की स्थिति पर. अगर राहतकार्यों में तेज़ी नहीं दिखाई गई और राहत का स्तर नहीं सुधरा तो बिहार महामारी की चपेट में आ जाएगा और स्थितियाँ नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी

पर शिविर के अंदर का मंज़र किसी भी तरह की राहत देता नज़र नहीं आ रहा था. लोगों को ख़राब गुणवत्ता का खाना मिल रहा था. शिविर में 5000 लोग हैं और शिविर पिछले एक सप्ताह से चल रहा है पर दवाएं आज पहुँच पाई हैं.

जो दवा पहुँची हैं वो 500 लोगों को एकबार खिलाने भर की हैं. इसमें भी पानी से होने वाली बीमारियों की कोई दवा नहीं है जबकि सबसे ज़्यादा संक्रमण पानी की वजह से ही फैल रहा है.

यहाँ तक कि शिविर तक पहुँचने वाले कई लोग घायल हैं. पानी में कुछ के पैर सड़ गए हैं और कुछ के फफोले पड़े हैं पर किसी को डिटॉल तक शिविर में नसीब नहीं है.

शिविर में 3 चिकित्सक थे पर कोई नहीं बता सका कि दवाओं की आपूर्ति और कमी के लिए ज़िम्मेदार कौन है. यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि दवा स्थानीय विधायक की कृपा से आई या प्रशासन की ओर से.

राहत कम, प्रचार ज़्यादा

सबसे तकलीफ़देह तो यह है कि राहत देने वाले कई संस्थान, महकमे राहत से ज़्यादा प्रचार पर ज़ोर दे रहे हैं.

राहत शिविर
लोगों को राहत शिविरों में पर्याप्त दवाएं, रौशनी और शौचालय जैसी सुविधाएं कम ही मिल जा रही हैं

विभागों और लोगों की ओर से शिविर तो लग रहे हैं पर शिविर से पहले ऑर्डर होते हैं बैनर और बिना बैनर के, यानी बिना प्रचार के राहत पहुँचाने वाले हाथ कम हैं.

ऐसा ही एक उदाहरण मिला शिक्षा विभाग की ओर से. विभाग की जीप और दस्ता लोगों के बीच जाने को तैयार था पर जा नहीं रहा था. कारण पूछा तो पता चला कि जीप के सामने बांधा जाने वाला साइनबोर्ड तैयार नहीं है. यानी प्रचार न हुआ तो राहत, मदद का क्या मतलब.

पॉलीटेक्निक में चल रहे राहत शिविर का शौंचालय इसलिए चालू नहीं हो सका क्योंकि उसका बैनर तैयार नहीं हो पाया था. इन बैनरों पर एक ही बात लिखी होती है- अमुक राहत अमुक व्यक्ति या संस्था के सौजन्य से दी जा रही है.

राजा चौपट, अंधेरे में नगरी

राहत के लिए सहरसा मुख्यालय क्षेत्र में क़रीब 10-12 शिविर लगाए गए हैं. यहाँ सबसे बदतर हालत है शौंचालय और बिजली आपूर्ति की. शिविर अंधेरे में डूबे हैं और गंदगी बढ़ती जा रही है.

 पॉलीटेक्निक में चल रहे राहत शिविर का शौंचालय इसलिए चालू नहीं हो सका क्योंकि उसका बैनर तैयार नहीं हो पाया था. इन बैनरों पर एक ही बात लिखी होती है- अमुक राहत अमुक व्यक्ति या संस्था के सौजन्य से दी जा रही है

केवल पूर्णिया के जिलाधिकारी को ही लोगों ने क्षेत्र में दौरा करते देखा है. बाकी सहरसा, सुपौल, और मधेपुरा के जिलाधिकारी एयरकंडीशंड कार्यालय में ही बैठे हैं. वहीं से जायज़ा ले रहे हैं.

ग्रामीण इलाकों के राहत शिविरों की हालत तो बहुत ही दर्दनाक है. वहाँ राहत के नाम पर कुछ नहीं जैसी ही स्थिति है. लोग अपने आप के भरोसे जीने को मजबूर हैं.

एक दिक्कत और है. सैकड़ों की तादाद में नावें राहत के लिए अलग-अलग जगहों से प्रभावित ज़िलों के मुख्यालयों में पहुँच रही हैं. इसमें से 10-15 प्रतिशत नाव तो पानी में उतारते ही ख़राब साबित हो जा रही हैं.

पर कई नावें ज़िला मुख्यालयों में ही पड़ी रह जा रही हैं. कारण यह है कि राज्य सरकार इस्तेमाल के लिए किसी भी नाव को भेजने से पहले उसपर रंग रोगन कराती हैं और राज्य सरकार की मोहर लगवाती हैं.

इन मुख्यालयों से मोहर लगवाने के इंतज़ार में नाव कई दिन इस्तेमाल से बाहर रहती हैं. ऐसे में अहम सवाल है, राजनीति और प्रचार के बिना क्या राहत नहीं पहुंचाई जा सकती है.

सवाल कई हैं. देखिए, जवाब कितने निकल पाते हैं.

(बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)

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