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जीत संतोषजनक: मनमोहन सिंह | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विश्वास मत पर अपनी सरकार को मिली जीत को संतोषजनक करार देते हुए कहा कि इससे संदेश गया है कि भारत दुनिया के देशों के बीच अपना उचित स्थान बनाने के लिए तैयार है. उनका कहना था,'' इस जीत से दुनिया के सामने ये संदेश जाएगा कि भारत दुनिया में अपने सही जगह पाने के लिए तैयार है.'' विश्वास मत जीतने के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा उन्होंने इस जीत के लिए संसद सदस्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की. उन्होंने जीत के लिए सोनिया गाँधी, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और यूपीए के घटक दलों का शुक्रिया अदा किया. लोकसभा में विश्वास मत के दौरान नोटों के उजागर होने के संबंध में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा,'' ये बहुत दुखद है. मुद्दा लोकसभा के अध्यक्ष के सामने हैं. क़ानून की प्रक्रिया के तहत इस इस मामले में कार्रवाई की जाएगी.'' विपक्ष के शोरगुल के कारण अपना जवाब न दे सकने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपना भाषण सदन के पटल पर रख दिया था. इसमें उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को निशाना बनाया और कहा कि आडवाणी ने अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए कम से कम तीन बार उनकी सरकार गिराने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुए. तीखे प्रहार उनका कहना था कि चूंकि उन्हें आडवाणी से सोच बदलने की उम्मीद नहीं है, इसलिए वो सलाह देंगे कि वो अपने 'ज्योतिषियों' को बदल लें. उन्होंने कहा,'' आडवाणी ने उन्हें निकम्मा प्रधानमंत्री साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है. लेकिन क्या देश ऐसे गृहमंत्री को माफ़ करेगा जो तब सो रहा था जब संसद पर चरमपंथियों ने हमला किया? जिसने बाबरी मस्जिद गिरा देश को सांप्रदायिकता की आग में धकेल दिया? और जब पाकिस्तान यात्रा पर गए तो जिन्ना के मुरीद हो गए.'' मनमोहन सिंह का कहना था,'' क्या देश उस गृहमंत्री को माफ़ करेगा जो गुजरात में दंगों में हज़ारों निर्दोष लोगों के मारे जाने के वक्त हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा?'' प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनकी सरकार से समर्थन वापस लेने वाले वाम दलों पर भी तीखा प्रहार करते हुए कहा कि वे उन्हें 'बंधुआ मजदूर' बनाकर रखना चाहते थे जो उन्हें स्वीकार नहीं था. उनका कहना था,'' परमाणु क़रार को लेकर चल रही बातचीत के हर क़दम पर वामपंथी दल वीटो करना चाहते थे. वो मुझे बंधुआ मजदूर की तरह रखना चाहते थे जो हमें कतई स्वीकार नहीं था.'' वाम दलों के समर्थन वापस लेने पर प्रधानमंत्री ने पहली बार वाम दलों के ख़िलाफ़ इतनी तीखी टिप्पणी की है. सरकार गिराने के लिए भाजपा से हाथ मिलाने के लिए भी उन्होंने वाम दलों को आड़े हाथों लिया और उनसे पूछा कि क्या प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उन्हें लालकृष्ण आडवाणी का नाम मंजूर है. सरकार की जीत ग़ौरतलब है कि लोकसभा के विशेष सत्र में दो दिनों तक चली बहस के बाद हुए मतदान में यूपीए ने 256 के मुक़ाबले 275 मतों से जीत हासिल की. वर्तमान संसद में बहुमत के लिए सरकार को 271 सदस्यों के समर्थन की ज़रुरत थी लेकिन सरकार ने इससे चार अधिक सांसदों का मत हासिल किया है. दस सांसदों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. दूसरी ओर विश्वास मत के ख़िलाफ़ प्रमुख भूमिका निभानेवाली उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने पत्रकारों से बातचीत में कहा," यूपीए की यह जीत उनकी नीति की जीत नहीं है. बसपा को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सोची-समझी साज़िश के तहत यूपीए-एनडीए की इस जीत में मिलीभगत रही है." संसद में हंगामा मतदान के पहले तक विश्वासमत के दौरान अनुपस्थित रहने के लिए सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त के आरोप प्रत्यारोपों को लेकर सदन में ज़ोरदार हंगामा हुआ.
उल्लेखनीय है कि मतदान के कुछ ही घंटों पहले भारतीय जनता पार्टी के सांसद नोटों से भरे थैले लेकर सदन के भीतर आ गए और फिर नोट दिखाते हुए उन्होंने सत्तारूढ़ गठबंधन पर मतदान में अनुपस्थित रहने के लिए यह पैसा देने का आरोप लगाया. लोकसभा टेलीविज़न चैनल पर दिखाए गए इन दृश्यों के बाद संसद की कार्यवाही कई बार बाधित हुई और फिर लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इस मामले की जाँच का आश्वासन दिया है. विपक्ष के सांसद सदन में विशेष सत्र के पहले दिन से ही आरोप लगा रहे थे कि सौदेबाज़ी और सांसदों की ख़रीद-फ़रोख्त हो रही है. तीखी बहस प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को संक्षिप्त भाषण में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की चार साल और दो महीने के काम पर वोट माँगा और बहस की शुरुआत की थी. जहाँ विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार पर तीखे प्रहार किए वहीं वामपंथी दलों की ओर से मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया कि सरकार ने वामपंथी दलों और देश को धोखा दिया है. विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सरकार का बचाव करते हुए भाजपा और वामपंथी पार्टियों के आरोपों को ख़ारिज कर दिया. दो दिनों की बहस में उठाए गए सवालों का जवाब देने के लिए खड़े हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्षी नेताओं ने जवाब नहीं देने दिया. भाजपा के सदस्य प्रधानमंत्री से इस्तीफ़े की माँग करते हुए नारे लगा रहे थे. इसके बाद प्रधानमंत्री ने अपना जवाब सदन के पटल पर रख दिया. |
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