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रविवार, 31 अगस्त, 2008 को 20:00 GMT तक के समाचार
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'अरे कोई तो नाव दिलवा दो'

बाढ़ प्रभावित
बाढ़ प्रभावित लोग राहत शिविरों की व्यवस्था से नाराज़ हैं
'भाई साहब, पानी में मारे-मारे फिरने के बाद बदन सुखाने के लिए ये ज़मीन का टुकड़ा दिखा है लेकिन प्रतापगंज, लखमीनिया गाँव में जाके देखिए. बच्चों-बूढ़ों का क्या हाल है?'

ये कहना है बाढ़ प्रभावित सुपौल ज़िले से लगभग 80 किलोमीटर दूर दलही गाँव में छोटे से भूखंड पर खुले आकाश के नीचे जमा लोगों का जो किसी तरह अपनी जान बचाकर यहाँ तक पहुँचे हैं.

कुछ स्वयंसेवी संगठनों के लोग फटे पुराने कपड़े बाँट रहे हैं ताकि लोग गीले कपड़े बदल सकें. घर-बार छोड़ जान बचाकर यहाँ तक पहुँचे लोगों के पास खाने के लिए न एक दाना है और न पहनने के लिए कोई कपड़ा.

मेरी नज़र पड़ी राहत शिविर में भूख से बिलबिलाते लोगों पर जिनके बीच भात और सूखी मिर्च बाँटी जा रही है.

एक माँ अपने दुधमुँहे बच्चे को सीने से लगाए यही खाना खाते हुए कहती है, "मैं जीकर क्या करुंगी जब मेरा बच्चा ही नहीं बचेगा. चार दिन से धूप, बारिश के बीच कमर तक पानी में रहते-रहते मैं टूट चुकी हूँ और इसकी तबीयत बिगड़ चुकी है."

राहत शिविर का मंजर बमबारी में तबाह हुए झुग्गी बस्ती जैसा लगता है- लकड़ी के ठूँठे खड़े हैं लेकिन ढकने के लिए प्लास्टिक या कपड़े की कोई व्यवस्था नहीं है.

हाँ लकड़ी के खंभे से लटक-लटक कर छोट-छोटे बच्चे अपना मन बहला रहे हैं. शायद उन्हें विभीषिका का अंदाज़ा नहीं है. जब हमारे साथ गए कुछ पत्रकारों ने ख़ुद खाने के लिए ब्रेड के पैकेट निकाले तो ये बच्चे हाथ फैलाए सामने खड़े थे.

क़ुदरत की मार सहते-सहते पूरी तरह थक चुके लोगों के माथे पर हताशा और निराशा के भाव स्पष्ट दिखाई देते हैं. बीस-पच्चीस साल का एक युवक ये कहते-कहते रो पड़ता है कि जिस माँ ने मुझे पाल पोस कर बड़ा किया आज मैं उसे ही बचाने में अपने आपको निसहाय पा रहा हूँ.

अरे कोई तो नाव दिलवाओ

बाढ़ में फँसे लोगों को निकालने के लिए सरकार ने जो नाव उपलब्ध कराए हैं उसमें भी भ्रष्टाचार साफ देखा जा सकता है.

सरकार ने जो नाव मँगवाए हैं उनमें से लगभग 50 तो आते ही बेकार साबित हो चुके हैं. छेद भरे नाव को लेकर आख़िर कौन अपनों की जान बचाने निकलेगा.

ऐसे कई लोग मिले जो अपने परिजनों को बचाने के लिए नाव देने की गुहार लगाते नज़र आए लेकिन प्रशासनिक मशीनरी की बानगी देखिए.

अगर आपको नाव लेना है तो पहले आवेदन देना होगा. इसमें लिखना है कि आप नाव से किस-किस व्यक्ति को बचाकर लाएंगे.

कई लोग तो सिर्फ़ ऐसे व्यक्ति की तलाश करते दिखाई दिए जो उनके लिए फ़ॉर्म भर दे. लेकिन काम यहीं ख़त्म नहीं होता. फ़ॉर्म भरने के बाद नाव का नंबर और नाविक ढूँढने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की होगी.

अब शुरु होता है कि दर्द का कारोबार. राहत शिविर तक पहुँचे एक व्यक्ति ने बताया कि सरकार की मुफ़्त सेवा की ऐसी की तैसी, मुफ़्त फेरी लगाने के लिए तैनात नाविक बिना पैसे लिए चप्पू हिलाने तक को तैयार नहीं है.

कुछ और गाँव जलमग्न

मधेपुरा ज़िले के कुछ और गाँवों में रविवार को पानी प्रवेश कर गया. सिंघेश्वर स्थान से लेकर घेलार जीवसपुर और हसनपुर गाँव अभी तक बचे थे.

लेकिन किसी ने नहर का तटबंध काट दिया और इन गाँवों में पानी अब घुसने लगा है.

जब गाँव के मुखिया से हमारी बात हुई तो उन्होंने कहा कि हम लोग काटे गए हिस्से को पाटने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन धारा इतनी तेज़ है कि इसमें काफी मुश्किल हो रही है.

(बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार के साथ बातचीत पर आधारित)

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