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विश्वास मत पर पार्टियों ने कमर कसी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर चल रहे राजनीतिक ड्रामे की अंतिम कड़ी सोमवार को लोकसभा में तब पेश की जाएगी जब सरकार विश्वास मत बहस के लिए पेश करेगी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सोमवार को लोक सभा में विश्वास मत के लिए एक लाइन का प्रस्ताव पेश करेंगे कि 'ये सदन मंत्रिपरिषद में अपना विश्वास व्यक्त करता है.' ऐसी ख़बरें हैं कि इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संक्षिप्त भाषण देकर सदन में प्रस्ताव को स्वीकार करने का अनुरोध करेंगे. इसके बाद सोमवार और मंगलवार को लोक सभा में इस प्रस्ताव पर चर्चा होगी और चर्चा का जबाव एक बार फिर प्रधानमंत्री देंगे और उसके बाद मत विभाजन होगा जिसमें सरकार के भाग्य का फ़ैसला होगा. ख़बरें हैं कि कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी भी चर्चा में हिस्सा लेंगे तो भाजपा की ओर से लालकृष्ण आडवाणी पार्टी की कमान संभालेंगे. राजनीतिक जोड़-तोड़ सरकार को इस विश्वास मत को जीतने के लिए कम से कम 271 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत है और फिलहाल उसके पाले में 260 सांसद खुल कर खड़े हैं जबकि सरकार के ख़िलाफ़ एनडीए, यूएनपीए और वामदलों के पाले मे सांसदों की संख्या 268 बनती है.
रविवार को दोनों ही पक्षों ने शक्ति परीक्षण से पहले शक्ति प्रदर्शन के लिए उपयोग किया. यूपीए और एनडीए ने अपने अपने समर्थक सांसदों के लिए रात्रिभोज का आयोजन किया तो यूएनपीए और वामदल नेता दोपहर के खाने पर मिले. सत्तापक्ष ने होटल अशोक मे रात्रिभोज का आयोजन किया था और यहाँ आए यूपीए नेता विश्वास मत मे जीत के प्रति काफी आश्वस्त नज़र आए. रेल मंत्री लालूप्रसाद यादव ने कहा कि हम विश्वास मत बहुत आसानी से जीतेंगे. यूपीए को कई दिन तक छकाने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबूसोरेन भी पूरे दलबल के साथ भोज का आनंद उठाने पहुँचे. अपने अपने दावे यूपीए नेताओं का दावा है कि उनके पक्ष में कम से कम 280 सांसद हैं और लोकसभा मे मतविभाजन के दौरान सरकार को किसी किस्म की परेशानी नहीं होगी. हालांकि राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह और जनता दल-एस नेता एच डी देवगौड़ा को अपने पाले मे खड़ा कर बहुजन समाज पार्टी नेता मायावती ने अपनी चुनौती को अभी बरक़रार रखा है. मायावती के सुर में सुर मिलाते हुए सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत ने भी ऐलान किया है कि 22 जुलाई को विश्वास मत से इस सरकार और परमाणु क़रार दोनों का खेल समाप्त हो जाएगा. कुल मिलाकर सरकार को बचाने वाले और सरकार को गिराने वाले दोनों के दावे बराबर के हैं और मुक़ाबला फ़िलहाल तो बहुत क़रीबी नज़र आ रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज की परिस्थिति में पार्टियों द्वारा जारी व्हिप के कोई ख़ास मायने नही हैं क्योंकि सरकार अगर बच भी जाती है तो भी चुनाव बहुत दूर नही हैं. उनका कहना है कि सांसद आज के नहीं बल्कि आने वाले कल के समीकरण को नज़र में रख कर वोट डालेंगे. उनके लिए परमाणु समझौते से ज़्यादा महत्व अगले चुनाव के समीकरणों का है और इसलिए 22 जुलाई को विश्वास मत पर मत विभाजन का परिणाम दोनों ही पक्षों को चौंका सकता है. |
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