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ताश के खेल की तरह है भारतीय राजनीति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय राजनीति ताश के खेल की तरह है. जनता का काम पत्ते फेंटना और बाँटना है. किस खिलाड़ी के पास क्या आएगा, यह तो पत्ते उठाने के बाद ही पता चल पाता है. राजा किसके पास जाएगा, तुरुप का इक्का कौन चलाएगा या ग़ुलाम क्या कहर ढाएगा, इसे कोई पहले से नहीं बता सकता. ताश की ही तरह राजनीति में भी एक-दूसरे के पत्ते पीटे और खींचे जाते हैं. भारतीय राजनीति के इस अजीबो-ग़रीब खेल में सबसे महत्त्वपूर्ण कौन होता है? यूँ तो हर पत्ते का अपना अगल किरदार होता है, पर एक पत्ता होता है जो बादशाह भी बन जाता है और ग़ुलाम भी. मौक़ा पड़ने पर उसे दुक्की बनने से भी परहेज़ नहीं है. उस पत्ते का नाम है जोकर- यह कहना है भारत के सही मायनों में पहली गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का. वे ख़ुद को जोकर बताते हैं. शायद सही भी है. किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह एक दिन प्रधानमंत्री बनेंगे. जिस दिन उन्होंने शपथ ली थी, उस दिन भी बादशाह दिख रहे थे देवीलाल. पर क्या वो अकेले शख्स हैं? भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों को पीछे की तरफ़ पलटें तो ऐसे ही एक शख़्स नज़र आते हैं. राज नारायण...एक अलबेले नेता. जो भारत की मार्च 1977 में बनी पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार के मुख्य किरदारों में से एक थे. इक्कीस महीने के आपातकाल के हटने के बाद पूरे देश में कांग्रेस और इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ लहर थी. देश की चार प्रमुख ग़ैर कांग्रेसी शक्तियों ने मिल कर जतना पार्टी बनाई. इस सरकार में तीन बादशाह थे. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, उनके दो उप प्रधानमंत्री चरण सिंह और जगजीवन राम. हालत इतने ख़राब थे कि तीनों एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. राजनीतिक टीकाकार इंदर मल्होत्रा उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि एक दिन जब वह संसद के भीतर उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिलने पहुँचे तो उन्होंने उनसे कहा के बगल के कमरे बैठे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई मेरे मित्र देवीलाल के ख़िलाफ़ षडयंत्र कर रहे हैं. इस सरकार का अंत भी इन्हीं झगड़ों के कारण हुआ. चरण सिंह ने मुक्ति का रास्ता इंदिरा गांधी में देखा. उसी इंदिरा गांधी में जिन्हें जेल भेजने को उन्होंने अपने कार्यकाल का सबसे बड़ा मक़सद बना लिया था. उनकी बातचीत का ज़रिया बने राजनारायण, जिन्होंने इंदिरा गांधी को चुनाव हरवाया था. जनता सरकार वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी इस पूरे घटनाक्रम को बड़े क़रीब से देख रहे थे. वह याद करते हुए कहते हैं कि आज़ाद भारत में शायद यह पहला मौक़ा था जब धनबल की बात शुरू हुई. प्रभाष जोशी कहते हैं, "मुझे उस समय की जनता सरकार से जुड़े एक बड़े महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ने बताया था की राज नारायण को एक सरकार विरोधी उद्योगपति ने सवा किलो वज़न की सोने की मूर्ति भेंट की थी. यह धनबल के ज़रिए पार्टी तोड़ने के राजनीतिक प्रयासों में से पहला था." पर सरकार गिरने का जो ज़ाहिर कारण बना, वह था जनसंघ से आए अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं की दोहरी सदस्यता का मामला. जनता पार्टी के भीतर के समाजवादी नेताओं ने कहा या तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ छोड़ो या फ़िर जनता पार्टी. इन नेताओं ने जनता पार्टी छोड़ दी. चरण सिंह और राज नारायण जैसे नेता भी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से अलग हो गए. भारतीय जनता पार्टी के महासचिव रहे केएन गोविंदाचार्य पूरे घटनाक्रम को याद करते हुए कहते हैं कि दोहरी सदस्यता तो एक निमित्त बन गया, वरना कारण था लोगों के अहम् का टकराव. गोविंदाचार्य आज तक नहीं जान पाएँ है कि वह कौन सा कारण था कि जॉर्ज फर्नांडिस ने एक दिन पहले मोरारजी देसाई के बचाव में बड़ा आक्रामक भाषण दिया और कुछ घंटों ही वह चरण सिंह के साथ चले गए. फर्नांडिस चरण सिंह के साथ आ गए और चरण सिंह ने इंदिरा कांग्रेस के समर्थन से शपथ लेकर प्रधानमंत्री बन गए. पर, संसद में बहुमत साबित करने से पहले ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया. जिससे चरण सिंह की सरकार गिर गई. पर क्या कारण था? कांग्रेस ने ऐसा क्यों किया? इस सवाल का उत्तर देते हुए इंदर मल्होत्रा कहते हैं कि ऐसा कहा जाता है कि मतदान के दिन सुबह इंदिरा गांधी के यहाँ से चरण सिंह को फ़ोन गया कि अगर वह समर्थन चाहते हैं तो उनके और संजय गांधी के ऊपर लगे आरोपों की जाँच के लिए बनी विशेष अदालतें बंद कर दें. चरण सिंह ऐसा कर नहीं सकते थे. इसलिए वह राष्ट्रपति के पास गए और अपना इस्तीफ़ा सौंप आए. जनमोर्चा का गठन चरण सिंह की सरकार के जाने के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1980 में कांग्रेस ने बहुमत से सरकार बनाई. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. जिसेक बाद कांग्रेस ने राजीव गांधी ने नेतृत्व में अभूतपूर्व सफलता हासिल की. राजीव गांधी के ऊपर कई किस्म के आरोप लगे. जिसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनमोर्चा की सरकार बनी. जिसे सभी कांग्रेस विरोधी दलों ने समर्थन किया. एक तरफ़ वाम दल दूसरी तरफ़ भाजपा. यहाँ भी कमोबेश जनता पार्टी की ही तरह अहम् की लड़ाई शुरू हो गई. विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके उप प्रधानमंत्री के बीच. प्रभाष जोशी कहते हैं, "देवीलाल हमेशा वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताते थे, पर जब पार्टी सत्ता के क़रीब आई तो उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला नारे लगवाने लगे कि ‘ताऊ पूरा तौलेगा, लाल किले से बोलेगा’. देवीलाल के अंदर प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा जगाई. चौटाला के गुरु थे वीपी सिंह के धुर विरोधी चंद्रशेखर." वीपी सिंह की सरकार गिरते ही राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार को समर्थन दिया. बहुत ज़ल्द ही राजीव गांधी और चंद्रशेखर के संबंध तनावपूर्ण हो गए. कांग्रेसियों को चंद्रशेखर का ‘चार महीने बनाम चालीस साल’ का नारा अच्छा नहीं लगा. कांग्रेस ने चंद्रशेखर की सरकार से यह कहते हुए समर्थन वापस ले लिया कि वह राजीव गांधी के पीछे जासूस लगा रही है. इसके बाद 1991 में हुए चुनाव में प्रचार के दौरान राजीव गांधी एक चरमपंथी हमले में मारे गए. जब चुनाव परिणाम आए तो कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी और पीवी नरससिम्हा राव प्रधानमंत्री बने. हालाँकि इस सरकार ने अपना कार्यकाल तो पूरा किया लेकिन सरकार को बचाए रखने के लिए जो हथकंडे अपनाए गए. उन्होंने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया. अविश्वास प्रस्ताव में जीत जाने के बाद यह साबित हुआ कि कांग्रेस ने समर्थन के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को पैसे दिए गए थे. पर पैसों का लोभ अकेला नहीं था.
