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सरकार जीते या हारे, हमाम में सभी नंगे दिखेंगे! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के संसदीय लोकतंत्र में 22 जुलाई 2008 का दिन अविस्मरणीय दिन होगा. लोकसभा में सरकार जीते या हारे, पार्टियां उस दिन हमाम में नंगी दिखाई देंगी. दलबदल उस दिन कुछ भी गुल खिला सकता है. पार्टियों और नेताओं में होड़ राजनीति पर कालिख पुतवाने की है. सीपीआई महासचिव एबी बर्धन ने सांसदों का रेट 25 करोड़ रुपए बताया तो समाजवादी पार्टी के मुलायम–अमरसिंह ने 30 करोड़ रुपए! लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सीपीएम और अपनी पार्टी दोनों की कलई खोली. भाजपा डंके की चोट पर कह रही है कि कांग्रेस के सासंद उसके संपर्क में हैं. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल(एस), तेलंगाना राष्ट्रीय समिति, एमडीएमके, द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी डीएमके किसी का भी नाम लें, सभी में कुछ न कुछ गड़बड़ है. बदनामी वाला काम हो रहा है. किसी का कोई पाला बदलेगा तो कोई वोट के वक्त गैर-हाज़िर होगा. न केवल सासंद बल्कि पार्टियां भी ‘अपनी तह भरतपुरी लौटे’ की तरह इधर-उधर लुड़कती लगती हैं. इसलिए 22 जुलाई का सस्पेंस विकट है. वामपंथियों के समर्थन वापसी के बाद से अब तक का फर्क़ यह है कि आश्वस्त यूपीए सरकार घबराहट में है. सरकार पर 'सस्पेंस' प्रकाश कारत ने मायावती से मुलाक़ात क्या की, हवा का रुख़ ही बदल गया. निष्क्रिय भाजपा में जोश आया और लगभग रोज़ाना हो रही 'कोर कमेटी' की बैठकों में लालकृष्ण आडवाणी बार-बार यह आंकलन दे रहे हैं कि सरकार गिर सकती है - जो कुछ संभव हो उसे 'क्लिंच कर' विधानसभा चुनाव के साथ लोकसभा चुनाव की नौबत लाई जाए. इसलिए झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के शिबू सोरेन को झारखंड का मुख्यमंत्री बनाने का चारा डाला गया है. ऐन वक्त पर यदि जेएमएम की ईंट यूपीए की कच्ची दीवार से बाहर निकली तो हवा और बदलेगी. एक-एक, दो-दो सासंदों को छोटे दल सरकार को गिरता देख विपक्ष के साथ वोट देंगे. वामदल, बसपा और भाजपा तीनों में कभी नहीं पटी. बावजूद इसके प्रकाश कारत, लालकृष्ण आडवाणी, मायावती और चंद्रबाबू नायडू आज अपने–अपने कारणों से लोकसभा में मनमोहन सरकार को गिराने की साझी मुहिम चलाए हुए हैं. वामदलों का भाजपा के साथ वोट नहीं करने का तर्क ख़त्म है तो चंद्रबाबू मायावती के ज़रिए यूएनपीए में नई जान फूँकते नज़र आ रहे हैं. . मनमोहन सरकार का पतन चाहने वालों की बिसात में नई चाल के कई नए रास्ते खुले हैं. ठीक इसके विपरित यूपीए का संकट यह है कि उसके पाले की पार्टियों में फूट पड़ती लगती है और एकजुटता भी नहीं है. क्या मान जाएँगे गुरुजी? जुलाई 22 तक दिल्ली में जो होगा उसकी अंतरगाथा इन सवालों पर बनेगी-बिगड़ेगी कि कांग्रेस प्रबंधक शिबू सोरेन की नाराज़गी को दूर कर पाते हैं या नहीं? और उसकी काट के लिए जनता दल(यू)-भाजपा का कोर ग्रुप शिबू सोरेन को इस बात के लिए आश्वस्त कर पाता है या नहीं कि वे उन्हें झारखंड का मुख्यमंत्री 'गारंटीशुदा' तरीक़े से कब–कैसे बनाएंगे? सोनिया गांधी निजी तौर पर एचडी देवगौड़ा, अजीत सिंह से मिलकर उनके ‘ईगो’, उनकी बातों को मानने की गारंटी दे पाती हैं या नहीं? सचमुच अब कांग्रेस का प्रबंध सोनिया गांधी के करिश्मे, मान-मनव्वल के निजी कौशल पर निर्भर है. हाँ, मुलायमसिंह और लालू यादव को भी यह कमाल दिखाना है कि वे अपनी पार्टियों के सासंदों को कम से कम टूटने दें. ताज़ा खबर तो यह है कि नीतिश कुमार ने राष्ट्रीय जनता दल के तीन और मायावती ने समाजवादी पार्टी के सात सांसदों पर काम कर डाला है. राजनीति के इस परिदृश्य में प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का अब कोई रोल नहीं है. क्या यह अजीब बात नहीं है कि दांव पर उनकी सरकार है और जब लोकसभा में उनकी सरकार पर वोट होगा उससे पहले उन्हें सदन छोड़ना होगा. वे लोकसभा सासंद नहीं हैं इसलिए वोट के वक्त वे न सदन में रहेंगे और न ‘लॉबी’ में. बतौर सदन नेता प्रणव मुखर्जी वोट मत का सामना कर रहे होंगे. |
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