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विश्वास मत के समर्थन-विरोध की राजनीति का मतलब | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की लोकसभा में विश्वास मत पर हो रही बहस के दौरान जहाँ विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी कुछ खोए-खोए अंदाज़ में नज़र आए वहीं राजनीति का ध्रुवीकरण स्पष्ट नज़र आ रहा है. इधर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच मायावती के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा फिर खड़ा हो गया है. ताज़ा राजनीतिक घटनाक्रम और लोकसभा में पहले दिन की बहस पर बीबीसी हिंदी की विशेष चर्चा में ऐसा सामने आया. इस चर्चा में बीबीसी हिंदी के भारत संपादक संजीव श्रीवास्तव, बिज़नेस भास्कर के राजनीतिक संपादक उर्मिलेश और बिज़नेस स्टेंडर्ड की अदिति फ़डनिस ने भाग लिया. आडवाणी की फ़ॉर्म संजीव श्रीवास्तव का मानना था, " भाजपा को ये तो पता था कि ये पूरा खेल मायावती के लिए तो खेला नहीं जा रहा. पिछले एक हफ़्ते से जैसे ही सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत मायावती से मिलने गए और तीसरे मोर्चे के अन्य नेताओं ने मायावती को भी मान्यता दी, तो इसका कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक प्रभाव तो आडवाणी के भाषण में दिखा. उन्हें शायद ये पता था कि ताज़ा राजनीतिक घटनाक्रम का लाभ सबसे अधिक मायावती, दूसरे नंबर पर प्रकाश कारत और फिर तीसरे नंबर पर भाजपा को मिलेगा." अदिति फ़डनिस का मानना था, "आडवाणी उतने फॉर्म में नहीं नज़र आए. शायद उन्हें ये अहसास था कि पूरा अस्तबल बेच कर अब बाज़ी बसपा के हाथ में तो नहीं देना चाहेंगे." उर्मिलेश का कहना था कि स्थितियों ने इस बार मायावती को आगे धकेला है और भाजपा का धर्मसंकट आडवाणी के भाषण में साफ़ व्यक्त हो रहा था. संजीव श्रीवास्तव का कहना था कि शुरुआत में तो आडवाणी काफ़ी आक्रामक नज़र आए और उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री पर प्रहार भी किए. उनका कहना था कि साथ ही आडवाणी ने स्पष्ट किया कि भाजपा अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदारी के ख़िलाफ़ नहीं है और यदि एनडीए सत्ता में आई तो वे भारत-अमरीका परमाणु संधि में संशोधन करेंगे, इसे ख़ारिज नहीं करेंगे. वाम और मायावती भविष्य के राजनीतिक समीकरणों पर उर्मिलेश का कहना था कि आगे वाम दलों के कांग्रेस के साथ जाने की संभावना कम है. उनका ये भी कहना था कि जो लोग प्रकाश कारत को छात्र नेता बता रहे थे उन्हें ज़रूर हैरानी हुई होगी. उधर अदिति फ़डनिस का कहना था, " विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के भाषण से नज़र आता है कि कांग्रेस और सीपीएम ने साथ चलने के कुछ दरवाज़े खुले रखे हैं." उर्मिलेश का कहना था, "राजनीति में नया ध्रुविकरण हुआ है. मायावती एक नए नेता की छवि के साथ उभरी हैं. मुझे भविष्य में कांग्रेस की आईसोलेशन यानी अलग-थलग पड़ने की संभावना ज़्यादा नज़र आती है. 'सौदेबाज़ी' जहाँ तक पिछले एक पखवाड़े में सौदेबाज़ी के आरोपों की बात है, उस पर संजीव श्रीवास्तव का कहना था," जहाँ तक प्रलोभन, जेल में बंद सांसदों के वोट की बात हो तो अब की स्थिति में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले भारतीय राजनीति में नज़र न आया हो. नतीजे तो बाद में आएँगे लेकिन ये स्पष्ट है कि दुनिया की नज़रें इस विश्वास मत पर हैं क्योंकि ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में हो रहा है और इसका संबंध अंतरराष्ट्रीय मुद्दा- भारत-अमरीका परमाणु समझौते से है." उर्मिलेश का भी कहना था कि इस राजनीतिक घटनाक्रम में ऐसा कोई रंग नज़र नहीं आया जो पहले न दिखा हो. उनका ये भी मानना था कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने तीन-चार महीने पहले ही समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाने की प्रक्रिया शुरु कर दी थी और इसी रणनीति के तहत सरकार विपक्ष के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा आश्वस्त नज़र आई. |
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