नरसिम्हा राव सरकार में संसदीय कार्य मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल बताते हैं कि उन्होंने किस शर्त पर अजीत सिंह की पार्टी से सात लोकसभा सदस्यों को तोड़ा. शुक्ल कहते हैं, "हमने राम लखन सिंह यादव को कैबिनेट में जगह देने का वायदा किया और साथियों को अन्य कमेटियों में पद. यह एक मान्य संसदीय परंपरा है और केवल एक राजनीतिक लाभ है. यहाँ पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ. " 1996 में हुए चुनावों में कांग्रेस हार गई और भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी. दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में पार्टी के प्रमुख नेताओं और महासचिवों की बैठक हुई. उस समय भाजपा के संगठन मंत्री रहे केएन गोविन्दाचार्य बताते हैं कि सर्वानुमति से यह तय हुआ कि सरकार नहीं बनानी है, क्योंकि बहुमत नहीं है. अगर राष्ट्रपति बुलाते हैं तो 15 दिन का समय मांगना है. अगर दें तो ठीक वरना प्रस्ताव ठुकराना है. पर उस बैठक के दूसरे दिन आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्रपति का प्रस्ताव पार्टी ने स्वीकार कर लिया. इस निर्णय की घोषणा हुई. एक दूसरी बैठक में जो अटल बिहारी वाजपेयी के घर पर हुई. उस बैठक में क्या हुआ? यह पूछने पर गोविंदाचार्य कहते हैं की उन्होंने सवाल किया की रात भर में ऐसा क्या हुआ कि बिना पूछे यह निर्णय ले लिया गया. उनका कहना है कि आडवाणी ने उन्हें चुप करा दिया और बहुमत जुटाने के काम में लगा दिया. पर सरकार गिर गई क्योंकि बहुमत जुटाना संभव नहीं था. सरकार गिर गई और अप्रत्याशित रूप से एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने. उनकी सरकार को सीताराम केसरी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया. 11 महीने में ही यह सरकार भी गिर गई. आरोप लगाया गया कि राजीव गांधी की हत्या की जाँच कर रहे आयोग ने कहा कि सरकार में शामिल डीएमके का भी हत्या से संबंध है. कांग्रेस ने कहा डीएमके को निकालो देवगौड़ा ऐसा नहीं कर पाए. पर क्या यही एकमात्र कारण था? वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा कहते हैं की ख़बर थी कि देवगौड़ा केसरी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की तैयारी कर रहे थे. देवगौड़ा की सरकार जाने के बाद इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने. पर कांग्रेस ने उनकी भी सरकार नहीं चलने दी.
पत्रकार प्रभाष जोशी का मानना है की दरअसल सीताराम केसरी में ख़ुद प्रधानमंत्री बनने इच्छा जाग गई थी. राजग का गठन इसके बाद मार्च 1998 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का जन्म हुआ. पर अटल बिहारी वाजपेयी की यह सरकार भी 13 महीने में गिर गई. उस घटना को याद करते हुए इंदर मल्होत्रा कहते हैं, "जयललिता चाहती थीं कि उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के सभी मुक़दमे केंद्र सरकार वापस कराए, पर मुक़दमे तमिलनाडु सरकार ने लगाए थे. जिन्हें पलटना केंद्र के वश के बाहर था. उन्हें बहुत समझाया गया पर वह नहीं मानी और सरकार से समर्थन वापस ले लिया." इसके बाद वाजपेयी फिर प्रधानमंत्री बने और अपना कार्यकाल पूरा किया. उनके बाद आई मनमोहन सिंह की सरकार आज दोराहे पर खड़ी है. वही खिलाड़ी हैं. डीएमके के कारण कांग्रेस ने देवगौड़ा की सरकार गिराई थी आज डीएमके कांग्रेस का पक्का साथी है, शिबू सोरेन और अजीत सिंह एक बार फिर बड़ी मांग में हैं. पर होगा क्या? यहाँ शायद देवगौड़ा की यह बात एकदम सटीक बैठती है की "श्रीमान इस देश में क्या होने वाला है, कोई नहीं कह सकता. कुछ भी हो सकता है." |
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